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कविता

जय हो
उमेश चौहान


अँगनू का आँगन
छबीले का छप्पर
चंदन की चौपाल
बलबीरा की बैलगाड़ी
कुछ भी न चमका
तो फिर किसका हिंदुस्तान चमका?

शायद उनका ही हिंदुस्तान
'इंडिया' बनकर चमका
जो बस दिल्ली को ही मानते हैं हिंदुस्तान
जिन्हें अपने सूट की चकाचक में होता है फील गुड
जो बस एक डिजाइनर कुर्ता पहन
अपने को मान बैठते हैं आम आदमी
लेकिन आम आदमी की बदबू से बचने के लिए
देह पर छिड़कते हैं ढेरों कोलोन

खैर, अब तक जिसकी चमकी,
उसकी चमकी,
चलो, अब बता दिया जाय सबको कि
महामंदी के इस दौर में
नहीं चमक सकते ज्यादा दिन शेयर और सोना
अब नहीं कट सकती ज्यादा दिन पहले जैसी चाँदी
अब तो चमकेगी खुरदरे लोहे की धार
और चमकेगा असली हिंदुस्तान ही!

जय हो गाँव के ग्वालों की!
जय हो माटी के लालों की!

 


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