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कविता

नव आल्ह-छंद (अवधी आल्हा)
उमेश चौहान


छोड़ि सुमिरिनी, छोड़ि प्रार्थना, पारंपरिक सबै आख्यान।
कहौं आजु कै देशु-काल गति, रचि नव आल्ह-छंद सुप्रधान॥


इंद्रप्रस्थ नव, संजोगिनि नव, नव रण-भूमि, नए सम्राट।
नए सतैया, नए लड़ैया, नव छल-छंदु, नए पंचाट॥

बढ़ी आय, पर बढ़ी विषमता, बढ़ी धाँधली, भ्रष्टाचार।
बढ़े शहर औ सिकुड़े जंगल, पिटि कै गाँव भए लाचार॥

ज्यादा उपजै सड़ै ख्यात मा, उपज घटेउ ते मरै किसान।
माटी, बारू, ईंटा, पाथर, लकड़ी लुटी, लुटे खलिहान॥

जैसे बादर उड़ि-उड़ि आवैं, बिनु बरसे फिरि जाय बिलाय।
जलु भरि गगरी, मुँह कै सँकरी, जैसे प्यास न सकै बुझाय॥

वैसै हालति है गरीब कै, अनकथ व्यथा-कथा है भाय।
पैंसठ साला आजादी का कौनौ असरु न परै देखाय॥

प्रजातंत्र कै ठेकेदारी जिन-जिन सिर पर लीन उठाय।
उनिकै तौ बसि चाँदी होइगै, बाकी हुँआ-हुँआ चिल्लाय॥

जो सरकारी ओहदा पावैं, उनिके भागि तुरत खुलि जाय।
करि व्यापार मुनाफा काटैं, उनिकेउ पूत फिरैं इतराय॥

कहै-सुनै का बड़ी प्रगति है, ऊँचे भवन रहे चुँधियाय।
किंतु दिया के तरे अँधेरा, ना हाकिम का परै देखाय॥

संविधान मा सोशलिस्ट सब, सांची कहे होश उड़ि जाय।
तीस रुपैया के अमीर हैं, रोजी तीस लाख उइ खाय॥

तीस रुपैयौ केरि अमीरी, तीस कोटि जन सके ना पाय।
साठि साल के लोकतंत्र कै, यह दुर्दशा सही ना जाय॥

जैसे सूरज ऊर्जा बाँटै, सारा भेदु-भाव बिसराय।
जैसे चंद्रमा मनु भरमावै, योग-वियोग न चित्त लगाय॥

जैसे वायु सबका दुलरावै, रंग-रूप का भेदु भुलाय।
जैसे नदी जलु भरि-भरि लावै, सबका तृप्त करै अघवाय॥

कहाँ हवै अस सोशलिज्म औ केहि नेता का ऐसु दरबार।
केहि धनपति कै ऐसि तिजोरी, केहि शासन कै ऐसि दरकार॥

भारत के केहि संविधान मा सबका होइ आस-विश्वास।
सबका मिलिहै छप्पर-छानी, सबका मिटी रोग-संत्रास॥

केहिमा दुखी मजूर न होई, केहिमा मालिक होई उदार।
केहिमा प्रानु किसान न देई, कहाँ न रोई बेरोजगार॥

भोजन, स्वास्थ्य, सूचना, शिक्षा, चाहै जौनु मिलै अधिकार।
सेवा का अधिकार मिलै या जनजातिन का वनाधिकार॥

बंदरबाँट मची है चहुँ-दिशि, जब तक मिटी न यहु व्यभिचार।
तब तक सब अधिकार व्यर्थ हैं, हैं अनर्थ के ही आधार॥

कब तक जन-गण-मन का सपना, बसि भासन ते होई साकार।
थोथा चना घना बाजै औ घना चना बैठा मन मार॥

चलौ, उठौ, अब नई जंग कै, चंगी फौज करौ तैयार।
बुद्धि, विवेक, ज्ञान, साहस कै तानौ चमाचम्म तरवार॥

अब तक हारे, अब ना हारब, चलौ जीत के करौ उपाय।
शेष कहानी समरभूमि कै, फिरि कौनेउ दिन द्याब सुनाय॥

 


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