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आलोचना

यथार्थ की कहानी और कहानी का यथार्थ बतर्ज अखिलेश
राहुल सिंह


नवें दशक के उत्तरार्द्ध में ऊसर (1988) और चिट्ठी (1989) आदि कहानियों ने दस्तक दी थी और हिंदी कहानी ने अपने कुनबे में एक नया नाम शामिल किया था, अखिलेश। अखिलेश की कहानियाँ इस लिहाज से अलहदा थीं कि एक ओर जहाँ वह गाँव और शहर के बीच ठिठके कस्बे के हालात का ब्योरा दे रही थीं तो वहीं दूसरी ओर किसान, मजदूरों और मध्यवर्ग की बजाय निम्न मध्यवर्गीय जीवन की दास्तान बयाँ कर रही थी। 1988 से 1996 तक आते-आते 'ऊसर' और 'चिट्ठी' के अलावा 'शापग्रस्त', 'बायोडाटा', 'अगली शताब्दी के प्यार का रिहर्सल', 'पाताल' और 'जलडमरूमध्य' आदि कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं। अट्ठाईस-तीस साल की उम्र में अमूमन एक युवा बुनियादी तौर पर दो चिंताओं से ग्रस्त और आक्रांत रहता है एक गम-ए-रोजगार और दूसरा गम-ए-इश्क। इस लिहाज से अखिलेश की आरंभिक कहानियाँ ('चिट्ठी', 'बायोडाटा', 'ऊसर' और 'अगली शताब्दी के प्यार का रिहर्सल') भी अपवाद नहीं हैं। अपवाद वह इस मामले में है कि वह इन गमों की दास्ताँ ही बयाँ करने में मुब्तिला नहीं हो जातीं, बल्कि उसका अतिक्रमण करती हैं। मतलब यह कि कहानी की सतह पर बेकारी और उन दिनों में किए गए कुछ अधपके प्रेम के धूपछाँही निशान अवश्य देखने को मिलते हैं पर थोड़ी सावधानी से देखने पर 'इन कहानियों में कस्बाई जीवन से उबर कर शहरी जीवन में प्रवेश की कोशिश और उन कोशिशों की भंगिमाएँ देखी जा सकती हैं लेकिन सिर्फ भंगिमाएँ ही, सफलताएँ और संभावनाएँ नहीं। बल्कि अखिलेश की कहानियों में हम एक ऐसे कस्बे को पाते हैं जो शहर का प्रहसन मात्र रह गया है। वह किसी शहर का उच्छिष्ट हो गया है। जैसे किसी शहर ने गर्भपात कराया हो, मरा हुआ शिशु-मांस का लोथड़ा - यह कस्बा।' अखिलेश की कहानियों में आया यह कस्बा वैसे तो इलाहाबाद के आस-पास का है लेकिन भारतीय राजनीति और अर्थनीति ने भारतीय समाज को जिस दशा में पहुँचा दिया है उसके कारण इलाहाबाद का यह कस्बा अप्रत्याशित रुप से अपनी भौगोलिक सीमा का विस्तार कर भारत के अन्य राज्यों के कस्बों का भी पर्याय नजर आने लगता है। मिलते-जुलते अनुभवों और समान समाजार्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ही अखिलेश की कहानियाँ उत्तर प्रदेश के बाहर भी एक 'मास अपील' पैदा करती हैं। अखिलेश को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जा सकता है कि उन्होंने अपने समय के राजनीतिक और सामाजिक संरचना को एक 'साहित्यिक संरचना' में कुशलतापूर्वक रूपांतरित कर डाला है।

अखिलेश ने वर्तमान भारत के उस क्षेत्र (कस्बा) को अपनी कहानी का विषय बनाया जहाँ एक साथ सामंती अवशेष, आधुनिक होने की चाह और उत्तर आधुनिक प्रभाव आपस में गुत्थमगुत्था हो रहे थे। अखिलेश की कहानियाँ इस उलझाव को कुशलता और सफलतापूर्वक दर्ज करने के लिए एक साथ लगभग तीन स्तरों पर चलती हैं। एक स्तर सामंती अवशेषों या प्रभावों के अंकन का है, दूसरा स्तर अपने परिवेश को धता बताते हुए 'आभासी आधुनिक' होने की 'छद्म आकांक्षा' में निहित है और तीसरा उस परिवेश और उससे उबरने के उल्टे-सीधे प्रयत्नों के उत्तर आधुनिक परिणिति में। इस दृष्टि से एक आम पाठक के लिए अखिलेश की कहानियाँ 'सिंगिल रीडिंग' वाली कहानियाँ नहीं है।

जिस उलझाव को अखिलेश की कहानियाँ दर्ज करती हैं। उस उलझाव को दर्ज करने के कारण ही अखिलेश की कहानियों का शिल्प या विन्यास थोड़ा अलग है। शिल्प के स्तर पर दूसरे कहानीकारों से कुछ समानता के बावजूद शिल्पगत अनुप्रयोग में उस वैशिष्ट्य को देखा जा सकता है। जैसे अखिलेश की एक खासियत यह भी है उनकी कहानियों का विन्यास एकरेखीय नहीं होता है। समय की आवा-जाही का एक सिलसिला बराबर उनके यहाँ देखा जा सकता है। उनकी कहानियों की शुरुआत किसी घटना या स्थिति से हुआ करती है, वर्तमान में थोड़ी दूर चलने के बाद अनायास वे पीछे जाकर पूर्वदीप्ति शैली (फ्लैश बैक) के जरिए थोड़ी देर बाद फिर उसी स्थिति या घटना के पास वापस आते हैं। लेकिन इस वापसी में भी वे कुछेक महत्वपूर्ण सूत्र पुनः छोड़ आते हैं और फिर से उन सूत्रों की व्याख्या करते हैं। इस तरह कहानी के पारंपरिक शिल्प के प्रचलित रूप या शैली का प्रयोग करते हुए भी उसमें एक नयापन पैदा करते हैं। इस शिल्प के कारण अखिलेश की कहानियों में दो-एक फाँक लगातार देखने को मिलती है जहाँ कहानी का प्रवाह अविरल न होकर दो-एक बार खंडित होता है। कहानी में आई यह दरार या फाँक दरअसल अखिलेश के द्वारा लिया गया एक 'डेलिबरेट पॉज' है जहाँ वे समकालीन यथार्थ के आयामों को अपना 'टच' देते हैं। उनकी कहानियों में यथार्थ के 'ट्रीटमेंट की टाईमिंग' को इन लिये गए 'पॉज' में देखा जा सकता है। इस 'पॉज' या अंतराल को कहानी के प्रवाह में 'गियर शिफ्टिंग' की भाँति देखा जा सकता है। अखिलेश अक्सरहाँ अपनी कहानियों में कल्पना के 'क्लच' को दबाकर यथार्थ को 'एक्सीलरेट' करते हैं। रेनर मारिया रिल्के ने कविताओं के बारे में कभी कहा था कि 'कविता में छूट गए इन फाँकों में आनेवाला समय अपना अर्थ भरेगा।' अखिलेश आनेवाले समय के लिए अर्थवत्ता की गुंजाइश कहानी की फाँक के साथ-साथ कहानियों के अंत में भी छोड़ते हैं। अखिलेश की कहानियों का अंत बहुत 'कनविन्सिंग' नहीं होता है। इसके कई कारण हो सकते हैं। एक तो, 'कन्फ्यूशन' के इस दौर में 'कनविन्स' कर पाना काफी मुश्किल भरा काम है। दूसरा, रचनाकार अपनी रचना के जरिए एक 'डेमोक्रेटिक स्पेस' भी निर्मित करना चाहता है और 'कनविन्स' करने की किसी भी कोशिश से रचनाकार की तटस्थता का हनन होता है। तीसरा कारण, अखिलेश की पत्रकारिता का लंबा अनुभव भी हो सकता है। जहाँ खबरों के प्रति तटस्थता एक बुनियादी गुण के तौर पर देखा जाता है। इस संदर्भ में उनके 'यक्षगान' को देखा जा सकता है। जहाँ कहानीकार होने के बावजूद वे सत्य के आधिकारिक प्रवक्ता बनने की बजाय एक तटस्थ सूत्रधार की भूमिका मे खड़े होते हैं। सत्य तो एक ही है लेकिन उत्तर आधुनिक समय में सत्य व्याख्यासापेक्ष तथ्य जैसी चीज में तब्दील हो गया है। जितनी दृष्टियाँ उतनी व्याख्याएँ हैं। इस 'ट्रीटमेंट' से कहानी का पारंपरिक रचना विधान भी थोड़ा दरकता है।

अखिलेश की कहानियों को इधर फिर से पढ़ते हुए इस ओर ध्यान गया कि इन विचित्रताओं और विडंबनामूलक स्थितियों के कारण इनकी कहानियों में एक किस्म की खिन्नता, उदासी, अवसाद की उपस्थिति रहती है, जिसे भले कुछ अंतराल पर एक ठिठोली तोड़ती रहती है पर आद्यंत पसरे अंधियारे में यह उपक्रम भी किसी बड़ी झील में शाम के वक्त फेंके गए पत्थर सरीखा प्रभाव ही उत्पन्न करता है। पहले अचानक से अँधेरा का उतरना दिखता था पर अब इस बात की ओर ध्यान गया कि अखिलेश की कहानियों में यह अंधियारा आरंभ से ही परिवेश का अभिन्न अंग रहता आया है, जो कहानी के साथ गहराता जाता है विशाल भारद्वाज के फिल्मों के 'डार्कनेस' की तरह। बल्कि अँधेरे को हाल के दिनों में चित्रित करने की भी एक परंपरा बनती जान पड़ती है। अखिलेश से पहले की कहानियों में भी अँधेरा रहा है लेकिन यहाँ प्रत्यक्ष तौर पर यह दिख रहा है, 'अँधेरे में हँसी' (योगेंद्र आहूजा), 'अँधेरा समुद्र' (परितोष चक्रवर्ती), 'रोमियो जूलियट और अँधेरा' (कुणाल सिंह) आदि। अँधेरा को शीर्षकों में अभिधात्मक अर्थ में न देखकर लक्षणा और व्यंजना के धरातल पर देखें तो स्वयं अखिलेश की कहानियाँ के शीर्षक भी इस बात की पुष्टि करते हैं, 'शापग्रस्त', 'ऊसर', 'पाताल', 'अँधेरा' और 'ग्रहण' आदि।

किस्सागोई और पर्यवेक्षण (आब्जर्वेशन) यह दो विशेषताएँ अखिलेश की कहानियों को पठनीयता और विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। किस्सागोई यदि रोचकता को बनाए रखती है तो पर्यवेक्षण के माध्यम से वे यथार्थ को ज्यादा विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत कर पाते हैं। उनकी किस्सागोई के प्रमुख घटकों के तौर पर लोकोक्तियों (शौकीन बुढ़िया चटाई का लहँगा, बाप पदहू न जाने बेटा शंख बजावे आदि), ठेठ देशज शब्दों के प्रयोग (छुछुवाते, छिनक, भक्साले, चुटुर-पुटुर आदि), सूक्तियाँ गढ़ने की योग्यता (सुख की सर्वोत्तम मलाई राजनीति के दूध में पड़ती है, मैं अपनी हिम्मत की लापता चिड़िया को ढूँढ़ रहा था आदि), कहन का ढब 'डिक्शन' (हुआ यह था कि जब सहायजी और कौशल्या, चाची को लेकर अस्पताल के लिए जा रहे थे तो उनकी मोटर में चाची की मौत दुबककर बैठ गई थी। चाची के अस्पताल में दाखिल होने पर मोटर में दुबककर बैठी मौत उछलकर बाहर आई और चाची के पीछे-पीछे चलने लगी। बाद में चाची के बिस्तर पर वह तकिए के नीचे छुपकर बैठ गई। थोड़ी देर वह नींद लेकर आराम फरमाती रही। लेकिन जैसे ही चाची सोईं, वह जग गई। उसने सधे कदमों से बाहर निकलकर चाची को दबोच लिया - जलडमरुमध्य) आदि को गिना जा सकता है। किस्सागोई के गुर उन्होंने कहाँ से सीखे इसके बारे में तो प्रामाणिक तौर पर अखिलेश ही कुछ बता सकते हैं लेकिन उनके पर्यवेक्षकीय गुणों के स्रोत के तौर पर पत्रकारिता के लंबे कैरियर की पहचान की जा सकती है। गाब्रियल गार्सिया मार्क्वेज से 'लीफ ऑव स्टोर्म' से लेकर 'वन हंड्रेड इयर्स ऑव सालीट्यूड' की शैली पर बात करते हुए पीटर एच. स्टोन ने उन उपन्यासों की शैली में पत्रकारीय भंगिमा की छाप देखते हुए पूछा था कि 'आप कल्पनाजनित घटनाओं का भी इतनी गहराई से वर्णन करते हैं कि वह उनको एक तरह का यथार्थ प्रदान कर देता है, यह कुछ ऐसा है जो लगता है आपने पत्रकारिता से सीखा ?' इसके जवाब में मार्क्वेज ने जो कहा वह काफी महत्वपूर्ण है। 'यह एक पत्रकारीय युक्ति है जिसको आप साहित्य में आजमा सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप कहें कि आकाश में हाथी उड़ रहे हैं तो कोई विश्वास नहीं करनेवाला। लेकिन अगर आप कहें कि आकाश में कुल 425 हाथी हैं तो शायद लोग आपका विश्वास कर लें। ...जैसे मेरी नानी एक कहानी कहा करती थी जिसमें एक आदमी जब आता है तो पूरा घर तितलियों से भर जाता है। जब मैं इस बात को लिख रहा था तो मुझे लगा कि अगर मैंने नहीं कहा कि तितलियाँ पीली थीं तो लोग विश्वास नहीं करेंगे।' अखिलेश की कहानियाँ इस युक्ति से भरी पड़ी हैं यह संभव है कि अखिलेश के पास इसके अलग कारण हों लेकिन जिस विश्वसनीयता की बात ऊपर की जा रही है एक पाठक का विश्वास जीतने में यह प्रविधि कारगर है और अखिलेश की कहानियों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुणों में से एक है, इसलिए इसके दो-तीन उदाहरण रख रहा हूँ। 'ऊसर' का चंद्रप्रकाश तटस्थ भाव से पीता जा रहा था। वह पैग बनाता और पीता। दरवाजे पर दस्तक हुई। वह लड़खड़ाते उठा। चप्पल में पैर डाला, लेकिन पैर चप्पल की बगल से आगे बढ़ गया। उसने फिर से पैर डाला इस बार ऊपर से गुजर गया। वह नंगे पाँव ही आगे बढ़ा।' (शापग्रस्त, पृ 121) दूसरा, 'बायोडाटा' कहानी की शुरुआत इन पंक्तियों के साथ होती है कि 'नवंबर में न अधिक सर्दी रहती है, न अधिक गर्मी। गाँवों में गन्ना, गंजी, मटर का नाश्ता शुरू हो जाता है। सब्जियाँ अपेक्षाकृत सस्ती और सुलभ रहती हैं। बिना चाकू की मदद से छिल जानेवाली गोल आलू चलने में आ जाती हैं। इतना ही नहीं, रात में पेशाब करने के लिए खुले में निकलने पर जगत विराट और रहस्यमय लगने लगता है।' (वही, पृ 59) तीसरा, 'यक्षगान' कहानी में सरोज अपने प्रांत के एक बड़े नेता गोरखनाथ पर बलात्कार का आरोप लगाती है तो पुलिस उससे पूछती है कि 'आपने गोरखनाथ जी को कैसे पहचाना? कैसे जाना कि वह गोरखनाथ ही हैं।' इस पर सरोज जवाब देती है कि 'हम उनको पहचानते थे अच्छी तरह से। इलेक्शन में उनकी फोटोवाले पोस्टर हमारे गाँव में लगे थे। एक पोस्टर तो हमारे घर की दीवार पर भी चिपका था। बाबू ने... भाभी ने उनकी पार्टी को ही वोट दिया था... भइया भी उनको वोट देने गए थे। पर उनका वोट पहले पड़ गया था... हम तभी से गोरखनाथ को पहचानते थे।' (अँधेरा, पृ 77) पहले उदाहरण में चंद्रप्रकाश के नशे में न होने का कोई संदेह रह जाता है क्या? दूसरे में नवंबर के महीने के संदर्भ में जा अनुभवों का ब्योरा है, उसको झूठा कहने की कोई गुंजाइश बचती है क्या? और तीसरे में भइया के बोगस वोट पड़ जाने की जो बात है उसके बाद किसी गवाह या प्रमाण की गुंजाइश बचती है क्या? ऐसे पचासों उदाहरण दिए जा सकते हैं। पर अभीष्ठ था कहानी की विश्वसनीयता की निर्मिति मे उक्त प्रविधि की उपयोगिता का रेखांकन और उस पर अखिलेश की पकड़। विश्वसनीयता पर इतना बल देने की भी एक खास वजह है, अखिलेश के द्वारा लगातार अपनी कहानियों में किसी विचित्रता या विडंबनात्मक स्थिति को तरजीह देना, जिस पर एकबारगी यकीन करना सहज संभव नहीं होता। सामान्यतः उनकी कहानियों में असमान्यताओं का वर्णन होता है। इस लिहाज से अखिलेश की आरंभिक और बाद की कहानियों में एक बड़ा अंतर जो दिखाई पड़ता है वह यह कि अपनी आरंभिक कहानियों में अखिलेश कुछेक विचित्रताओं को अपनी कहानियों में जगह दे रहे थे। बाद की कहानियों में इन विचित्रताओं को विडंबनाओं ने 'रिप्लेस' किया। मसलन 'बायोडाटा' कहानी में राजदेव और सावित्री को अजीबोगरीब संतान होती है। 'उसके मुँह से हमेशा चारों पहर, सोते-जागते लार बहती थी। वह लार में लिथड़ी संतान थी। जैसे उसके पेट में लार की टंकी हो।' (शापग्रस्त, पृ 72) ऐसे ही 'पाताल' कहानी में प्रेमनाथ का मुँह अक्सर खुला और लार से भरा रहता। 'जलडमरूमध्य' में सहायजी को आँसुओं की बीमारी लग गई है। वे रो नहीं पाते हैं। उनके सारे आँसू सूख गए हैं। (वही, पृ 124) वहीं उनके बाद के संग्रह अँधेरा (2006) में संकलित कहानियों पर गौर करें तो देखते हैं कि वहाँ भी कुछ विचित्र कल्पनाएँ हैं लेकिन वे विडंबनात्मक हैं। जैसे 'ग्रहण' का राजकुमार पैदा हुआ था तो उसके शरीर में गुदा के स्थान पर गुदा नहीं थी। वह स्थल समतल था। और मल त्याग करने के लिए उसके पेट में सुराख बना दिया गया था। विडंबना यह है कि पूरा संसार पेट भरने की चिंता से त्रस्त है और राजकुमार उर्फ 'पेटहगना' पेट को खाली करने की समस्या से, पूरा संसार नए कपड़ो के लिए लालायित रहता है और 'पेटहगना' पुराने कपड़ों के लिए। 'जलडमरूमध्य' में गाय विष्ठा खाती है। 'यक्षगान' में सरोज छैलाबिहारी को फूटे आँख देखना नहीं चाहती है लेकिन वही छैलाबिहारी जब रामलीला में राम की भूमिका निभाता है तो सरोज उस पर फिदा हो जाती है। विडंबना यह कि वह छैलाबिहारी उर्फ राम सरोज का अपहरण कर शीलहरण करता-करवाता है। राम के रुप में रावण के वरण की विडंबना। आरंभिक कहानियों में प्रयुक्त विचित्रता और बाद की कहानियों में व्यवहृत विडंबना एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यवहार में लाई गई साहित्यिक युक्तियाँ हैं। उद्देश्यमूलकता और प्रभावान्विति दोनों धरातलों पर दोनों की प्रकार्यता एक है। मतलब यह कि आज वस्तुएँ अपना गुण और स्वभाव छोड़ रही हैं। विचार के स्तर पर यह ऐसी बात नहीं है जिसे मानने में कोई परेशानी हो पर जब इसे रचना के धरातल पर रूपांतरित करना हो तो चीजें इतनी आसान नहीं रह जाती हैं। विचित्रताएँ हमारे दैनंदिन जीवन में इस कदर घर कर गईं है कि 'एब्नार्मल' चीजों के प्रति भी हम 'नार्मली विहेव' करने लगे हैं। यह कम विचित्र या विडंबनात्मक स्थिति नहीं है। अखिलेश की कहानियाँ इस 'एब्नार्मल सिचुएशन' के प्रति 'रेस्पांड' करती हैं। जैसे आँसुओं के सूख जाने का रोग सुन कर हँसी आती है लेकिन क्या हमारी संवेदनाएँ अप्रत्याशित रूप से नहीं सूख रहीं हैं हमारी नदियों, पोखरों की तरह। ऐसे घृणित शिशु जिनके मुँह से निरंतर लार टपकता रहता है मानो की पेट में लार की टंकी हो। क्या उन शिशुओं में आज के अभिभावकों के दमित और अतृप्त इच्छाओं को मूर्त रूप ग्रहण करते हम नहीं देख रहे हैं। लगातार लोभी होते समाज में कैसे शिशुओं की कल्पना हम कर सकते हैं? ऐसा नहीं कि यह अखिलेश की कहानियों के लिए मेरे द्वारा लाई गई दूर की कौड़ी है। अपनी किताब 'वह जो यथार्थ था' में अखिलेश एक जगह लिखते हैं कि 'मगर यह उत्तर पूँजीवाद तो बाँझ हत्यारिन है। यह कला का संहार कर रही है और कुछ बेहतर को जन्म भी नहीं दे रही है। यह ईंट-पत्थरों, चाकुओं से गर्भवती है। यही चीजें इसके गर्भ में पलती हैं और जन्म लेती हैं।' (पृ 77) इस विडंबना और विचित्रता की ताजा झलक उनकी हालिया कहानी 'श्रृंखला' (नया ज्ञानोदय, मई 2011) में देखी जा सकती है। श्रृंखला के नायक रतन की आँखें सबसे कमजोर है और वही अपने समय-समाज की परतों को उधेड़ कर देख पाने में सक्षम है। अखिलेश की इसी खूबी की ओर संकेत करना चाह रहा था कि कैसे वे अपनी कहानियों में पहले-पहल कुछ अविश्वसनीय-सा प्रस्तावित करते हैं और फिर कहानी के विकास के साथ-साथ एक विश्वसनीयता अर्जित करते जाते हैं। यह उनके 'अंतर्वस्तु का शिल्प' है। अखिलेश की कहानियों के संदर्भ में जिन विशेषताओें को ऊपर गिनाया गया है। 'श्रृंखला' में भी उसकी झलकियाँ देखी जा सकती है। जैसे फ्लैश बैक की युक्ति, विचित्रता या विडंबनामूलक कल्पना की उपस्थिति, पत्रकारीय भंगिमा, ब्योरों के जरिए यथार्थ की निर्मिति और किस्सागोई से उपजी पठनीयता आदि। 'श्रृंखला' की आत्मा 'अप्रिय' की 'लोकप्रियता' है। यदि अखिलेश केवल यह कह कर रह जाते कि रतन के अखबारी कॉलम की लोकप्रियता से सत्ता आतंकित हो उठी तो कहानी निष्प्रभावी हो जाती। यह सूचनात्मकता कहानी के प्राण हर लेती। ऐसा नहीं की, ऐसा किया नहीं जा सकता था लेकिन अखिलेश पाठकों की समझ का सम्मान करनेवाले रचनाकार हैं इसलिए उन्होंने रतन और उसके कॉलम की अंतर्वस्तु को बड़े जतन से बुना है और उस बुनावट के दौरान ही कहानी की अंतर्वस्तु के प्रति पाठकों का विश्वास भी अर्जित किया है। उस कॉलम में लिखी गई बातों पर की गई मेहनत में पूरी कहानी की संरचना टिकी है। संक्षिप्तीकरण की ऐतिहासिकता-सामाजिकता और राजनीति का जो उद्घाटन वे करते हैं वह वास्तव में रतन की मुसीबत का सबब बनने योग्य है। रतन का कहना है कि 'पाठकों! हर कोड को डिकोड करो, हर सूत्र की व्याख्या करो, हर गुप्त को प्रकट करो। क्योंकि कूट संरचनाएँ सामाजिक अन्याय और विकृतियों के चंगुल में फँस कर फड़फड़ा रहे सामान्य मनुष्य के सम्मुख लौह यवनिकाएँ होती हैं।' मूलतः साहित्य के लक्ष्यों या उद्देश्यों में से एक यह भी है कि वह असलियत का उद्घाटन करे। आचार्य शुक्ल ने अपने निबंध 'कविता क्या है?' में लिखा है कि 'ज्यों ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक और तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जायेगी, दूसरी ओर कवि कर्म कठिन होता जाएगा।' क्योंकि परत दर परत चढ़ते आवरणों को हटाकर 'प्रकृत रूप का प्रत्यक्षीकरण' एक कठिन कवि कर्म साबित होगा। आचार्य शुक्ल ने आने वाले समय में कवि-कर्म के लिए 'प्रकृत रूप के प्रत्यक्षीकरण' (असलियत का उद्घाटन) का जो विधान किया था, अखिलेश रतन के द्वारा उसी सत्य की स्थापना सामाजिक स्तर पर करना चाहते हैं। इसी क्रम में अखिलेश ने आगे एक दूसरी बेहद महत्वपूर्ण बात रतन के द्वारा इलाहाबाद के एक साहित्यिक आयोजन में कहलवाई है जिसका सारांश यह है कि 'कला को यथार्थ और यथार्थ को कला बना दो। क्योंकि दोनों अकेले रहने पर सत्ता संरचनाएँ होती हैं, इसीलिए संसार के समस्त श्रेष्ठ लेखकों ने यथार्थ को कला बनाया और कला को यथार्थ बनाया। ध्यान में हमेशा रखना चाहिए कि आख्यान यथार्थ का उपनिवेश नहीं है जहाँ यथार्थ स्वयं को लाभकारी और मनमाने ढंग से काबिज कर ले। साथ ही आख्यान की तानाशाही कदापि नहीं है जो अपनी सनकों का भार लादती फिरे और जीवन तथा समाज की आवाज को अनसुनी करती रहे।' इसे अखिलेश के साहित्य को समझने का केंद्रीय सूत्र समझना चाहिए क्योंकि अखिलेश के कथा साहित्य को यदि आप समग्रता में देखें तो यह बातें उनके साहित्य के संदर्भ में अक्षरशः लागू होती जान पड़ती है। बहरहाल इस दिशा में विचार किए जाने की जरुरत है। इसके साथ ही अखिलेश की कहानियाँ में उत्तर आधुनिक विचारों और प्रभावों की प्रभावशाली उपस्थिति को अब तक हिंदी कहानी आलोचना और अकादमिक हल्का ठीक से नहीं पहचान सका है, उस ओर भी ध्यान दिए जाने की जरुरत है। फिलहाल, इत्यलम।


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हिंदी समय में राहुल सिंह की रचनाएँ