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कविता

उनका प्रमाण प्रत्र
जसबीर चावला


तुम्हें पानी नहीं लेने दिया जाता कुएँ से
उन्होंने ठप्पा लगा दिया
अमिट स्याही से
कि तुम शूद्र हो
अपिवत्र हो जायेंगे बर्तन
तुम्हारे छूने भर से

*

मरे ढोर तुम उठाओगे
और चमड़ा भी
मल मूत्र
सफाई भी तुम
तुम में ही देवदासियाँ होंगी
और देव तो पत्थर के होते हैं
हम देव होंगे
सब शास्त्रों में लिखा है
शास्त्र विधि का विधान हैं

*

विजातीय हो
पूरी कौम ही विदेशी
होंगे दफ्न तुम्हारे पुरखे यहाँ
धर्म बाहर से आया
संस्कृति मेल नहीं खाती तुम्हारी
हम बतलायेंगे

*

हम ही तय करेंगे
तुम्हारी नागरिकता का दर्जा
झेलना पड़ेगा दंश
सहनें होंगे अत्याचार
छींटाकशी प्रहार

*

जानता हूँ
वे नहीं सुनते किसी की बात
फिर भी बोलता रहूँगा सतत
मिलाकर कंधा
करूँगा पीड़ा साझी

 


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