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कविता

जूतों की जोड़ी और जोड़ाघर
जसबीर चावला


आज उन्होंने
आखिर छुटकारा पा ही लिया
उनसे
जो लंबे समय से
साथी थे उनके
ब्रांडेड
एक जोड़ी जूते

**

खूब चले
वे उन्हें पहन कर
और जूते भी
खूब चले
हिमालय की तलहटी
केरल के जंगलों में
कलकत्ता की सड़कें
मुंबई के बँगलों मे
मंदिरों में / मजारों में
गु्रुद्वारों में रुके
जहाँ लिखा होता है
'जोड़ा घर'
जूतों की सफाई / चमकाते हैं भक्त

**

देश में / विदेश में
चले
बहुत सेवा की
जूतों ने
रक्षा की पाँवों की
कंकड़ / काँटों / कीचड़ से
हर ऊँच / नीच धरातल पर

**

अब तले घिस गये उनके
झुर्रियाँ पड़ गईं
रंग भी बदरंग हुआ
चमक जाती रही
बच्चे भी कह रहे
छुटकारा पा लो इनसे
किसी काम के नहीं रहे
बू आती है / अच्छे नहीं लगते
उन्होंने फेंक दिये
जूते
डस्टबीन में

**

एक जोड़ा और था
उसी घर में
पड़ रह थी उसके भी झुर्रियाँ
उड़ रही रंगत
मात्र चस्पा था
अनुभव अतीत का
चला था / घिसा था
वह भी खूब
बच्चों की खातिर
जिया उनके स्वपनिल रंगो के लिये
अब बुढ़ा चुका था
थक चुका था
पता नहीं
चुक चुका था..?

**

दोपहर खबर आई
खाली है / मिल जायेगा
कमरा
जोड़े को
शहर के 'ओल्ड होम' में
और भी हैं
जोड़े
इस 'जोड़ा घर' में

**

और उस दिन
बिदा हुए
अपने (?) घर से
चुपचाप / गुमनाम
'दो जोड़े'

 


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