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उपन्यास

गंगा मैया
भैरव प्रसाद गुप्त

अनुक्रम


एक

उस दिन सुबह गोपीचन्द की विधवा भाभी घर से लापता हो गयी, तो टोले-मोहल्ले के लोगों ने मिलकर यही तय किया कि यह बात अपनों में ही दबा दी जाए; किसी को कानों-कान ख़बर न हो। उन लोगों ने ऐसा किया भी, लेकिन जाने कैसे क्या हुआ कि गोपीचन्द के दरवाज़े पर हलके का दारोग़ा एक पुलिस और चौकीदार के साथ नथुने फुलाये, आँखों में रोष भरे आ धमका। उस वक़्त उन लोगों की हालत कुछ वैसी ही हो गयी, जैसी एक चोर की सेंध पर ही पकड़े जाने पर होती है।

दारोग़ा ने तीखी दृष्टि से इकट्ठे हुए मोहल्ले के लोगों को देखकर, एक ताव खाकर पैंतरा बदला और पुलिस की ओर इशारा करके गरजकर बोला, ''सबके हाथों में हथकडिय़ाँ कस दो!'' फिर चौकीदार की ओर मुडक़र कहा, ''तुम जरा मुखिया को तो ख़बर कर दो।'' कहकर वह आग उगलती आँखों से एक बार लोगों की ओर देखकर चारपाई पर धम्म से बैठ गया। उस वक़्त उसकी डंक-सी मूँछे काँप रही थीं।

लोगों को तो जैसे काठ मार गया हो। सब-के-सब सिर झुकाये हुए काठ के पुतलों की तरह जहाँ-के-तहाँ खड़े रहे। किसी के कण्ठ से बोल न फूटा। फूटता भी कैसे? पुलिस ने बारी-बारी से सबके हाथों में हथकडिय़ाँ कसकर, उन्हें दारोग़ा के सामने लाकर जमीन पर बैठा दिया।

गाँव के लोगों की भीड़ वहाँ जमा हो गयी। गोपीचन्द की बूढ़ी माँ जो अब तक मसलहतन चुप्पी साधे हुए थी, दरवाज़े पर ही बैठकर जोर-जोर से चीख़कर रो पड़ी। पता नहीं कहाँ से उसके दिल में अपनी विधवा बहू के लिए अचानक मोह-माया उमड़ पड़ी। गोपीचन्द का बूढ़ा बाप जो बरसों पहले से लगातार गठिया का रोगी होने के कारण चलने-फिरने से कतई मजबूर होकर ओसारे के एक कोने में पड़ा-पड़ा कराहा करता था, बाहर का हो-हल्ला और औरत की रुलाई सुनकर उठ बैठा और खाँसने-खँखारने लगा कि कोई उस अपाहिज के पास भी आकर बता जाए कि आख़िर बात क्या है!

गोपीचन्द गाँव का एक मातबर किसान था। भगवान् ने उसे शरीर भी खूब दिया था। तीस साल का वह हैकल जवान अपने सामने किसी को कुछ न समझता था। यही वजह थी कि इतना कुछ होने पर भी जमा हुई भीड़ में से कोई उसके ख़िलाफ कुछ कहने की हिम्मत न कर रहा था। उसे हथकड़ी पहने, सिर झुकाये, चुपचाप बैठे देखकर लोगों को आश्चर्य हो रहा था क्यों नहीं वही कुछ बोल रहा है? आख़िर इसमें उसका दोष ही क्या हो सकता है? किसी विधवा के लिए रजपूतों के इस गाँव में यह कोई नयी बात तो है नहीं। कितनी ही विधवाओं के नाम उनके होठों पर हैं, जो या तो पतित होकर मुँह काला कर गयीं, या किसी दिन लापता हो गयीं, या किसी कुएँ-तालाब की भेंट चढ़ गयीं। लेकिन जो भी हो, यह घर की बहू थी, इज्जत थी; इस तरह लापता होकर उसने कुल की मान-मर्यादा पर तो बट्टा लगा ही दिया। शायद इसी लज्जा के दुख के कारण वह इस तरह चुप है। होना भी चाहिए, इज्जतदार आदमी जो ठहरा!

साधारण गरीब आदमियों से उलझना पुलिस वाले नापसन्द करते हैं। बहुत हुआ तो इस तरह की वारदातों पर एकाध थप्पड़ लगा दिया, कुछ डाँट-फटकार दिया या गाली-गुफ्ता की एक बौछार छोड़ दी। वे जानते हैं कि उनसे उलझना अपना वक़्त बरबाद करना है, हाथ तो कुछ लगेगा नहीं। फिर गुनाह बेलज्जत का आजाब सिर पर क्यों लें? जान-बूझकर साधारण-से-साधारण बहाने पर भी उलझना तो उन्हें पैसेवाले इज्जतदारों से पसन्द है। दारोग़ा जी ने गोपीचन्द के इस मामले में जो इतनी फुर्ती, परेशानी और कर्तव्यय-परायणता का परिचय दिया, तो उन्हें किसी कुत्ते ने तो काटा नहीं था।

मुखिया के आते ही दारोग़ा आग के भभूके की तरह फट पड़ा। फिर उसने क्या-क्या कहा, कैसी-कैसी आँखें दिखाईं, क्या-क्या पैंतरे बदले और क्या-कुछ कर डालने की धमकियाँ ही नहीं दीं, बल्कि कर दिखाने के फतवे भी दे डाले, इसका कोई हिसाब नहीं। मुखिया होठों में ही मुस्कुराया, फिर गम्भीर होकर उसने वह सब पूरा कर डाला, जो दारोग़ा ने भूल से अधूरा छोड़ दिया था। फिर गोपीचन्द और उसके मोहल्ले के अपराधी लोगों को कुछ खरी-खोटी सुनाकर आप ही उनका वकील भी बन गया और उनकी ओर से माफी माँगने के साथ-साथ कुछ पान-फूल भेंट करने की बात चलाकर कहा, ''दारोग़ा जी, इस गोपीचन्द न तो एक बार जेल की हवा खाकर भी जैसे कुछ नहीं सीखा! यह फिर जेल जायेगा, दारोग़ा जी, आख़िर हम कब तक इसे बचाये रखेंगे? इसे यह भी मालूम नहीं कि एक बार दाग लग जाने के बाद फिर गवाही-शहादत की भी जरूरत नहीं रह जाती!'' फिर दूसरे लोगों की ओर हाथ उठाकर कहा, ''और इनको मैं कहता हूँ कि इसके साथ-साथ इन्हें भी बड़े घर की सैर का शौक चर्राया है!''

इसी बीच दारोग़ा अपना नया दाँव फेंकने के लिए अपनी मुद्रा उसके अनुकूल बनाने में काफी सचेष्ट रहा। मुखिया के चुप होते ही वह बरस पड़ा, ''नहीं, साहब, नहीं! यह ऐसी-वैसी कोई वारदात होती तो कोई बात न थी। मगर यह संगीन मामला है! आख़िर मुझे भी तो किसी के सामने जवाबदेह होना पड़ता है!'' कहकर वह ऐंठ गया।

मुखिया समझ गया। 'खग जाने खगही के भाखा!' हाथ बढ़ाकर उसने दारोग़ा का हाथ पकड़ा और उसे लेकर एक ओर हो गया।

दस मिनट के बाद वे लौटे, तो दारोग़ा ने नोट-बुक और पेंसिल जेब से निकालकर कहा, ''गोपीचन्द, तुम अपना बयान तो दो।'' फिर भीड़ की ओर देखकर पुलिस की ओर इशारा किया।

भीड़ भगा दी गयी। फिर गोपीचन्द के बयान दिये बिना ही दारोग़ा ने आप ही खानापूरियाँ कर लीं, वारदात में लापता विधवा के एक हाथ में रस्सी और दूसरे हाथ में घड़ा थमाकर उसे कुएँ पर भेज दिया गया और उसका पाँव काई-जमीं कुएँ की जगत पर फिसलाकर, कुएँ में गिराकर, उसे मार डाला गया। इधर गोपीचन्द की थैली का मुँह खुला, उधर कानून का मुँह बन्द हो गया। कहानी ख़त्म हो गयी।

गाँव में तरह-तरह की बातें उठीं। फिर 'बहुत सी खूबियाँ थीं मरने वाले में' के अनुसार लोगों ने उसके विषय में कोई चर्चा करके उसकी आत्मा को व्यर्थ कष्ट पहुँचाना अनुचित समझकर, अपने मुँह बन्द कर दिये। बात आयी गयी हो गयी। लेकिन...

दो

गोपीचन्द दो भाई थे। बड़े भाई मानिकचन्द और उसकी उम्र में मुश्किल से दो साल का फर्क था। पिता दो बैलों की खेती कराते थे। घर की भैंस थी। मानिकचन्द और गोपीचन्द भैंस का दूध पीते और घण्टों अखाड़े में जमे रहते। पिता ने उन्हें साँड़ों की तरह आजाद और बेफिक्र छोड़ दिया था। खेलने-खाने के यही तो दिन हैं; फिर जिन्दगी का जुआ कन्धे पर पडऩे के बाद किसे फुरसत मिलती है शरीर बनाने की? इसी वक़्त की बनी देह तो जिन्दगी-भर काम आएगी।

उगते हुए जवानों को आजादी, बेफिक्री, दूध और अखाड़े की कसरत जो मिली तो उनकी देह साँचें में ढलने लगी। उनकी जोड़ी जब अखाड़े में छूटती तो लोग तमाशा देखते और बड़ाई करते न थकते। जब अखाड़े से अपने सुडौल, खूबसूरत शरीर में धूल रमाये वे शेरों की तरह मस्त चाल से झूमते हुए घर लौटते, तो अपने राम-लक्ष्मण की जोड़ी देखकर माँ-बाप की छाती फूल उठती, चेहरा खुशी के मारे दमक उठता और उनकी आँखों से जैसे गर्व के दो दीप जल उठते। माँ उनकी बलैया लेती; बाप मन-ही-मन उनके लिए जाने कितनी शुभकामनाएँ करते!

बड़ाई जितनी मधुर है, उसका चस्का लग जाना उतना ही बुरा है। वह आदमी को अन्धा बना देती है! दोनों भाइयों के गढ़े-बने शरीर और उनके बल की बड़ाई गाँव में और आस-पास जो शुरू हुई, तो उन पर जैसे एक नशा-सा छा गया। खेल-खेल में जो कसरत उन्होंने शुरू की थी, वह धीरे-धीरे शौक बन गयी। फिर तो जैसे शरीर बनाने और बल बढ़ाने की जबर्दस्त धुन उनके सिर पर चढ़ गयी। माँ-बाप और गाँव के लोगों का बढ़ावा मिला। मानिक और गोपी की जोड़ी गाँव का नाम जवार में उजागर करेगी! और सचमुच मानिक और गोपी गाँव की शोहरत में चार चाँद लगाने को जी-जान से कटिबद्ध हो गये। बादाम घोटे जाने लगे, बकरे कटने लगे, घी में तर हलुए की सुगन्ध मोहल्ले में सुबह-शाम छायी रहने लगी। पिता अपनी गाढ़ी कमाई उन पर न्योछावर करने लगे। एक और दुधारू भैंस खूँटे पर आ बँधी।

नतीजा यह हुआ कि उम्र से दुगुना और तिगुना उनका शरीर और बल बढऩे लगा और पच्चीस का माथा छूते-छूते तो उनका शरीर और बल खासा हाथी की तरह हो गया। अब जो वे अखाड़े में छूटते, तो उनकी साँसों की फुँफकार की आवाज बीघों तक सुनायी पड़ती, जैसे दो साँड़ हुँकड़ रहे हों। जहाँ उनका पैर पड़ जाता, अखाड़े की जमीन बित्ता-बित्ता-भर धँस जाती और जो कोई अपनी जाँघ या बाजू पर ताल ठोंकता, तो मालूम होता, जैसे कोई बादल का टुकड़ा दूसरे बादल के टुकड़े से टकराकर गरज उठा हो। घण्टों वे दो पहाड़ों की तरह एक-दूसरे से टक्कर लेते और अखाड़े में जमे रहते। अखाड़े की मिट्टी खुद जाती, पसीने के धार बहने लगते, तब कहीं वे बाहर निकलने का नाम लेते। बाहर आकर वे हाथियों की तरह पसर जाते और उनके दो-दो, तीन-तीन शागिर्द हाथों में मिट्टी ले-लेकर उनके शरीर से बहते पसीनों की धारों को मल-मलकर घण्टों में सुखा पाते।

अब हाल यह था कि शरीर बेकाबू हुआ जा रहा था, अपार शक्ति की किरणें उनके रोम-रोम में फूट रही थीं, मोटी रगें सीमा तक स्वस्थ रक्त से फूल-फूलकर अब फटी-अब फटी-सी हो रही थीं और सुर्ख चेहरे से जैसे खून टपका पड़ रहा हो। ऊँचा माथा, रोबीली, खून उगलती-सी आँख, बाँकी मूँछें, सुडौल गरदन, उन्नत, चौड़ी-चकली, मैदान की तरह छाती, मांसल भुजाएँ, पुष्ट रानें, गठीली पिण्डलियाँ लिये, जोम से जरा शरीर को भाँजते, शक्ति और गर्व के नशे में मस्त हाथी की तरह झूमते जब वे चलते, तो लगता, जैसे उनके हर कदम के साथ जलजला चला आ रहा है, उनकी हर जुम्बिश पर दिशाएँ झुकी जा रही हैं, उनकी हर चितवन में ताकत की बिजलियाँ कौंध उठती हैं। माँ-बाप ने जब उन्हें ऐसी उन्नत अवस्था में देखा, तो गर्व और खुशी से फूले न समाये। गाँववालों ने देखा, तो आँखों में खुशी की चमक और होंठों पर सफलता की मुस्कुराहट लाकर कहा, ''हाँ, अब वह वक़्त आ गया, जिसका इन्तजार हमें बरसों से था। अब देखें, कौन माई का लाल हमारे गाँव के इन शेरों के जोड़े के सामने से सिर उठाकर चला जाता है।''

बाप से राय ली गयी, तो उन्होंने लापरवाही से कहा, ''अरे, अभी तो ये बच्चे हैं!''

लोगों ने समझाया, ''तुम बाप हो। बाप के लिए तो बेटा बूढ़ा भी हो जाये, तब भी बच्चा ही रहता है। मगर सच तो यह है कि चढ़ती जवानी की उम्र ही कुछ कर गुजरने की होती है। अब वक़्त आ गया है कि इनके बल, जोर और कुश्ती का डंका गाँव की हद में ही बँधा न रहकर पूरे जवार, तहसील और जिले में ही न बजे, बल्कि पूरे सूबे और देश में भी इनका नाम चमक उठे। तुम अगर इस समय किसी तरह की कमजोरी दिखाओगे, तो इनके हौसले पस्त हो जाएँगे। तुम इन्हें खुशी से आज्ञा दो कि ये अपने नाम और कुल के मान पर चार चाँद लगाने के साथ ही गाँव का नाम भी उजागर करें!''

बाप को अपने बेटों की ताकत का अन्दाजा न हो, ऐसी बात न थी। लेकिन उनके पितृ-हृदय में जहाँ बेटों को यशस्वी देखने की प्रबल कामना और उमंग थी, वहीं ममता और स्नेह की विपुलता के कारण जरा शंका और भय भी था कि कहीं...लोगों की बात सुनकर उनके होठों पर एक विराग की-सी मुस्कराहट फैल गयी, जैसे उन्हें अपने नाम और मान की कतई फिक्र न हो। नाम, मान, यश, वैभव की लालसा किसे नहीं होती! लेकिन यह लालसा दूसरों पर प्रकट कर इन दुर्लभ प्राप्तियों की महानता को कम करके कोई बुद्धिमान अपने को लोभी घोषित करके हास्यास्पद नहीं बनना चाहता। बाप अनुभवी आदमी थे। उन्होंने दिल की उठती उमंगों को दबाकर एक विरक्त की तरह कहा, ''अगर तुम लोग ऐसा ही समझते हो, तो मैं इसमें किसी तरह की बाधा डालना नहीं चाहता। आख़िर उन पर गाँव का भी तो वही अधिकार है, जो मेरा है। गाँव की ही मिट्टी-पानी-हवा से तो उनकी देह बनी है। तुम लोग उन्हीं से कहो। अब तक वे हर तरह से आजाद रहें। आज भी वे जैसा चाहें, करने को आजाद हैं।''

लोग खुश-खुश दोनों भाइयों के पास पहुँचे और उनके बाप की अनुमति की बात कहकर उन्होंने कहा, ''अब तुम लोग बताओ, तुममें से कौन पहले कुश्ती में उतरना चाहता है?''

वे दोनों अखाड़े में एक-दूसरे के दुश्मन बनकर उतरते थे, लेकिन अखाड़े के बाहर उनका आपसी व्यवहार इतना प्रेम-भरा था कि बस राम-लक्ष्मण का ही दृष्टान्त दिया जा सकता था। गोपी ने कहा, ''मेरे रहते भैया को कुश्ती में नहीं उतरना पड़ेगा। बाबूजी और भैया की शुभ कामना और आशीर्वाद का बल पाने का हक मुझे ही तो भगवान् की ओर से मिला है!''

मानिक गोपी से उम्र में बीस था, लेकिन शरीर और ताकत में गोपी मानिक से कहीं बीस था, यह खुद मानिक भी जानता था और गाँव के लोग भी। एक तरह से गोपी के पहले उतरने की बात से लोगों को भी खुशी ही हुई।

अच्छी सायत देखकर ब्राह्मण और नाई के साथ ललकार का पान जवार के नामी-गरामी पहलवानों के पास भेज दिया गया। इधर गोपी की तैयारी और जोर पकड़ गयी।

मानिक और गोपी के बारे में जवार के पहलवान बहुत-कुछ सुन ही न चुके थे, बल्कि उन्हें अपनी आँखों से देख भी चुके थे। उनमें से किसी को भी उनसे भिडऩे की हिम्मत न रह गयी थी। ब्राह्मण और नाई एक-एक कर सभी पहलवानों के यहाँ पहुँचे। लेकिन सब कोई-न-कोई बहाना करके टाल गये। आख़िर वे जवार के सबसे नामी बूढ़े जोखू पहलवान के अखाड़े में पहुँचे। जोखू को जब उनसे मालूम हुआ कि जवार का कोई भी पहलवान पान को हाथ लगाने की हिम्मत न कर सका, तो उसके अचरज का ठिकाना न रहा। ज्यादातर नामी पहलवान जोखू का लोहा मानने वाले या उसके शागिर्द थे। अपनी जवानी के दिनों में उसने एक बार जो अपना सिक्का जमा लिया था, वह आज के दिन तक वैसा ही जमा रहा था। किसी ने उससे भिडऩे की हिम्मत न की थी। उसी की तूती जवार में आज तक बोलती रही। आज अब वे जवानी के दिन न रहे। जोखू बूढ़ा हो चुका था। वह जानता था कि गोपी के मुकाबिले में उठकर वह अपनी उम्र-भर की सारी कमाई कीर्ति हमेशा के लिए खो देगा। लेकिन अब चारा ही क्या था? ब्राह्मण और नाई सब नामी-गरामी पहलवानों के यहाँ से, श्यामकर्ण घोड़े की तरह, गोपी की कीर्ति का फरहरा फहराते हुए चले आये थे। जोखू के यहाँ से भी अगर उसी तरह चले जाएँगे, तो लोग क्या समझेंगे? बूढ़ा शेर इस बेइज्जती की बात सोचकर तमतमा उठा! उसकी मर्दानगी को यह कैसे गवारा होता कि कोई ललकार कर उसके सामने से निकल जाए? जोखू बूढ़ा हो गया है। अब वह शरीर और बल नहीं रह गया। फिर भी पुराने खून का वह मर्द है, सच्चा मर्द! यों ललकार को स्वीकार किये बिना ही कायरों की तरह पहले ही वह कैसे सिर झुका देता? उसने पान उठा लिया और गरजकर, बजरंग बली की जय बोलकर उसे मुँह में डाल लिया।

लोगों ने जब यह सुना, तो अचरज करने के साथ ही वे बूढ़े जोखू की मर्दानगी और हिम्मत की दाद दिये बिना नहीं रह सके। उनके मुँह से सहसा ही निकल पड़ा कि जवार के जवान पहलवानों को चुल्लू-भर पानी में डूब मरना चाहिए! गोपी ने जब यह सुना, तो जैसे छोटा हो गया। अपने बाप की उम्र के पहलवान से लडऩा उसे कुछ जँचा नहीं। वह तो अपनी उम्र और जोड़ के किसी प_ से भिडऩा चाहता था। लेकिन अब हो ही क्या सकता था? एक बार बदकर कुछ और किया ही कैसे जा सकता था।

नियत तिथि पर गाँव का अखाड़ा बन्दनवार, अशोक के पत्तों के फाटकों और रंग-बिरंगी कागज की झण्डियों से खूब सजाया गया। वक़्त के बहुत पहले ही से जवार और दूर-दूर के गाँवों के लोगों की भीड़ जमने लगी।

माँ-बाप के आशीर्वाद लेकर फूलों के हारों से लदे हुए दोनों भाई बाजे-गाजे के साथ अपने गाँव के लोगों की भीड़ के आगे-आगे अखाड़े की ओर चल पड़े। भीड़ उमंग में बावली होकर बजरंग बली की जयजयकार से आसमान को गुँजा रही थी। लेकिन गोपी के दिल में वह खुशी, उत्साह और उमंग न थी, जिसकी उसने कभी ऐसा मौका आने पर कल्पना की थी। फिर भी मन की बात दबाकर वह ऊपरी जोश से भीड़ की खुशी में हिस्सा ले रहा था।

अखाड़े पर दो ओर से एक ही वक़्त गोपी और जोखू के दल पहुँचे। दोनों दलों ने जयजयकार की। मारू बाजे जोर-जोर से बजने लगे। वातावरण के कण-कण में वीर रस का संचार हो रहा था। भीड़ की आँखों में खुशी और उत्सुकता चमक रही थी। सब-के-सब अखाड़े के पास ही पिले पड़ रहे थे। गोपी और जोखू के अभिभावक उन्हें चारों ओर से घेरे शाबाशी के साथ ही तरह-तरह के गुर की बातों का जिक्र कर रहे थे। कोई बुज़ुर्ग पीठ ठोंककर उत्साह बढ़ा रहा था, तो कोई हम-उम्र हाथ मिलाकर विजय की कामना कर रहा था और सब छोटे शागिर्द पाँव छूकर सफलता के लिए भगवान् से प्रार्थना कर रहे थे।

गोपी अखाड़े में कूदे, इसके पहले ही मानिक ने उसके कान के पास मुँह ले जाकर चुपके-चुपके कहा, ''बूढ़ा पुराना खुर्राट उस्ताद है। ज्यादा मौका न देना। हाथ मिलाते ही, पलक मारते ही...समझे? वरना कहीं गुँथ गया, तो फिर घण्टों की छुट्टी हो जाएगी! फिर हार भी खाएगा, तो कहने को रह जाएगा कि एक तो बूढ़े से लडऩा ही गोपी-जैसे जवान की ज्यादती थी, दूसरे लड़ा भी तो कहीं घण्टों में रीं-रीं कर...सो, यह कहने का मौका किसी को न मिले। बस, चटपट...''

दो ओर से कूदकर वे अखाड़े में उतरे। दोनों ओर से जोर-जोर की जयकार हुई। मारू बाजे और जोर से बज उठे। भीड़ की आँखों की उत्सुकता की चमक में पुतलियों की थर्राहट बढ़ गयी।

दोनों ने झुककर अखाड़े की मिट्टी चुटकी से उठाकर माथे में लगाकर अपने गुरु का स्मरण किया। फिर हाथ मिलाने को एक-दूसरे की आँखों से आँखें मिलाये आगे बढ़े। हाथ बढ़े, अँगुलियाँ छुईं कि सहसा जैसे बिजली-सी कौंध गयी। गोपी ने जाने कैसे दाहिना पैर जोखू की कोख में मारा कि बूढ़ा एक चीख के साथ हवा में उछला, हवा ही से जैसे एक आह की आवाज आयी और दूसरे ही क्षण अखाड़े की मेंड़ पर पहाड़ के एक टुकड़े की तरह वह भहराकर गिर पड़ा। भीड़ में सन्नाटा छा गया। मारू बाजा थम गया। उसके दल के लोग आशंका से काँपते हुए उसकी ओर बढ़े। झुककर देखा तो वह ठण्डा पड़ चुका था। अब क्या था, उनकी आँखों में क्रोध के शोले भडक़ उठे। ''यह अन्याय है, यह धोखा है, हाथ मिलाने के पहले ही गोपी ने जोखू उस्ताद को मार डाला। कुश्ती के कायदे को इस कायर ने तोड़ा है...हम इसे जीता न छोड़ेंगे।'' इत्यादि क्रोध और क्षोभ में चीखती आवाजें भीड़ से उठ पडीं। गोपी ठक खड़ा था। उसकी समझ में खुद न आ रहा था कि अचानक यह क्या हो गया। लेकिन अब समझने-बूझने का मौका ही कहाँ था? जब जोखू के दल ने लाठियाँ उठा लीं तो दूसरा दल चुप कैसे रहता? लाठियाँ पट-पट बजने लगीं। तमाशबीनों में भगदड़ मच गयी। कइयों के सिर से खून की धारें बह चलीं, कई हाथ-पैर में चोट खाकर गिरकर तड़पने लगे। आख़िर जब जोखू के दलवालों ने देखा कि उनका पल्ला कमजोर पड़ रहा है, तो उनमें से कइयों ने खुद बीच-बचाव का शोर उठाया और अपने लोगों को ही रोकने लगे। गोपी के अपने गाँव का मामला था। जोखू के दल वाले पराये गाँव के थे। अगर रोक-थाम की उन्हें न सूझती तो एक आदमी भी बचकर न जा पाता। लाठियाँ धीरे-धीरे थम गयीं। फिर कचहरी में समझ लेने की धमकी देकर वे चले गये।

ऐसी वारदात को लेकर कचहरी दौडऩा स्वयं उनके लिए कोई प्रतिष्ठा की बात न हीं थी। इससे इज्जत घटती ही, बढ़ती नहीं। जोखू पहलवान की इस तरह जो मौत हो गयी थी, इससे जवार में क्या उनकी कम किरकिरी हुई थी, जो वे भरी कचहरी में इस बदनामी का ढोल पीटते। हलके के दारोग़ा ने पहले जरूर इस्तगासा दाखिल करने पर जोर दिया, लेकिन गोपी के दल ने जैसे ही उसकी जेब गरम कर दी, वह भी चुप्पी साध गया।

जो भी हो, इस वारदात का इतना नतीजा जरूर हुआ कि जोखू के गाँव वाले हमेशा के लिए गोपी और उनके खानदान के प्राणलेवा शत्रु बन गये। उनके दिलों में एक घाव बन गया। गोपी के दिल पर जोखू की इस तरह हुई मौत का इतना असर पड़ा कि उसने हमेशा के लिए लँगोट उतार फेंका। मानिक और गाँव के लोगों ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह टस-से-मस न हुआ। वह अब हर तरह से घर-गिरस्ती के कामों में बाप की मदद करने लगा।

तीन

धीरे-धीरे वे बातें पुरानी पड़ गयीं। बाप को अब अपने बेटों की शादी की फिक्र हुई। इसके पहले भी कई जगहों से रिश्ते आये थे, लेकिन उन्होंने ''अभी क्या जल्दी है?'' कहकर टाल दिया था। अबकी संयोग से एक ऐसा रिश्ता आ गया कि उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। सीता और उर्मिला की तरह दो प्रेममयी, सगी, प्रतिष्ठित कुल की सुशील बहनों की एक ही साथ दोनों भाइयों से सम्बन्ध की बात चली। जैसे बेटे थे, वैसे ही बहुएँ मिलने जा रही थीं। माँ तो वर्षों से बहुओं का मुँह देखने को तड़प रही थी। इस रिश्ते की चर्चा जिसने भी सुनी, उसी ने बाप को राय दी कि, ''बस, अब कुछ सोचने-समझने की बात नहीं है। यह भगवान् की किरिपा है कि ऐसी बहुएँ मिल रही हैं। एक ही साथ जैसे दोनों बेटों के सभी संस्कार हुए, वैसे ही एक ही साथ ब्याह भी जितनी जल्दी हो जाए, अच्छा है।''

खूब धूम-धाम से ब्याह हो गया। दो-दो सुशील सुन्दर बहुएँ घर में एक साथ क्या उतरीं, घर खमखम भर गया। माँ-बाप की खुशी का ठिकाना न रहा। जब उन्होंने देखा कि सचमुच बहुएँ उससे कहीं बढ़-बढक़र हैं जैसा कि उन्होंने सुना था, तो उनके सन्तोष-सुख के क्या कहने!

गोपी प्यारी पत्नी के साथ ही प्यारी भाभी पाकर निहाल हो गया। उसके लिए घर का संसार इतना मोहक, इतना सुखकर हो उठा कि वह बस घर में ही रमकर रह गया। बाहरी संसार से उसने एक तरह से नाता ही तोड़ लिया। वह एक धुन का आदमी था। पहले सांसारिक बातों, से अपना शरीर बनाने और कसरत की धुन में, कोई दिलचस्पी ही न थी। अब एक छूटा, तो दूसरे से वह इस तरह चिपक गया कि लोग देखते तो ताज्जुब करते। लोकाचार के बन्धनों के कारण उसे अपनी बीवी से मिलने-जुलने की उतनी आजादी न थी, जितनी भाभी से। भाभी से वह खुलकर मिलता और हँसी-मजाक के ठहाकों से घर को गुँजा देता। माँ-बाप का दिल घर के इस सदा हँसते वातावरण को देखकर खुशी से झूम उठता। मानिक को इन बातों में खुलकर हिस्सा लेने की आजादी न थी, फिर भी वह गोपी और भाभी का स्नेहमय व्यवहार देखकर मन-ही-मन हर्ष-विभोर हो उठता। भाई-भाई का प्रेम, बहन-बहन का प्रेम, देवर-भाभी का प्रेम, पुत्र माता-पिता, वधुओं का प्रेम, ऐसा लगता था जैसे चौबीसों घण्टे उस घर में अमृत की वर्षा होती हो-छक-छककर, नहा-नहाकर घर का प्रत्येक प्राणी आनन्द-विभोर है; कोई दुख नहीं, कोई अभाव नहीं, कोई चिन्ता नहीं, कोई शंका नहीं।

क्या अच्छा होता अगर वह फुलवारी हमेशा ऐसी ही गुलजार बनी रहती, इसके पौधे और फूल हमेशा इसी तरह खुशी से झूमते रहते! लेकिन दुनिया की वह कौन गुलजार फुलवारी है, जिसके पौधे और फूलों की खुशी को पतझड़ अपने मनहूस कदमों से नहीं रौंद देता?

मुश्किल से इस खुशी के अभी छ: महीने भी न गुजरे होंगे कि एक काली रात को खुशी की इस दुनिया के एक कोने में आग लग गयी। मानिक सत्यनारायणजी की कथा के लिए कुछ जरूरी सामान लेने कस्बे गया था। लौटने लगा तो काफी रात हो गयी थी। कस्बे से उसके गाँव का रास्ता जोखू के गाँव के सीवाने से होकर था। सामान की गठरी काँधें पर लटकाये वह तेजी से कदम बढ़ाये चला आ रहा था। उस गाँव के सीवाने के एक बाग में वह पहुँचा तो सहसा उसे लगा कि उसके पीछे कुछ लोग आ रहे हैं। मुडक़र उसने देखना चाहा कि तड़ाक से एक भरपूर लाठी उसके सिर पर बज उठी। फिर कई लाठियाँ साथ-साथ उसके ऊपर चारों ओर से बिजली की तेजी से चोट करने लगीं। उसका होश गायब हो गया। वह ज्यादा देर तक अपने को सँभाल न पाकर गिर पड़ा। सिर फट गया था। खून के धार बह रहे थे। इतने में उसे लगा कि किसी ने उसकी गर्दन पर लाठी पट करके रखी है, फिर उसे जोर से दबाया गया है। उसकी साँसें घुटती गयीं; आँखें बाहर निकल आयीं।

हत्यारे लाश को ठिकाने लगाने की बात अभी सोच ही रहे थे कि कुछ लोगों के आने की आहट पाकर भाग चले। वे लोग भी कस्बे से ही आ रहे थे। बाग में ऐन राह पर खून और लाश देखकर वे आशंका से ठिठक गये। गाँव के लोग ऐसी वारदातों में शहरियों की तरह भय खाकर भाग नहीं खड़े होते। ऐसे वक्तों पर भी अपना कर्तव्यं निभाना खूब जानते हैं। उन्होंने झुककर देखा और मानिक को पहचाना, तो उनके दुख की हद न रही। जवार का कोई ऐसा आदमी न था, जो उन दो भाइयों को और उनकी ताकत और बहादुरी को न जानता हो। क्षण-भर में उन्हें जोखू के साथ गोपी की कुश्ती की बातें याद हो आयीं। फिर सब-कुछ उनकी समझ में आप ही आ गया। जोखू के गाँववालों के इस बुजदिलाना व्यवहार से वे क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने एक आदमी को गोपी को ख़बर करने को भेजा। साथ ही उससे यह भी कहने को कहा कि पूरे दल-बल के साथ उसके गाँव वाले अभी आ जाएँ, ताकि इन बुजदिलों से मानिक की हत्या का बदला टटके ही ले लिया जाए।

''बेचारा मानिक! उसकी जवान बहू की जिन्दगी हमेशा के लिए दुखी हो गयी! इन कायरों को इनका जघन्य पाप निगल जाएगा। बदला ही लेना था, तो मर्दों की तरह मैदान में लेते!'' मानिक की लाश को घेरे हुए विषाद और क्रोध में बड़बड़ाते वे लोग वहीं बैठ गये।

गोपी के घर ख़बर पहुँची। माँ-बहुएँ छाती पीट-पीटकर, पछाड़ें खा-खाकर, चीख-चीखकर रो पड़ीं। गोपी को जैसे साँप सूँघ गया। वह सिर पकडक़र जहाँ का तहाँ बैठ गया। बाप दिल पर जैसे घूँसा खाकर पत्थर के बुत बन गये। इस आकस्मिक वज्रपात से उनका मस्तिष्क ही शून्य हो गया था।

सारे गाँव में इस हादसे की ख़बर बिजली की तरह फैल गयी। चारों ओर एक कुहराम-सा मच गया। सारा-का-सारा गाँव लाठी सँभाले हुए गोपी के दरवाज़े पर दुख और क्षोभ से पागल होकर इकट्ठा हो गया। औरतें उनकी माँ और बहुओं को सँभालने लगीं। बड़े-बूढ़े पिता को समझाने-बुझाने लगे। लेकिन जवानों को कहाँ चैन था? चारों ओर गोपी को घेरकर उसे भाई की हत्या का बदला लेने को ललकारने लगे।

थोड़ी देर तक तो गोपी सुध-बुध खोये उनकी बात सुनता रहा। फिर जैसे उसकी आँखों में लुत्तियाँ छिटकने लगीं। वह तड़पकर उठा और कोने में खड़ी गोजी उठाकर घायल शेर की तरह दौड़ पड़ा। उसके पीछे-पीछे गाँव के लट्ठबाज नौजवान आँखों में बदले की आग लिये बढ़ चले। उधर ख़बर पाकर चौकीदार थाने की ओर दौड़ा।

जोखू के गाँव वालों को इस वारदात की कोई ख़बर न थी। उसके चन्द शागिर्दों का ही यह षड्यन्त्र था। उन्होंने अपना काम किया और चम्पत हो गये। गाँववालों ने जब गाँव की ओर बढ़ता शोर सुना, तो सोचा कि शायद यह कोई डाकुओं का गिरोह गाँव को लूटने आ रहा है। पूरे गाँव में तहलका मच गया। नौजवानों ने लाठी सँभालकर मुकाबिले का निश्चय किया और जिधर से वह शोर बढ़ता आ रहा था, उधर गाँव के बाहर ही वे भिड़ पडऩे को दौड़ पड़े। औरतों और बूढ़ों का कलेजा धक-धककर रहा था। बच्चे बिलबिला उठे थे।

गोपी का दल पास पहुँचा, तो सामने लाठियाँ उठी देखकर उन्होंने समझ लिया कि खुली फौजदारी की तैयारी इन्होंने पहले ही से कर रखी है। समझने-बूझने की स्थिति में कोई दल न था। एक-दूसरे पर वे भूखे शेरों की तरह झपट पड़े। लाठियाँ पटापट बजने लगीं। अँधेरे में सैकड़ों बिजलियाँ कौंधने लगीं। अँधेरे में अन्धों की तरह बस अन्धाधुन्ध लाठियाँ चल रही थीं। किसके दल का कौन घायल होकर गिरता है, किसकी लाठी किस पर और कहाँ गिरती है, यह जानने की सुध-बुध किसी को न थी। एक ओर मानिक की हत्या के बदले की लपटें जल रही थीं, तो दूसरी ओर अपनी जान-माल की रक्षा का सवाल था। कोई दल अपनी हार कैसे मान लेता? देखते-देखते कई लोथें जमीन पर तपडऩे लगीं। खून की बौछारों से जगह-जगह फिसलन हो गयी। लेकिन इसकी ओर ध्यान देने का अवकाश किसे था? वहाँ तो जान देने और लेने की बाजी लगी थी।

मानिक की लाश थाने पर ले जाने का हुक्म देकर दारोग़ा और नायब दस हथियारबन्द कांसटेबलों के साथ चौकीदार को आगे करके घटनास्थल की ओर लपके। लाठियों की पटापट सुनकर उन्होंने टार्च जलाकर सामने का विकट दृश्य देखा, तो रिवाल्वर निकाल लिया और कांसटेबलों को हवाई फायर करने का हुक्म दिया।

फायरों की आवाज़ सुनकर दोनों दलवालों ने समझ लिया कि पुलिस की दौड़ आ गयी। वे अपनी लाठियाँ रोक भी न पाये थे कि पुलिस दनदनाती पहुँच गयी। लोक भागने को ही थे कि चारों ओर से पुलिस की संगीनों से घिर गये। टार्चों की रोशनी से उनकी आँखें चौंधिया रही थीं। देखते-देखते ही उनके हाथों में हथकडिय़ाँ पड़ गयीं।

गोपी के बायें हाथ की तीन उँगलियाँ पिस गयी थीं और गले के पास की दाहिनी पसली में गहरी चोट आयी थी। लेकिन विषाद और क्रोध के झोंके में वह इस तरह ग़ाफिल था कि दूसरे दिन सुबह उसकी आँखें परगने के अस्पताल में खुलीं, तो उसे इसका ज्ञान न था कि वह कहाँ है, उसके हाथ, गले और छाती में पट्टियाँ क्यों बँधी हैं, उसका शरीर क्यों चूर-चूर हो गया है, उसका माथा क्यों जोर-जोर से झनझना रहा है? उसके अगल-बगल और भी उसके गाँव और जोखू के गाँव के जवान उसी की हालत में पड़े हुए थे। सब एक-दूसरे को टक-टक, फटी आँखों से ताक रहे थे। लेकिन जैसे किसी में भी कुछ कहने-सुनने की ताकत ही न थी, जैसे वे सब अपने लिए और एक-दूसरे के लिए समस्या बने हुए हों।

मानिक रहा नहीं, घायल गोपी कानून की गिरफ्त में पड़ा हुआ फैसले का इन्तज़ार कर रहा है। माँ-बाप और बहुओं के सिर पर एक साथ ही जैसे पहाड़ गिर पड़ा। इसके नीचे वे दबे हुए छटपटा रहे हैं, कराह रहे हैं, तड़प रहे हैं।

गाँव में कई घरों में मातम छाया है, कई घरों में दुख की घटा घिरी है। लेकिन गोपी के घर का विषाद जैसे फैलकर पूरे गाँव पर छा गया है। लोग उसके घर भीड़ लगाये रहते हैं। कभी माँ-बाप को समझाते हैं, कभी सान्त्वना देते हैं और कभी अपने को भी सँभालने में असमर्थ होकर उन्हीं के साथ-साथ खुद भी रो पड़ते हैं।

मुकद्दमे की पैरवी का इन्तजाम हो रहा है। सब-के-सब अपनी गाढ़ी कमाई बहा देने को तैयार हैं। गाँवदारी का मामला है; गाँव के नौजवानों की ज़िन्दगी का वास्ता है, और सबसे बढक़र गाँव की आँखों के तारे, माँ-बाप के अकेले सहारे, तड़पती और दुर्भाग्य की मारी बेवा भाभी की ज़िन्दगी की अकेली आशा, गोपी को बचा लेने का सवाल है। बहुओं के बाप और बड़े भाई भी इस विपत्ति की ख़बर पाकर आ गये हैं। उनके भी दुख का ठिकाना नहीं है। वे भी गोपी को बचा लेने के लिए सब-कुछ न्योछावर करने पर तुले हैं।

कोई भी रकम कानून का मुँह बन्द करने में असमर्थ है। पाँच आदमियों का कतल हुआ है, एकाध की बात होती,तो दारोग़ा पचा-खपा देता। वह मजबूर है। हाँ, जिले के बड़े अफसर कुछ जरूर कर सकते हैं, लेकिन उनके यहाँ इन देहातियों की पहुँच नहीं।

घायल अच्छे हो-होकर हवालात में पड़े हैं। मुकद्दमा सेशन सुपुर्द है। फौजदारी के सबसे बड़े वकील को किया गया है। उसकी बहुत कोशिशों पर भी किसी की ज़मानत मंजूर नहीं हुई।

पिता एक बार गोपी से मिल आये हैं। मिलते वक़्त दोनों ने अपने दिल-दिमाग पर पूरा-पूरा काबू रखने की कोशिश की थी। किसी प्रकार की दुर्बलता या तड़पन दिखाकर वह एक-दूसरे का दुख बढ़ाना न चाहते थे। बाप ने बेटे को ढाढस बँधाया। बेटे ने बाप को कोई चिन्ता न करने को कहा। और कोई विशेष बात नहीं हुई। बिछड़ते समय, पता नहीं, दिल के किस दर्द में जोफ में गोपी ने कहा, ''भौजी का ख़याल रखियो!''

उस एक बात में कितना दर्द, कितनी कलक, कितनी तड़पन थी, बाप ने उसका अनुमान करके ही ऐंठता दिल लिये मुँह फेर लिया था। उधर गोपी ने आँसू पोंछ लिये, इधर जेल के फाटक पर बाप ने अपनी आँखों के आँसुओं को पलकों में ही सँभाल लिया।

आख़िर मुकद्दमे का फैसला हुआ। सज़ा सबको हुई। किसी को बीस साल, तो किसी को चार और किसी को पाँच साल के लिए जेल भेज दिया गया। गोपी को पाँच साल की सजा मिली। उसके घर में धीमा हुआ मातम फिर एक बार जोर पकड़ गया। माँ-बाप के दुख का क्या कहना! बड़ी बहू की हालत तो अबतर थी ही। छोटी बहू के दिल में भी एक शूल चुभ गया।

 


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