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कविता

प्रिय पप्पू / लल्ली के नाम पाति
जसबीर चावला


प्रिय पप्पू / प्रिय लल्ली
और सारे प्रेमी / प्रेमिकाओं
मैंने चस्पा किये हैं
तुम्हारे नकली नाम
ताकि पहचान छुपी रहे
पर सवाल मेरे
असली हैं
००
बाग में मैंने देखा
पाम ट्री पर
कील से खुदा
तुम्हारा नाम
संग जीने मरने की कसमें / वादे
और दिल का निशान
आर पार निकला तीर
खुदी तारीख
कोई दस बरस पहले की
००
आगरा के ताजमहल में
तुम्हारा नाम
अंजता / एलोरा में
लालकिला / चारमीनार / कुतुबमीनार
खजुराहो / कोणार्क
देश भर में
ट्रेनों के बाथरूम में भी
उकेरे / खोदे / लिखे
अपने शुभ नाम
कील / कोयले / ईंट / कलम से
छत / दीवार/ पेड़ पर
ओर बनाये
तीर बिंधे दिल / लिखी कसमें
साथ जीने / मरने की
००
भूटान की पारो वेली देखी
म्युजियम की दीवारों पर तुम थे
नाम थिनले / जिग्मे वांगचू / ताशी / पेमा
००
इजिप्ट के लक्सर / करणक मंदिर में
गीजा में कोफू के पिरामिड / अबू सिंबेल में भी
दीवारें कर रही बयाँ
हाल-ए-दिल
तारीखें डली थी
आमद की
वहाँ तुम सना / इरफान / सलमा / सलमान थे
००
केलिफोर्निया का यसोमिते पार्क
तीन हजार साल पुराने ऊँचे पेड़
टाँगे हैं परचम तुमने
उन पर भी
मोहब्बत के इजहार के
कहीं लिखा नाम डेविड / लीसा
कहीं लिंडा / जान / स्टेला / राबर्ट
संसार का हर देश / हर नाम
००
पप्पू में तुमसे पूछता हूँ
लल्ली कैसी / कहाँ है
जिंदा है
मर गई / मारी गई
दहेज की वेदी पर
या
झेल रही दंश
बेटियाँ पैदा करने का
इरफान तुम बोलो
सना को दे चुके तलाक
कह कर तीन तलाक
कर लिये दो निकाह / बीवियाँ
भूल कर
शरियत क्या कहती है
और डेविड से स्टेला तक
बोलो
अब तक बदले
कितने ब्वाय फ्रेंड / गर्ल फ्रेंड
कितनी अँगूठियाँ पहनी / उतारी
वेडिंग गाऊन
ये बच्चे उस पति से / ये उस पत्नी के / ये हम दोनों के
क्या यही कैफियत है
उस प्यार की
टँगा है जो
किसी पेड़ के तने पर
छत / दीवार पर
लिखा है जहाँ
धुंधलाई इबारत से
आय लव यू लल्ली
आय लव यू पप्पू

 


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