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कविता

खैंच रे राम्या खैंच
जसबीर चावला


तलाव चौक
कस्बा खरगोन
खुरदरी / पथरीली नगी जमीन
देख रहे तमाशबीन
निम्न मध्यमवर्गीय युवक
निर्ममता से खींच / पीट रहा
जमीन पर अधलेटी
महिला के बाल पकड़
घसीट रहा
चीख रही महिला प्रतिरोध में
नहीं जाऊँगी / रहूँगी
तेरे घर
मर जाऊँगी
*
हाथ से आँचल ढाँकती / साड़ी सँभालती
लोलुप निगाहों से बचने की
असफल कोशिश करती
बेबस / कातर निगाहों से
ताकती
मदद की अपेक्षा करती
*
अधेड़ वय का एक व्यक्ति
चिल्ला रहा बार बार
मैं ससुर हूँ लड़की का
खैंच रे राम्या खैंच
राम्या खैंच
उसे घसीट / खींच
*
किसी एक ने की हिम्मत
उसे रोका / टोका
छोड़ दे उस महिला को
मत मार
तल्खी से बोला अधेड़
आप मत बोलो बाबूजी
बीच में
यह उसकी बीवी है
घर नहीं जा रही / घर छोड़ आई
मरद है यह उसका
हक है उसका
*
चाहे पीटे / मारे / काटे
मरद लुगाई का मामला है
आपका कोई हक नहीं
खैंच राम्या खैंच
खैंच राम्या खैंच
*
बीत गये / कमोबेश
साढ़े पाँच दशक
क्या बदला
'मैं'
तुम / हम / आज भी
चश्मदीद हैं
उस घटना / घटनाओं के
तमाशबीन हैं
चुप हैं
आज भी
ताक रही कातर / सूनी निगाहें
आ रही आवाजें
दाएँ से बाएँ से
समाज के हर वर्ग से
हर दिशा से
खैंच रे राम्या खैंच
खैंच...!

 


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