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कविता

गांधी : आ अब लौट चलें
जसबीर चावला


अप्रासंगिक हुए
लद गये दिन गाँधी के
विचार बिका
प्राण प्रतिष्ठा के पहले
गांधी निष्प्राण हुए
चौराहों के गांधी
बुत रह गये
नाम चला / भुन चुका
अब गांधी
वोट जुगाड़ू नहीं
वोट कटवा है
वैश्विकरण की आंधी / शोर में
कौन सुनेगा गाना
'पाई चवन्नी चाँदी की
जय बोलो महात्मा गांधी की

गांधी दर्शन नहीं
बिकता है लुगदी साहित्य
गांधी पुस्तक भंडार में
डूब रहे संस्थान
अपने ही भार से
एम जी रोड
था कभी महात्मा गांधी मार्ग
महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज
अब एम जी एम है
दादागिरी
की पैरोडी
गांधीगिरी

कुछ सर्वोदयी बेबस बूढ़े
आश्रमों / घरों में
अरण्य रोदन करते
गिनते दिन
पहन / बेच खादी
फेर सुमरनी / चलाते चरखा / तकली
बनाते गुंडी
गुंडों के गले डलती
सूत माला
ढो रह पालकी
गांधी बाबा के नाम की

नया निजाम / नये लोग
नई मुद्रा / नये नोट
प्रतीक
नये बुत / देवता
अपने चारण / अपने भाट
पट्टी बांधा राष्ट्रवाद
लकीरों को छेड़ो / मिटाओ
बगल में खींचो
कथित बड़ी लकीर
गांधी मिटाओ / हटाओ
इतिहास को पोतो
जय जय कार
ओर बड़े पुरस्कार
इतिहास चुगली कर रहा
चमड़े के सिक्के चलाये
भिश्ती ने एक बार

 


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