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कविता

वे जा रहे वे आ रहे
जसबीर चावला


बरसों झेला
सहते रहे
उनकी चालाकियाँ / नादानियाँ / लफ्फाजियाँ
दुख नहीं
वे अब जा रहे

दुख है
आ रहे वे
कसने के लिये
मुश्कें / बेड़ी डंडा
विभाजन के लिये
जरीब / खसरा
इतिहास के सुप्त कंकाल
पुरोगामी विचार
लाव लश्कर / वानर सेना
छुपा एजेंडा
बापू / बाबा
चिलम / चिमटे / धुआँ
करकट / दमनक
हुआ हुआ

क्षितिज धुँधला / गर्द गुबार
राम भली करे

 


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हिंदी समय में जसबीर चावला की रचनाएँ