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कविता

इतिहास का प्रहसन
जसबीर चावला


टीवी में बिछी
अतीत की बिसात
रची रणभूमि
कुछ कुटिलों ने हथियार उठाये
जो इतिहास की परिधि तक में न थे
स्वयं कभी
वे इतिहास पुरुषों को जगाने लगे
आरती गाने लगे
हाथों में थमा दी तलवारें नायकों के
जो बैठते एक जाजम
बहस / विमर्श करते
वैमनस्य से परे
वर्तमान में कठपुतली बना
भाँजने लगे / वार करने लगे
अखबारी पन्नों पर
एक दूसरे पर
बेचारे नायक
**
इतिहास तो इतिहास है
प्रहसन नहीं
अतीत में जाकर
मिटाने से मिटता नहीं
न पराजित होता
मसखरों की लीला से

 


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