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कविता

रीढ़ की हड्डी
जसबीर चावला


जानते हैं हम
लड़ रहे वे
इक हारी लड़ाई
हौसला है बुलंद फिर भी
न हो दर्ज इतिहास के पन्नों में
या शिलालेखों पर
नाम उनका
किस्सों में तो जिक्र होगा
कि तने रहे जीवन भर
झुके नहीं
न जुहार / सलाम / समर्पण
शक्ति भर लड़े / बहुत भोगा
काफी है उनकी इतनी रोशनी
नये पत्तों के लिये
ओर वे जो सालों से रेंग रहे
सीख नहीं सकते
न चाहतें हैं
क्या जानें केंचुए
और वे भी
रीढ़ क्या / क्यों होती है

 


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हिंदी समय में जसबीर चावला की रचनाएँ