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कविता

लकड़हारे कभी नहीं लौटे थे
जसबीर चावला


उन्होंने सीखा है
जन्मना
बस नापना / काटना
फाड़ना / टुकड़ों में बाँटना
आदिम प्रवृत्ति / आदिम कबीले
उनकी फितरत / शोहरत / राजनीतिक वृत्ति
हाँका हाँकना
झींगा लाला हो हडिंबा हो
जंगल नहीं रहे
लकड़ी का अकाल
तो टोटा कहाँ
मनुष्यों का

 


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हिंदी समय में जसबीर चावला की रचनाएँ