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कहानी

रहोगी तुम वही
सुधा अरोड़ा


( एक)

'क्या यह जरूरी है कि तीन बार घंटी बजने से पहले दरवाजा खोला ही न जाए? ऐसा भी कौन-सा पहाड़ काट रही होती हो। आदमी थका-मांदा ऑफिस से आए और पाँच मिनट दरवाजे पर ही खड़ा रहे...'

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'इसे घर कहते हैं? यहाँ कपड़ों का ढेर, वहाँ खिलौनों का ढेर। इस घर में कोई चीज सलीके से रखी नहीं जा सकती?'

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'उफ्! इस बिस्तर पर तो बैठना मुश्किल है, चादर से पेशाब की गंध आ रही है। यहाँ-वहाँ पोतड़े सुखाती रहोगी तो गंध तो आएगी ही... कभी गद्दे को धूप ही लगवा लिया करो, पर तुम्हारा तो बारह महीने नाक ही बंद रहता है, तुम्हे कोई गंध-दुर्गंध नहीं आती।'

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'अच्छा, तुम सारा दिन यही करती रहती हो क्या? जब देखो तो लिथड़ी बैठी हो बच्चों में। मेरी माँ ने सात-सात बच्चे पाले थे, फिर भी घर साफ-सुथरा रहता था। तुमने तो दो बच्चों में ही घर की वह दुर्दशा कर रखी है, जैसे घर में क्रिकेट की पूरी टीम पल रही है।'

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'फिर बही शर्बत ! तुम्हें अच्छी तरह मालूम है - मेरा गला खराब है। पकड़ा दिया हाथ ठंडा शर्बत। कभी तो अक्ल का काम किया करो। जाओ, चाय लेकर आओ... और सुनो, आगे से आते ही ठंडा शर्बत मत ले आया करो। सामने... बीमार पड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता मैं। ऑफिस में दम लेने की फुर्सत नहीं रहती मुझे... पर तुम्हें कुछ समझ में नहीं आएगा... तुम्हें तो अपनी तरह सारी दुनिया स्लो मोशन में चलती दिखाई देती है...'

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'सारा दिन घर-घुसरी बनी क्यों बैठी रहती हो, खुली हवा में थोड़ा बाहर निकला करो। ढंग के कपड़े पहनो। बाल सँवारने का भी वक्त नहीं मिलता तुम्हें, तो बाल छोटे करवा लो, सूरत भी कुछ सुधर जाएगी। पास-पड़ोस की अच्छी समझदार औरतों में उठा-बैठा करो।'

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'बाऊजी को खाना दिया? कितनी बार कहा है, उन्हें देर से खाना हजम नहीं होता, उन्हें वक्त पर खाना दे दिया करो... दे दिया है? तो मुँह से बोलो तो सही...। जब तक बोलोगी नहीं, मुझे कैसे समझ में आएगा?'

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'अच्छा सुनो, वह किताब कहाँ रखी है तुमने? टेबल के ऊपर-नीचे सारा ढूँढ़ लिया, शेल्फ भी छान मारा। तुमसे कोई चीज ठिकाने पर रखी नहीं जाती? गलती की जो तुमसे पढ़ने को कह दिया। अब वह किताब इस जिंदगी में तो मिलने से रही। ...तुम औरतों के साथ यही तो दिक्कत है - शादी हुई नहीं, बाल-बच्चे हुए नहीं कि किताबों की दुनिया को अलविदा कह दिया और लग गए नून-तेल-लकड़ी के खटराग में, पढ़ना-लिखना गया भाड़ में...'

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' यह कोई खाना है! रोज वही दाल-रोटी-बैंगन-भिंडी और आ...लू। आलू के बिना भी कोई सब्जी होती है इस हिंदुस्तान में या नहीं? मटर में आलू, गोभी मे आलू, मेथी में आलू, हर चीज में आ...लू। तुमसे ढंग का खाना भी नहीं बनाया जाता। अब और कुछ नहीं करती हो तो कम-से-कम खाना तो सलीके से बनाया करो। ...जाओ, एक महीना अपनी माँ के पास लगा जाओ, उनसे कुछ रेसिपीज नोट करके ले आना... अम्मा तो तुम्हारी इतना बढ़िया खाना बनाती है, तुम्हें कुछ नहीं सिखाया? कभी चायनीज बनाओ, कॉण्टीनेंटल बनाओ... खाने में वेरायटी तो हो...'

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'वह किताब जरूर ढूँढ़कर रखना, मुझे वापस देनी है। यह मत कहना - भूल गई... तुम्हें आजकल कुछ याद नहीं रहता...'

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'अब तो दोनों सो गए है, अब तो यहाँ आ जाओ। बस, मेरे ही लिए तुम्हारे पास वक्त नहीं है। और सुनो... बाऊजी को दवाई देते हुए आना, नहीं तो अभी टेर लगाएँगे...'

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'आओ, बैठो मेरे पास! अच्छा, यह बताओ, मैंने इतने ढेर सारे प्रपोजल में से तुम्हें ही शादी के लिए क्यों चुना? इसलिए कि तुम पढ़ी-लिखी थीं, संगीत-विशारद थीं, गजलों में तुम्हारी दिलचस्पी थी, इतने खूबसूरत लैंडस्केप तुम्हारे घर की दीवारों पर लगे थे। ...तुमने तुमने आपना यह हाल कैसे बना लिया? चार किताबें लाकर दीं तुम्हें, एक भी तुमने खोलकर नहीं देखी। ...ऐसी ही बीवियों के शौहर फिर दूसरी खुले दिमागवाली औरतों के चक्कर में पड़ जाते हैं, और तुम्हारे जैसी बीवियाँ घर में बैठकर टसुए बहाती हैं? ...पर अपने को सुधारने की कोशिश बिलकुल नहीं करेंगी।'

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'तुम्हारे तो कपड़ों में से भी बेबी-फूड और तेल-मसालों की गंध आ रही है... सोने से पहले एक बार नहा लिया करो, तुम्हें भी साफ-सुथरा लगे और...।'

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'यह लो, मैं बोल रहा हूँ और तुम सो भी गईं। अभी तो साढ़े दस ही बजे हैं, यह कोई सोने का वक्त है? सिर्फ घर के काम-काज में ही इतना थक जाती हो कि किसी और काम के लायक ही नहीं रहतीं...'

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( दो)

'तुम्हारी आदतें कभी सुधरेंगी नहीं। पंद्रह साल हो गए हमारी शादी को, पर तुमने एक छोटी-सी बात नहीं सीखी कि आदमी थका-मांदा ऑफिस से आए तो एक बार की घंटी में दरवाजा खोल दिया जाए। तुम उस कोनेवाले कमरे में बैठी ही क्यों रहती हो कि यहाँ तक आने में इतना वक्त लगे? मेरे ऑफिस से लौटने के वक्त तुम यहाँ... इस सोफे पर क्यों नहीं बैठतीं?'

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'अब यह घर है? न मेज पर ऐशट्रे, न बाथरूम में तौलिया... बस, जहाँ देखो, किताबें, किताबें, किताबें... मेज पर, शेल्फ पर, बिस्तर पर, कार्पेट पर, रसोई में, बाथरूम में ... अब किताबें ही ओढ़ें-बिछाएँ, किताबें ही पहनें, किताबें ही खाएँ...?'

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'यह कोई वक्त है चाय पीने का? खाना लगाओ। गर्मी से वैसे ही बेहाल हैं, आते ही चाय थमा दी। कभी ठंडा नींबू पानी ही ले आया करो।'

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'अच्छा, इतने अखबार क्यों दिखाई देते हैं यहाँ? शहर में जितने अखबार निकलते हैं, सब तुम्हें ही पढ़ने होते हैं? खबरें तो एक ही होती हैं सबमें, पढ़ने का भूत सवार हो गया है तुम्हें। कुछ होश ही नहीं कि घर कहाँ जा रहा है, बच्चे कहाँ जा रहे हैं...'

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'यह क्या खाना है? बोर हो गए हैं रोज-रोज सूप पी-पीकर और यह फलाना-ढिमकाना बेक्ड और बॉयल्ड वेजीटेबल खा-खाकर। घर में रोज होटलों जैसा खाना नहीं खाया जाता। इतना न्यूट्रीशन कॉन्शस होने की जरूरत नहीं है। कभी सीधी-सादी दाल-रोटी भी बना दिया करो, लगे तो कि घर में खाना खा रहे हैं। आजकल की औरतें विदेशी नकल में हिंदुस्तानी मसालों का इस्तेमाल भी भूलती जा रही हैं।'

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'यह क्या है, मेरे जूते रिपेयर नहीं करवाए तुमने? और बिजली का बिल भी नहीं भरा? तुमसे घर में टिककर बैठा जाए, तब न! स्कूल में पढ़ाती हो, वह क्या काफी नहीं? ऊपर से यह समाज सेवा का रोग भी पाल लिया अपने सिर पर! क्यों जाती हो उस फटीचर समाज-सेवा के दफ्तर में? सब हिपोक्रेट औरतें हैं वहाँ। मिलता क्या है तुम्हें? न पैसा, न धेला, उल्टा अपनी जेब से आने-जाने का भाड़ा भी फूँकती हो।'

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'यह है तुम्हारे लाड़ले का रिपोर्ट कार्ड! फेल नहीं होंगे तो और क्या! माँ को तो फुर्सत ही नहीं हैं बेटे के लिए। अब मुझसे उम्मीद मत करो कि मैं थका-मांदा लौटकर दोनों को गणित पढ़ाने बैठूँगा। एम.ए. की गोल्ड मेडलिस्ट हो, तुमसे अपने ही बच्चों को पढ़ाया नहीं जाता? तुम्हें नया गणित नहीं आता तो एक ट्यूटर रख लो। अब तो तुम भी कमाती हो, अपना पैसा समाज-सेवा में उड़ाने से तो बेहतर ही है कि बच्चों को किसी लायक बनाओ। सारा दिन एम.टी.वी. देखते रहते हैं।'

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'यह तुमने बाल इतने छोटे क्यों करवा लिए हैं? मुझसे पूछा तक नहीं। तुम्हें क्या लगता है, छोटे बालों में बहुत खूबसूरत लगती हो? यू लुक हॉरिबल! तुम्हारी उम्र में ज्यादा नहीं तो दस साल और जुड़ जाते हैं। चेहरे पर सूट करें या न करें, फैशन जरूर करो।'

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'सोना नहीं है क्या? बारह बज रहे हैं। बहुत पढ़ाकू बन रही हो आजकल। तुम्हें नहीं सोना है तो दूसरे कमरे में जाकर पढ़ो। मेहरबानी करके इस कमरे की बत्ती बुझा दो और मुझे सोने दो।'

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'अब हाथ से किताब छोड़ो तो सही! सच कह रहा हूँ, मुझे गुस्सा आ गया तो इस कमरे की एक-एक किताब इस खिड़की से नीचे फेंक दूँगा। फिर देखता हूँ कैसे...'

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'अरे, कमाल है, मैं बोले जा रहा हूँ, तुम सुन ही नहीं रही हो। ऐसा भी क्या पढ़ रही हो जिसे पढ़े बिना तुम्हारा जन्म अधूरा रह जाएगा। कितनी भी किताबें पढ़ लो, तुम्हारी बुद्धि में कोई बढ़ोत्तरी होनेवाली नहीं है। रहोगी तो तुम वही...'


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