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कविता

सपनों की बातें
मिथिलेश कुमार राय


एक व्यक्ति जिसे सेब खाने के बाद नींद आई थी
उसने सपने में हवाई जहाज देखा
जिसमें इत्मीनान से बैठा हुआ वह
बादल के टुकड़े को निहार रहा था
सवेरे वह जगा तो उसके चेहरे पर तेज था
होंठों पर मुसकुराहट थी

उसी नगर में उसी रात एक दूसरा आदमी
जिसे मच्छर अपना कर्ण समझता था
और जिसकी भूख
प्याज-रोटी से नहीं मिटी थी तो उसने
भूख को दो लोटे पानी के नीचे दबा दिया था
उसकी बीवी चूड़ियाँ तोड़ रही थी उसके सपने में
उसके बच्चे कूड़े के ढेर पर बाँसुरी बजा रहे थे
और सवेरे जब उसके पास कोई भी नहीं था
उसने अपने आप से कहा
कि अब तो सपने भी मरने के ही आते हैं

इस बात की कोई प्रमाणिक जानकारी
उपलब्ध नहीं कर पाया है कोई
कि उस रात
उस नगर का राजा क्या खाकर सोया था
कि सपने में उसे आतिशबाजी करते हुए
लोग दिख रहे थे
जो नाच रहे थे
गा रहे थे
और बड़े प्यार से एक दूसरे के मुँह में
मिठाइयाँ डाल रहे थे
और जब सवेरे उसने यह बात दरबार में बताई
तो नवरत्नों ने इतिहास देखकर बताया
कि लोग
अब से पहले इतने खुश कभी नहीं थे


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