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कविता

शुभ संवाद
मिथिलेश कुमार राय


कुछ शुभ संवाद मिले हैं अभी
ये चाहे तो थोड़ा खुश हो ले
पान खाए
पत्नी से हँस-हँस के बतियाए
दो टके का भाँग पीकर
भूले हुए कोई गीत गाए
टुन्न हो अपने मित्रों को बताए
कि बचवा की मैट्रिक की परीक्षा अच्छी गई है
वह कहता है कि बहुत अच्छा रिजल्ट भी आएगा
गैया ने बछिया दिया है
और कुतिया से चार महीने पहले जो दो पिल्ले हुए थे
अब वे बड़े हो गए हैं
और कल रात वह अकेला नहीं गया था खेत पर
साथ साथ दोनों पिल्ले भी आगे-आगे चल रहे थे
कुतिया दरवज्जे पर बैठी चैकीदारी कर रही थी

मगर सोचने पर ढेर सारे तारे जमा हो जाते हैं
आँखों के सामने
कि गेहूँ में दाने ही नहीं आए इस बार
दो दिन पहले जो आँधी आई थी उसमें
सारे मकई के पौधे टूट गए
टिकोले झड़ गए
दो में से एक पेड़ उखड़ गए
महाजन रोज आता है दरवज्जे पर
कि गेहूँ तो हुआ नहीं
अब कैसे क्या करोगे जल्दी कर लो
बेकार में ब्याज बढ़ाने से क्या फायदा
जानते ही हो कि बिटवा शहर में पढ़ता है
हरेक महीने भेजनी पड़ती है एक मोटी रकम
सुनो गाय को क्यों नहीं बेच लेते
वाजिब दाम लगाओगे तो मैं ही रख लूँगा
दूघ अब शुद्ध देता है कहाँ कोई

हे भगवान क्या मैट्रिक पास करके बचवा
पंजाब भाग जाएगा
बिटिया क्यों बढ़ रही है बाँस की तरह जल्दी जल्दी
दूल्हे इतने महँगे क्यों हो रहे हैं


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