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कविता

जैसे फूलकुमारी हँसती थी
मिथिलेश कुमार राय


मैं यह नहीं कहूँगा साहब
कि मैं एक गरीब आदमी हूँ इसलिए
वो-वो नहीं कर पाता जो-जो
करने की मेरी इच्छा होती है

यह सच है साहब कि मैं एक फैक्ट्री में
सत्ताइस सौ रुपए माहवारी पर काम करता हूँ
और सवेरे आठ बजे का कमरे से निकला
रात के आठ बजे कमरे पर लौटता हूँ
पर इससे क्या
मैं शायद अकर्मण्य आदमी हूँ साहब
अब कल ही की बात को लीजिए
रात में कमरे पर लौटा तो
बिजली थी
दिन में बारिश हुई थी इसलिए
हवा नहीं भी आ रही थी कमरे में तो नमी थी
खाट पर लेटा तो हाथ में
अखबार का एक टुकड़ा आ गया

लालपुर में पाँचवी तक की पढ़ाई कर चुका हूँ साहब
अखबार के टुकड़े में एक अच्छी सी कहानी थी
पढ़ने लगा तो बचपन में पढ़े
फूलकुमारी के किस्से याद आ गए
कि जब वह खुश होती थी तो
जोर-जोर से हँसने लगती थी
कहानी पढ़ने लगा
पढ़कर खुश होने लगा साहब
लेकिन तभी बिजली चली गई
देह ने साथ नहीं दिया साहब
कि उठकर ढिबरी जलाता और
इस तरह खुशी को जाने से रोक लेता
और हँसता जोर-जोर से
जैसे फूलकुमारी हँसती थी


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