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कविता

श्रीमती क ख ग की मौत
रेखा चमोली


वो
सारी उम्र समझता रहा उसे
आज्ञाकारी दासी

वो समझता रहा
बहुत डरती है वो उससे
उसके इशारे पर नाचती है
रोकने पर रुकती चलाने पर चलती
उतना और वैसा ही कहती
जितना और जैसा वो सुनना चाहता

उसके डपटने से सिमट जाती वो घोंघे सी
मारने पीटने पर सिल लेती अपने होंठ
खुद ही उधेड़ लेती सारी सिलाई तन और मन की

उसके बताए और ना बताए सारे काम
बिना ऊब व थकान के कुशलतापूर्वक करती

उसके निर्णय बिना किसी प्रतिप्रश्न के उसे स्वीकार होते

जब वो कहता
तेज हवा चल रही है
वो बंद कर देती सारे घर के खिड़की दरवाजे
वो कहता बसंत आ गया
वो मुस्कुराती डोलती दिनभर सारे घर में

आज जब उसने
मुक्त कर लिया है खुद को
सारे सांसारिक बंधनों
व उससे

समझ आया है उसे कि
जब वह अपने भीतर समेट लेती थी सारी धरती
आसमान मुँह ताकता रह जाता था

उन स्थितियों में भी जब
पर्वत भीगनें लगते थे और हवाएँ
हो जाती थीं भारी
रुँधे गले से भीगे शब्द अटक अटककर निकलते थे

वो तब भी गा सकती थी
खुशियों और आशाओं भरा सबसे सुरीला गीत
वो अब जान पाया है
वो सारी उम्र करती रही
दया

उसकी कमजोरियों पर
उसकी कुंठाओं पर
मानसिक विकृतियों पर
वो उम्रभर उसे
उसके झूठे दंभों, स्वाभिमानों, अभिमानों के साथ
स्वीकार करती रही

वो उम्रभर उसकी दया पर पलता आया

वो एक शानदार पारी खेल कर गई

उसे छोड़ गई अकेला
उसके ही पिंजरे में।

 


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