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कहानी

आसमानी नीली याद
जयशंकर


वह नए बने हुए पुल की रेलिंग के पास खड़ी थी। वहाँ मद्धिम उजाला था। मुझे लगा कि कोई लड़की कुछ दूर तक के लिए मुझसे लिफ्ट माँग रही है। वह शहर का नया-नया इलाका था और वहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट अनियमित सा था। अक्सर स्कूल जाता या स्कूल से लौटता कोई बच्चा मेरी स्कूटर रुकवाता रहा था। उन दिनों शनिवार की शामों मे मैं ट्रेन से उतरने के बाद पहले अपने पुराने मकान में जाता, वहाँ से अपनी स्कूटर उठाता और बेकरी होते हुए, अपने माँ-बाप के पास जाया करता था। वे दोनों मेरी बड़ी बहन के करीब के एक मकान में रह रहे थे। उन दिनों पिता जीवित थे।

उस लड़की के स्कूटर पर बैठने के कुछ क्षणों बाद ही मुझे खटका हुआ कि वह कॉलेज या दफ्तर से लौट रही लड़की नहीं हो सकती। उसकी देह मेरी देह को छू रही थी। पुल पर सर्दियों की शामों का धुंधलका और हल्का-सा उजाला था और मेरे अंदर यह भय और पछतावा कि मैंने उस लड़की को क्यों बिठा लिया। उसे प्लाजा के पास उतरना था। बीस मिनट की बात थी। वहाँ उसकी अपनी स्कूटी रखी हुई थी।

'इतनी तेजी से क्यों चला रहे हैं?'

'मुझे सदर बाजार पहुँचना है।'

'अभी तो सात भी नहीं बजे हैं।'

'इन दिनों दुकानों में भीड़ रहती है।'

'क्या खरीदना है?'

'ग्रीटिंग्स।'

'मेरे लिए भी खरीदोगे'...उसने हँसते हुए कहा।

उसके हँसने में, उसके कहने और मुझे छूते चले जाने में कुछ था कि मैंने जान लिया कि यह भी प्लाजा के इलाके में अपने ग्राहकों को ढूँढ़ती-फँसाती लड़कियों में से एक है और मुझे जल्दी से जल्दी इस लड़की से छुटकारा लेना होगा।

'आप कहाँ पर उतरेंगी?'

'आप जहाँ चाहेंगे।'

'मैं सदर बाजार जा रहा हूँ।'

'मैं भी वहाँ चलूँगी।'

'लेकिन आपकी स्कूटी तो प्लाजा के सामने है!'

'आपकी स्कूटर तो साथ है।'

'आप यहा तक कैसे आई थीं?'

'मेरा एक कस्टमर मुझे यहाँ लाया था।'

'आप क्या करती हैं?' मैने बनना चाहा था।'

'मेरे जैसी लड़कियाँ क्या करती हैं।'

'मुझे नहीं पता।'

'क्या पहली बार किसी वेश्या से मिल रहे हो?'

मैं चुप रहा था। मेरा चुप रहना ही बेहतर था और बेहतर था उसे जल्दी से जल्दी कहीं छोड़ देना। कोई मुझे उसके साथ देख सकता था। कोई मेरे माँ-बाप को बता सकता था कि आपके लड़के ने शादी इसलिए नहीं की है कि वह वेश्याओं के साथ खुले आम सड़कों पर घूम सके। वह मेरे माँ-बाप को कोसता रहेगा। उनके गैर-जिम्मेवार और लापरवाह होने पर उँगली उठाएगा। ऐसा करते हुए वह गलत भी नहीं होगा। उसे क्या पता होगा कि पुल के मद्धिम उजाले में खड़ी हुई इस लड़की को स्कूटर पर बैठाने तक मेरे जेहन में उसके वेश्या होने का सवाल ही नहीं उतरा था।

'आपका कस्टमर आपको प्लाजा तक छोड़ सकता था...।'

'मैं ही उसे छोड़ आई... वह बहुत ही ओछा आदमी था।'

'क्यों?'

'मुझे जबरदस्ती शराब पिलाना चाह रहा था... उसके टी.वी. पर घटिया किस्म की फिल्म का कैसेट लगा था... मुझे उसके यहाँ घुटन-सी होने लगी... मैं डर भी गई थी।'

'क्या आपके साथ ऐसा अक्सर होता है?'

'मैं इन सब में अभी-अभी पड़ी हूँ।'

'घर में कौन-कौन हैं?'

'मेरे माँ-बाप हैं... भाई बहन हैं... आपके यहाँ...।'

'मैं अपने माँ-बाप से मिलकर ही आ रहा हूँ।'

'और आपका अपना परिवार कहाँ रहता है?'

'मैंने शादी नहीं की है।'

'वाह बहुत अच्छा रहा।'

'क्यों?'

'आज की शाम आपके साथ गुजर जाएगी।'

'मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। आप गलत समझ गईं... वह हँसने लगी।'

'वेश्या... के साथ रहना पसंद नहीं होगा।'

'नहीं... नहीं... मेरा जिंदगी का नजरिया कुछ है।'

'मुझे समझा नहीं सकते।'

'मैं खामोश रहा था। मैं स्कूटर चलाते हुए उसको जरा सा भी न जानते हुए अपने पैंतालीस बरस की जिंदगी के बारे में क्या-क्या बताता, किस तरह बताता, कहाँ से शुरू करता और कहाँ उसका अंत करता। फिर न उसको इसमें दिलचस्पी थी और न मुझमें इतनी धीरता। मैं वक्त निकाल भी लेता पर क्या ऐसी लड़कियों के पास फालतू समय रहता है? फिर उसने अपनी लगभग तीस बरस की उम्र में न जाने क्या-क्या देखा होगा सुना होगा। प्रेम और सेक्स के बारे में उसके अपने भी विचार होंगे। इन सबके लिए वक्त की जरूरत थी और लंबी बातचीत और बहस की। वक्त न उसके पास था और न मेरे पास। प्लाजा करीब ही रह गया था और उसे वहाँ छोड़कर मुझे सदर बाजार की तरफ बढ़ना था।'

'आपने मेरा उत्तर नहीं दिया!'

'मैं आपको क्या बता सकता हूँ?'

'आप क्या करते हैं?'

'सेंट्रल स्कूल में ड्राइंग पढ़ाता हूँ।'

'कहाँ पर?'

'इस शहर में नहीं... मैं शनिवार-इतवार को यहा आता हूँ...।

'आपने स्वेटर भी नहीं पहनी है... किसी होटल में काफी पीते हैं।'

'मेरे पास वक्त नहीं है।'

'तब क्या नाश्ता भी नहीं करवाओगे?'

'मैं आपको पेट्रोल और नाश्ते के लिए पैसे दे सकता हूँ।'

'मुझे क्या करना पड़ेगा?'

'कुछ भी नहीं।'

प्लाजा की बत्तियाँ जगमगाती हुई नजर आने लगी थी। उस वक्त शहर के इस इलाके के समृद्ध लोग वहाँ की दुकानों और रेस्तराँओं में आ जाते थे और वहाँ भीड़भाड़ बनी रहती। चहल-पहल होती रहती। युवा और संपन्न लोगों की हँसी और मस्ती का माहौल बना रहता। बहुत पहले यह शहर के पारसियों के बँगलों का इलाका था। न्यू कॉलोनी के नाम से जाना जाता था। धीरे-धीरे यहाँ के निवासी मरते गए, बंबई-पूना में लौटते रहे और यह जगह एक लंबे वक्त तक सुनसान पड़ी रही। तभी यहा प्लाजा खड़ा हुआ। बड़ा-सा, आधुनिक और आकर्षक बाजार बना और शहर के रईसों की एक तरह की सैरगाह। बीच-बीच में इस इलाके में बढ़ रही ब्लू फिल्मों की दुकानों का, यहाँ के ब्यूटी पार्लर में शुरू रहते देह व्यापार का और वहाँ होती रहती लूटपाट की खबरों को मैं अखबारों में पढ़ता रहा था।

प्लाजा के पेट्रोल पंप के करीब के रिपेयर शॉप में उसकी सफेद रंग की स्कूटी रखी थी। मैंने अपनी जेब से उसे सौ रुपए निकालकर दिए थे। वह चाहती थी कि मैं उसके साथ किसी रेस्तराँ में कुछ देर बैठूँ लेकिन मैं जल्दी से जल्दी उससे छुटकारा चाह रहा था। पेट्रोल पंप की रोशनी में वह मुझे एक सुंदर और शांत लड़की जान पड़ी। उसने आसमानी नीले रंग की साड़ी और ब्लाउज पहन रखा था। वह दुबली-सी, औसत कद की साँवली लड़की थी।

'मेरा फोन नंबर रख लो...' उसने कहा था।

'क्यों?'

'कभी मुझसे मिल सकते हो।'

'थैंक्स... आपका नाम क्या है?'

'नाम मैं बदलती रहती हूँ।'

'और नंबर...?'

'यह मोबाइल हमें उन लोगों ने दिया है जिनके लिए हम कभी-कभी काम करते हैं।'

'एक बात कहूँ... आप कोई दूसरा काम नहीं कर सकती।'

'दूसरे बहुत से काम किए... वहाँ भी वही सब करना पड़ता था।'

'आपके घर के लोग...'

'मेरे पति दमे के रोगी हैं... इधर उनसे कोई काम होता नहीं है... मेरे दो बच्चे हैं।'

'आप कहाँ तक पढ़ी हैं?'

'दसवी में थी... इलाहाबाद के पास हमारा गाँव था... आपके पास कुछ फुरसत रहेगी तो आपको अपनी रामकथा सुनाऊँगी।'

'और इस शहर में आपका कौन रहता है?'

'आजकल कौन किसी का होता है... आप भले आदमी हैं... इतनी इज्जत देकर बात कर रहे हैं।'

'मेरा नाम अजीत है... मैं गार्डीनर स्कूल के पास रहता हूँ...।

'शुक्रिया... हमारे पेशे में कभी-कभी ही भले लोग मिलते हैं।'

'ठीक है... मैं निकलता हूँ।'

उसने दोनों हाथ जोड़े थे और मैं वहाँ से निकल पड़ा था। प्लाजा की घड़ी में सात बज रहे थे। सदर बाजार से कुछ किताबें, ग्रीटिंग्स, कैसेट्स, गुलदस्ते और फूल खरीदने के बाद मैं अपने दूसरे दिन के बारे में सोचने के लिए 'क्वाएट कॉर्नर' में कॉफी पीने के लिए रुक गया। दूसरा दिन उस साल का आखिरी रविवार था और मुझे उसी दिन अपने कुछ दोस्तों से कुछ रिश्तेदारों से मिलना था, उनके लिए उपहार ले जाना था। मैंने अपने माता-पिता के लिए कुमार गंधर्व के गाये भजनों के दो कैसेट्स भी खरीदे थे और मैं उन्हें सुनना भी चाह रहा था। मुझे सर्दी भी लग रही थी। उस लड़की से मुलाकात नहीं होती तो मैं घर लौटता था, अपनी स्वेटर ओर मफलर पहनता था।

'क्वायट कॉर्नर' की ज्यादातर मेजों पर युवा जोड़े बैठे हुए थे। मैं 'स्मोकर जोन' में बैठे हुए सिगरेट पीने लगा। बैरे व्यस्त थे। रसोई से तलने-पकने की गंध और आवाजें आने लगी। समूचे रेस्तराँ में गरम कपड़ों में लिपटे हुए लोग थे। रेस्तराँ की लंबी-सी, बड़ी-सी खिड़की से दिसंबर के आसमान पर थमा हुआ चाँद नजर आया। उस चाँद की चाँदनी थी या अपनी ठंड की ठिठुरन या वहाँ बैठे हुए जोड़ों के चेहरे और आवाजें। मुझे बरबस ही उस लड़की का ख्याल आ गया जिससे कुछ देर पहले मैं छुटकारा चाह रहा था। मुझे लगा कि मैं उसे ऐसी सर्दी में एक प्लेट सेंडविच खिला सकता था, एक कप कॉफी पिला सकता था। शायद उसने होटल में बैठने की उम्मीद रखी होगी। शायद वह मुझसे कुछ और कहना चाहती रही होगी। मैं खुद उसके बारे में कुछ और जानने की जिज्ञासा रखने लगा था। मैं उसे एक ग्रीटिंग और कुछ फूल ही दे देता। उसके बच्चों के लिए चॉकलेट खरीद देता। मैं पछताने लगा था। मैं अपने आपको अपनी भूल और भय के लिए कोसने लगा था।

'क्वायट कॉर्नर' से मैं अपने पुरखों के मकान में आया। उस साल के पिछले साल तक मेरी माँ भी वहीं रहती थी। उस बरस मैं अपनी उम्र के चालीसवाँ बरस में उतर रहा था और तब तक भी माँ को यह भरोसा था कि मैं अपनी गृहस्थी बसाऊँगा, वह मेरे बच्चों की भी दादी बनेगी। माँ की आकांक्षा अधूरी रही। उसे पछतावा और पराजय मिली और वह मेरे बड़े भाई और उसके परिवार में जाकर रहने लगी। पिता वहाँ रह ही रहे थे। अब मैं दोनों ही जगहों पर अकेले ही रहने लगा था और मेरे साथ का यह अकेलापन भी था कि मुझे फिर उस लड़की की याद आ गई जिससे मैं अचानक ही मिला था जो अपनी और अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए अपनी देह बेचती थी। मुझसे ही भूल हुई। वह तो अपना नंबर देना चाह रही थी। उसे अपने जादू का पता होगा। उसके साथ उसका अपना विश्वास और आत्मविश्वास था और मेरे साथ मेरा डर जो किसी के उसके साथ मुझे देख लेने की वजह से उन दिनों जगह-जगह नजर आते एड्स से बचावों के पोस्टरों से बाहर आता रहा था।

थोड़ी देर की कशमकश के बाद मैं अपनी स्कूटर से प्लाजा की तरफ बढ़ा था। उसके पेशे की कुछ दूसरी लड़कियों को मैं वहाँ की लकड़ी की बैंचों पर बैठे हुए देखता रहा था। उन बैंचों पर ही वे अपने ग्राहकों का इंतजार किया करती थी। बहुत पहले मैंने वहाँ सिगरेट पीती हुई एक औरत को देखा था और उस घटना के किसी मित्र से जिक्र पर मैंने उस इलाके के इस आयाम को जाना था। मैं सिगरेट पीते हुए चेंबर के आखिरी सिरे पर रखी हुई बेंच पर रहा। आठ बज रहे थे। ठंड और रात बढ़ रही थी और धीरे-धीरे मेरी भूख भी। मैंने दुपहर में ट्रेन में अपना टिफिन खाया था। रेस्तराँ में भी कॉफी ही पी सका था। रात के खाने के लिए मुझे अपनी बुआ के यहा जाना था और मैंने उन्हें फोन पर ही न आ सकने की बात कह दी थी। वह मिल जाती तो मैं उसे किसी होटल में ले जाता और हम साथ-साथ खाना खाते। पर वह वहाँ नजर नहीं आई। कुछ देर के बाद मेरे सामने एक दूसरी लड़की खड़ी थी।

'कहाँ चलना है?'

'कहीं नहीं...' मैं घबरा रहा था।

'अब तुम्हें कोई नहीं मिलेगा... मैं अकेली ही बची हूँ।'

'आपको गलतफहमी हुई है।'

'थोड़ी देर पहले ही तुम नीला के साथ थे।'

'आप उसे जानती है... इस वक्त वह कहाँ होगी?'

'अपने घर में' वह हँसने लगी।

'मुझे उससे मिलना था।'

'मुझसे काम नहीं चला सकते...।'

'आप गलत समझ रही हैं।'

'ठीक है... यह नीला का मोबाइल नंबर है... वह कल पेट्रोल पंप के पास मिलेगी।'

'और मैं उससे अभी मिलना चाहूँ...'

'वह बहुत दूर रहती ह़ै... आज तो उसे भी कोई नहीं मिला... पता नहीं घर तक जाने के लिए पेट्रोल था भी...'

'और आप?'

'मैं भी अभी तक रास्ता देख रही हूँ' ...मेरी गाड़ी में तो पेट्रोल है लेकिन मेरा पेट खाली है।'

'मैं आपके लिए पेस्ट्री ले आता हूँ।'

'फ्री में!'

'तब क्या मैं आपसे पैसे मागूँगा?'

'भले आदमी जान पड़ते हो...।'

'इसमें क्या है... दस-पंद्रह रुपए की बात है।'

'कभी-कभी इतने भी पैसे के लिए हमें बहुत कुछ सहना पड़ता है।'

'आप लोग और कोई काम क्यों नहीं करते?'

'यही हमारे बस का है...।'

उस लड़की को पेस्ट्री और सैंडविच देकर मैं टेलिफोन बूथ पर गया था। फोन नीला की किसी बच्ची ने उठाया था। वह घर पहुँचकर रात का खाना बना रही थी। उसने दूसरे दिन पेट्रोल पंप के पास ही मिलने की बात कही थी।

'आपको नंबर किसने दिया?'

'एक लड़की मिल गई थी।'

'अनु होगी... बहुत भली लड़की है... आप उसके साथ भी जा सकते हो।'

'मैं आपसे सिर्फ मिलना चाहता था।'

'क्यों?'

'आपसे मिलना अच्छा लगा था।'

'ठीक है... कल मुलाकात होगी।'

दूसरे दिन रविवार की सुबह में ही मेरी नीला से फोन पर बात हुई थी। अपने माता-पिता से मिलकर लौटते हुए दुपहर में मुझे उसका और उसके एक झूठ का ख्याल आया था।

'आपने मुझसे झूठ बोला था' मैंने कहा था।

'कौन सा झूठ?'

'आपके माँ-बाप और भाई-बहन हैं?'

'कस्टमर को हमारा शादीशुदा होना अच्छा नहीं लगता है।'

'पर बाद में आपने सच बना दिया।'

'तब तक आप ग्राहक नहीं रह गए थे।'

'यह आप कैसे जान गईं?'

'तीन साल में मेरा तरह-तरह के लोगों से वास्ता पड़ा है।'

'आप मेरे बारे में क्या कहेंगी?'

'आप भले आदमी हैं।'

रविवार की उस दुपहर में मैं अपने पुस्तैनी मकान के बिस्तर पर लेटे-लेटे बेगम अख्तर की गजलें सुनता रहा। मैं भाई के घर से भी जल्दी लौट आया। मैं अपने माँ-बाप के लिए कॉटन मार्केट से अनार खरीदता रहा था लेकिन उस रोज मैंने उनके लिए सदर बाजार से ही अनार खरीद लिया। मैंने अपने कपड़ों को इस्त्री के लिए लांड्री में दिया जबकि मैं खुद ही अपने कपड़ों को इस्त्री करता रहा था। मैंने खूब ज्यादा गरम पानी से स्नान किया। मैंने यह सोचकर भी घर की दुबारा साफ-सफाई की कि कहीं वह मेरे घर आने का आग्रह न कर दे।

मेरे मन में था कि मैं उसके साथ अपनी शाम को तालाब के किनारे खड़े हुए प्राचीन शिव मंदिर के पुराने परिसर में बिता सकूँ। शहर की वह शांत जगह, बचपन से ही मेरी आत्मीय जगह रहती आई थी। पुराने और घने पेड़ों से हरी घास के आयताकार टुकड़ों पर खड़ी बैंचों से करीब ही खड़े हुए तालाब, घाट मंदिर और जंगली झाड़ियों से बना परिवेश उस जगह को अपने किस्म की प्राचीनता देता रहा था, अपनी तरह की पवित्रता।

उस रविवार की शाम में मैं साढ़े पाँच बजे ही प्लाजा के सामने के पेट्रोल पंप पर पहुँच गया। दिन पर उससे हुई कल की मुलाकात की छायाएँ मेरे साथ रहीं। मैं व्याकुल बना रहा। तरह-तरह के ख्यालों में खोता चला गया। अपनी घड़ी पर मेरा भरोसा टूट गया और मैं दूसरों से टाइम पूछता चला गया। मैं पिछले दिन की भूल को दुहराना नहीं चाह रहा था। मैं आने वाली मुलाकात को एक अच्छी और यादगार मुलाकात में बदलना चाह रहा था। मैं उस लड़की के कुछ करीब पहुँचना चाह रहा था और यह भी चाह रहा था कि वह मेरे से कुछ नजदीक आ सके। कभी-कभार मुझसे मिलने का हौंसला बटोर सके, बीच-बीच में मुझसे मिलने-बतियाने की कोशिशें कर सके।

शाम झुकने लगी। प्लाजा की घड़ी में पहले छः बजे, फिर सवा छः और उसके बाद साढ़े छः। मेरा सब्र टूटने लगा। मुझे रात दस बजे की गाड़ी पकड़नी थी। वैसे ही उसके साथ दो घंटे भी नहीं बीतने थे। मैं बूथ में चला गया। वहाँ एक नेपाली लड़का बैठा था। मैंने उसका नंबर घुमाया और शाम भी मोबाइल को किसी बच्ची ने ही उठाया। बाद में वह फोन पर आई।

'मैं आज बाहर नहीं निकल सकूँगी।'

'क्या बात हुई...।'

'मेरी छोटी बिटिया का बुखार नहीं उतर रहा है ।'

'डॉक्टर को बताया है?'

'वहीं जा रही हूँ।'

'क्या मैं वहाँ आ सकता हूँ।'

'नहीं।'

'मेरा आपसे मिलना जरूरी था।'

'वहाँ और भी लड़किया हैं।'

'आप गलत समझ रही है।'

'हम कल मिल सकते हैं।'

'मैं रात में बुरहानपुर के लिए निकलूँगा।'

'मैं आज नहीं मिल सकती...।'

उसने फोन बंद कर दिया था। मैंने बार-बार उसका नंबर घुमाया। उसने मोबाइल बंद कर लिया था। मैं बूथ से निकला ही था कि मैंने एक लड़की को अपने एकदम करीब पाया। वह जैसे मेरी प्रतीक्षा ही कर रही थी। वह पान चबा रही थी। मेरे सामने आते ही उसने पान थूक दिया और थोड़ी-तेज आवाज में बोली...

'कहाँ चलना है?'

'कहीं नहीं।'

'पचास ही दे देना।'

'किस बात के लिए?'

'हमको लोग पैसा क्यों देते हैं?'

'मैं वैसा आदमी नहीं हूँ।'

'कल शाम से यहा मंडरा क्यों रहा है?'

'मैं समझा नहीं...।'

'पचास रुपए निकाल और यहाँ से चलता बन।'

'पैसे किस बात के?'

'तू बूथ में था... मैं तेरा इंतजार करती रही... तेरे चक्कर में एक ग्राहक को छोड़ दिया।'

'इसमें मेरी क्या गलती है?' मैंने गुस्से में कहा।

'अब पचास निकालता है कि अपने आदमियों को बुलाऊँ... यह हमारा अड्डा है... यहाँ दुबारा मत आना... अच्छा-खासा कस्टमर छूट गया और इस कंगाल से पाला पड़ा... फुकट में ऐश करना चाहते हैं... बिना पैसे के मौज उड़ाना हो तो घर में क्यों नहीं रहते...।'

मैं उस वेश्या को पचास रुपए का नोट न देता तो वह तीखी आवाज में और न जाने क्या-क्या बकवास करती। अपनी गाड़ियों में पेट्रोल भर रहे लोग वैसे भी हमारी तरफ देखने लगे। मैं अपना तमाशा नहीं बनाना चाहता था। मैं एक किस्म की लज्जा में डूबता चला गया। बूथ का लड़का मेरी तरफ देखते हुए हँस रहा था। तभी उस लड़की के पास एक आटो रुका वह आटो में बैठी और वहाँ से निकल पड़ी। मैंने अपनी छोटी सी टेलीफोन डायरी का वह पन्ना वहीं फाड़ दिया जिस पर नीला का नंबर लिखा था। यह सब मेरे साथ मेरी उम्र के बयालीस के बरस में घटा था और अब मैं अपनी उम्र के पैंतालीस साल पूरा करने जा रहा हूँ। कभी-कभार कोई स्कूली बच्ची लिफ्ट माँग ही लेती लेकिन अब मैं रुकता नहीं। उन दो शामों के अच्छे-बुरे अनुभवों ने मुझे कुछ डरा सा दिया है और मैं यह सोचने लगा हूँ कि जीवन में कम से कम लोगों को आने देना चाहिए और उनमें भी सिर्फ उन लोगों को जिन्हें हम जानते रहे हो, पहचानते रहे हो। अजनबी लोगों और अजनबी आवेगों का कोई ठिकाना नहीं। ये कभी भी हमारे लिए अराजक और असहनीय हो सकते हैं।

कभी-कभी यह जरूर होता है कि मैं किसी आसमानी नीले रंग की साड़ी पहनी हुई किसी स्त्री को कहीं देखता हूँ तो मुझे नीला के साथ की शाम के उस आधे-पौने घंटे, का सवाल जकड़ लेता है। मैं सोचने लगता हूँ कि अब वह औरत कहाँ रहती होगी, क्या करती होगी उसके पति और बच्चे कैसे होंगे? ख्यालों का यह सिलसिला मुझे इस सवाल तक भी ले जाता है कि क्या कभी उसे मेरी याद भी आती होगी, क्या उसे कभी भी यह भरोसा मिला होगा कि मैं उससे इसीलिए ही मिलना चाहता था कि उससे मिलना मुझे अच्छा लगा था।

उसके मिलने ने भले ही कुछ क्षणों के लिए लेकिन मुझे बहुत कुछ दिया था। इस प्रकार की जरूरी तसल्ली, एक प्रकार की जरूरी तमन्ना, एक प्रकार की जरूरी तकदीर। ये सब वे चीजें हैं जिन पर उम्र के बढ़ते-बढ़ते हमारी पकड़ ढीली पड़ती जाती है। ये चीजें हमसे छूटती चली जाती हैं, ये चीजें हमारे लिए मरने लगती हैं या हम इन चीजों के लिए मरने लगते हैं।

रविवार की उस शाम के शर्मनाक अनुभव से गुस्से में मैंने नीला का नंबर तो नष्ट कर दिया था, पर अगले वीकएंड में उसके बाद के वीकएंड में मैं प्लाजा के आसपास उससे मिलने के लिए चहलकदमी करता रहा था। वह दूसरी लड़की भी नजर नहीं आई जिसने मुझे नीला का फोन नंबर दिया था। उस साल की गर्मियों में मेरा ट्रांसफर पंचमढ़ी के स्कूल में हुआ और उन गर्मियों में ही मेरे पिता नहीं रहे। कुछ दिनों तक, कभी-कभार ही पंचमढ़ी में खड़े हुए पहाड़ों से पचमढ़ी पर तने हुए आसमानी नीले आसमान से उस लड़की की बहुत ज्यादा याद आती रही जिससे मैं आधे घंटे के लिए ही मिला था, जिसके लिए मुझे एक वेश्या से न जाने क्या-क्या और कितना-कुछ सुनने के लिए मिला था, सहने के लिए मिला था और धीरे-धीरे मैं पहली शाम के सुख से, दूसरी शाम के अवसाद और अपमान की यादों से दूर जाता रहा। अपनी उम्र के अड़तालीसवें बरस में मैंने अपने ही स्कूल की एक विधवा अध्यापिका से विवाह किया और इस तरह मेरी जिंदगी एक तरह के रुटीन से, एक तरह की एकरसता से बंधकर बीतने लगी।

पर अब भी यह होता है, कभी-कभार ही यह होता है कि मैं सर्दियों के नीचे आकाश की तरफ देखता हूँ, शाम का वक्त आता है, मेरे साथ अपने जीवन की उदासियाँ होती हैं ओर मुझे यकायक नीला का ख्याल आ जाता है, नीला का ख्याल जो और ज्यादा ख्याल ही होता गया था। एक प्रकार की आसमानी नीली याद।


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