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कविता

क्योंकि माँएँ चाहती हैं
रेखा चमोली


मेरी बच्चियों
कैसे बचाएँगे तुम्हें?
संयोग से
प्रथम संतान होने के कारण
भ्रूण में ही
खत्म होने से
बच गई तुम
पर पल-पल तुम्हें
चारों ओर से घेरती
नजरों से बचा पाना
बहुत मुश्किल है
तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा खेलकूद को
लड़कों के एकाधिकार वाले
क्षेत्र में पहुँचा देना
शायद उतना कठिन न हो
पर
कैसे भेजेंगे तुम्हें?
काम करने
ऐसी जगहों पर
जहाँ पाते ही मौका
भूल जाते हैं
तुम्हारे अपने ही
भाई, चाचा, मामा, मौसा
यहाँ तक कि पिता भी
अपने रिश्ते
कैसे बचाएँगे तुम्हें उनसे
जो तुम्हें देवी बनाकर पूजना चाहते हैं
या उनसे
जो तुम्हें देना चाहते हैं बाजार
घर भी नहीं तुम्हारे लिए सुरक्षित
कैसे करें
तुम्हारा सहज विकास
बात बात पर की जाती
टीका टिप्पणी रोक-टोक के बीच
तुम जैसे-जैसे
होती जाओगी बड़ी
पता नहीं तब तक कितनी बार
सोच लें हम
काश तुम लड़का होती
या तुम
पैदा होते ही मर क्यों न गई
ऐसा न हो पर
कहीं तुम्हें किसी से हो गया
प्रेम
और अगर कहीं वो
हमारी जाति का न हुआ तो
वे सब
जिनकी दुकानदारी
ऐसे ही किसी प्रसंग की
बाट तकती है
कभी भी नहीं देखना चाहेंगे
तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान
तब मैं और वे सब
जो तुम्हें करते हैं बेहद प्यार
कितने असहाय हो जाएँगे
कैसे रोक पाएँगे?
तुम्हारी ओर बढ़ते घिनौने
और खून भरे हाथों को
फिर भी मैं
और मेरी जैसी वो सब माँएँ
जिनका घर
तुम्हारी जैसी
प्यारी-प्यारी बच्चियों की
चहलकदमी से सजा है
चाहती हैं कि
तुम सब खूब खिलखिलाओ
जिससे खिल उठे
घर का कोना कोना
खूब नाचो गाओ खेलो कूदो
जिससे गूँज उठें दसों दिशाएँ
झूमें धरती डोले आकाश
हिल उठे
पत्ता पत्ता तुम्हारे साथ।

 


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