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कविता

घाव
रेखा चमोली


छोटी-बड़ी
अपने-परायों से
जाने-अनजाने
जान-बूझ कर
मिलीं कई चोटें
पर कभी
एक उफ भी ना निकली
घाव
जो आत्मा तक को छलनी कर पाए
प्रेम के दिए हुए हैं।

 


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हिंदी समय में रेखा चमोली की रचनाएँ