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कविता

उदासी के बाद
रेखा चमोली


जब बेल ने पहला कदम रखा था पेड़ पर तो
हल्के से कंपित हो झिझका था पेड़
पत्तियों ने पेड़ के कानों में जताई थी नाराजगी
ना जाने क्यों
बेल के अनुरोध को ठुकरा ना सका पेड़
और नतीजा
आज पूरे पेड़ पर छाई है बेल
अपने भरे पूरे कुनबे के साथ

पत्तियों की धूप से सीधी बातचीत ना हुई तो वे
तुनककर कुछ दिनों तक
पेड़ से अबोली रहीं
पर जब पीले-पीले नाजुक पंखुड़ियों वाले फूलों ने
अपनी आँखें खोली तो
ये पत्तियाँ ही थीं जो
उन्हें गोद में खिलाने को
सर्वाधिक उत्सुक दिखीं

फिर तो पेड़ और बेल ऐसे घुले मिले
मानों कभी अलग थे ही नहीं
पेड़ पर बेल ने पीली हरी चादर डाल दी

धीरे धीरे फल लगे
बड़े हुए
घर वालों के साथ साथ मोहल्ले में भी बँटे
सबने स्वाद ले ले कर खाए

जाड़े की शुरुआत के साथ ही सूखने लगी है बेल
पेड़ उदास है
उसकी उदासी का स्पर्श
बेल हर पल महसूस करती है
उसे विश्वास दिलाती है
अगले साल फिर आएगी उससे मिलने

फिर भी पेड़ उदास है

आभास है उसे कुछ दिनों बाद
अपनी पत्तियों के भी
साथ छोड़ देने का

पर बेल जानती है
उदासी के बाद खिलने वाली मुस्कान में
सैकडों सूर्योदयों की लालिमा
छिपी होती है।

 


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