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कविता

सियासत
रेखा चमोली


गरम गरम चलती हवाओं के बीच
अचानक ये नमी की लहर
कहाँ से उठी है ?

किन माँओं के आँसुओं से भीगी ये
भारी हो चली हैं
कौन पिता इन्हें कंधा देते देते थक गए हैं

इन सब माँओं और पिताओं को रोककर
पूछो इनसे
क्यों नहीं बनाया इन्होंने
अपना           अलग राष्ट्र
                    अलग राजधानी
                    अलग राष्ट्रभाषा
                    अलग राष्ट्रगान
जिनके चारों ओर गगनचुंबी चाहरदीवारी बनवा
ये कुछ समय तक सुरक्षित रख पाते
अपने मासूम बच्चे

जो दुनिया को एक बड़ा घर समझ
घूमने निकलते हैं

या फिर
ये क्यों नहीं शामिल कर पाए खुद को
पूँजीपतियों के मुट्ठी भर दल में

और अब जबकि चक्रव्यूहों में फँस चुके हैं
अनगिनत अभिमन्यु
क्या कोई रास्ता शेष है ?

 


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