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कविता

इस धरती को बचाने के लिए
रेखा चमोली


ऊर्जाएँ व शब्द
खो नहीं जाते शून्य में
ना ही सन्नाटे खाली होते हैं शोरों से

कहकहे, किलकारियाँ, चीखें या कानाफूसियाँ
अपने बाद भी अपनी आवाजों की ऊर्जाएँ
अखिल ब्रह्ममांड को सौंप
निश्चिंत सो लेती हैं देर तक

जब पहली बार रोटी बनाई गई होगी तो
क्या वो गोल ही बनी होगी ?
और चाय मीठी या जलेबी शहद भरी

वे सारी ऊर्जाएँ जो
हमारे पूर्वजों ने खर्च कीं
छोटे बड़े सारे अविष्कारों में
जिन्होंने बनाया हमारा जीवन सरल सुगम व
ये धरती रहने योग्य
चक्कर लगा रहीं हैं पृथ्वी के साथ-साथ सूर्य का
वरना इतने खून खराबे, बारूदी विस्फोटों
भूखे मरते बच्चों, बलात्कार की शिकार माँओं की
आहों से निकलती आवाजों से
ये पृथ्वी कभी की खत्म ना हो जाती
चलते फिरते कभी यूँ ही सोचा है आपने
बना रहे इस धरती का हरापन
नमी बनी रहे पेड़ पौधों में और आँखों में भी
इसके लिए हम क्या कर सकते हैं ?

 


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