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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


सुबह को गाड़ी एक बड़े स्टेशन पर रुकी। नए मुसाफिर आ-आ कर बैठने लगे। मियाँ खोजी अपने कमरे के दरवाजे पर खड़े घुड़कियाँ जमा रहे थे - आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है; क्या मेरे सिर पर बैठोगे? इतने में एक नौजवान दूल्हा बराती कपड़े पहने आ कर गाड़ी में बैठ गया। बरात के और आदमी असबाब लदवाने में मसरूफ थे। दुलहिन और उसकी लौंडी जनाने कमरे में बैठाई गई थीं। गाड़ी चलनेवाली ही थी कि एक बदमाश ने गाड़ी में घुस कर दूल्हे की गरदन पर तलवार का ऐसा हाथ लगाया कि सिर कट कर धड़ से अलग हो गया। उस बेगुनाह की लाश फड़कने लगी। स्टेशन पर कुहराम मच गया। सैकड़ों आदमी दौड़ पड़े और कातिल को गिरफ्तार कर लिया। यहाँ तो यह आफत थी, उधर दुलहिन और महरी में और ही बातें हो रही थीं।

दुलहिन - दिलबहार, देखो तो, यह गुल कैसा है? जरी झाँक कर देखना तो!

दिलबहार - हैं-हैं! किसी ने आदमी को मार डाला है। चबूतरा सारा लहू-लुहान है।

दुलहिन - अरे गजब। क्या जाने, कौन था बेचारा।

दिलबहार - अरे! बात क्या है! लाश के सिरहाने खड़े तुम्हारे देवर रो रहे हैं।

एक दफे लाश की तरफ से आवाज आई - हाय, भाई, तू किधर गया! दुलहिन का कलेजा धक-धक करने लगा। भाई-भाई करके कौन रोता है। अरे गजब! वह घबरा कर रेल से उतरी और छाती पीटती हुई चली। लाश के पास पहुँच कर बोली - हाय, लुट गई! अरे लोगो, यह हुआ क्या?

दिलबहार - हैं-हैं दुलहिन, तुम्हारा नसीब फूट गया।

इतने में स्टेशन की दो-चार औरतें-तार-बाबू की बीबी, गार्ड की लड़की ड्राइवर की भतीजी वगैरह ने आ कर समझाना शुरू किया। स्टेशन मातमसरा बन गया। लोग लाश के इर्द-गिर्द खड़े अफसोस कर रहे थे। बड़े-बड़े संगदिल आठ-आठ आँसू रो रहे थे। सीना फटा जाता था। एकाएक दुलहिन ने एक ठंडी साँस ली, जोर से हाय करके चिल्लाई और अपने शौहर की लाश पर धम से गिर पड़ी। चंद मिनट में उसकी लाश भी तड़प कर सर्द हो गई। लोग दोनों लाशों को देखते थे, और हैरत से दाँतों उँगली दबाते थे। तकदीर के क्या खेल हैं, दुलहिन के हाथ-पाँव में मेहँदी लगी हुई, सिर से पाँव तक जेवरों से लदी हुई; मगर दम के दम में कफन की नौबत आ गई। अभी स्टेशन से एक पालकी पर चढ़ कर आई थी, अब ताबूत में जायगी। अभी कपड़ों से इत्र की महक आ रही थी कि काफूर की तदबीरें होने लगीं। सुबह को दरवाज पर रोशनचौकी और शहनाई बज रही थी, अब मातम की सदा है। थोड़ी ही देर हुई कि शहर के लोग छतों और दूकानों से बरात देख रहे थे, अब जनाजा देखेंगे। दिलबहार दोनों लाशों के पास बैठी थी; मगर आँसुओं का तार बँध हुआ था। वह दुलहिन के साथ खेली थी। दुनिया उसकी नजरों में अँधेरी हो गई थी। दूल्हा के खिदमतगार कातिल को जोर-जोर से जूते और थप्पड़ लगा रहे थे और मरनेवाले को याद करके ढाड़ें मार-मार के रोते थे। खैर, स्टेशन मास्टर ने लाशों को उठवाने का इंतजाम किया। गाड़ी तो चली गई। मगर बहुत से मुसाफिर रेल पर से उतर आए। बला से टिकट के दाम गए। उस कातिल को देख कर सबकी आँखों से खून टपकता था। यही जी चाहता था कि इसको इसी दम पीस डालें। इतने में लाल कुर्ती का एक गोरा, जो बड़ी देर से चिल्ला-चिल्ला कर रो रहा था, गुस्से को रोक न सका, जोश में आके झपटा और कातिल की गरदन पकड़ कर उसे खूब पीटा।

आजाद और मियाँ खोजी भी रेल से उतर पड़े थे। दोनों लाशों के साथ उनके घर गए। राह में हजारों आदमियों की भीड़ साथ हो गई। जिन लोगों ने उन दोनों की सूरत ख्वाब में भी न देखी थी, जानते भी न थे कि कौन हैं और कहाँ रहते हैं, वे भी जार-जार रोते थे। औरतें बाजारों, झरोखों और छतों पर से छाती पीटती थीं कि खुदा ऐसी घड़ी सातवें दुश्मन को भी न दिखाए। दुकानदारों ने जनाजे को देखा और दुकान बढ़ा के साथ हुए। रईसजादे सवारियों पर से उतर-उतर पड़े और जनाजे के साथ चले। जब दोनों लाशें घर पर पहुँचीं, तो सारा शहर उस जगह मौजूद था। दुलहिन का बाप हाय-हाय कर रहा था और दूल्हे का बाप सब्र की सिल छाती पर रखे उसे समझाता था - भाई सुनो, हमारी और तुम्हारी उम्र एक है, हमारे मरने के दिन नजदीक हैं। और दो-चार बरस बेहयाई से जिए तो जिए, वर्ना अब चल चलाव है। किसी को हम क्या रोएँ। जिस तरह तुम आज अपनी प्यारी बेटी को रो रहे हो, इसी तरह हजारों आदमियों को अपनी औलाद का गम करते देख चुके हो। इसका अफसोस ही क्या? वह खुदा की अमानत थी, खुदा के सिपुर्द कर दी गई।

उधर कातिल पर मुकदमा पेश हुआ और फाँसी का हुक्म हो गया। सुबह के वक्त कातिल को फाँसी के पास लाए। फाँसी देखते ही बदन के रोएँ खड़े हो गए। बड़ी हसरत के साथ बोला - सब भाइयों को सलाम। यह कह कर फाँसी की तरफ नजर की और ये शेर पढ़े -

कोई दम कीजिए किसी तौर से आराम कहीं;
चैन देती ही नहीं गरदिशे अय्याम कहीं।
सैद लागर हूँ, मेरी जल्द खबर ले सैयाद;
दम निकल जाय तड़प कर न तहे दाम कहीं।

खोजी - क्यों मियाँ, शेर तो उसने कुछ बेतुके से पढ़े। भला इस वक्त शेर का क्या जिक्र था।

आजाद - चुप भी रहो। उस बेचारे की जान पर बन आई है, और तुमको मजाक सूझता है -

उन्हें कुछ रहम भी आता है या रब, वक्ते खूँ-रेजी;
छुरी जब हल्के-आजिज पर रवाँ जल्लाद करते हैं।

कातिल फाँसी पर चढ़ा दिया गया और लाश फड़कने लगी। इतने में लोगों ने देखा कि एक आदमी घोड़ा कड़कड़ाता सामने से आ रहा है। वह सीधा जेलखाने में दाखिल हुआ और चिल्ला कर बोला - खुदा के वास्ते एक मिनट की मुहलत दो। मगर वहाँ तो लाश फड़क रही थी। यह देखते ही सवार धम से घोड़े से गिर पड़ा और रो कर बोला - यह तीसरा था। जेल के दारोगा ने पूछा - तुम कौन हो? उसने फिर आहिस्ता से कहा - यह तीसरा था। अब एक-एक आदमी उससे पूछता है कि मियाँ, तुम कौन हो और रोक लो, रोक लो की आवाज क्यों दी थी? वह सबको यही जवाब देता है - यह तीसरा था।

आजाद - आपकी हालत पर अफसोस आता है।

सवार - भई, यह तीसरा था।

इनसान का भी अजब हाल है। अभी दो ही दिन हुए कि शहर भर इस कातिल के खून का प्यासा था। सब दुआ कर रहे थे कि इसके बदन को चील-कौए खायँ। वे भी इस बूढ़े की हालत देख कर रोने लगे। कातिल को बेरहमी याद न रही। सब लोग उस बूढ़े सवार से हमदर्दी करने लगे! आखिर, जब बूढ़े के होश-हवास दुरुस्त हुए, तो यों अपना किस्सा कहने लगा -

मैं कौम का पठान हूँ। तीन ऊपर सत्तर बरस का सिन हुआ। खुदा ने तीन बेटे दिए। तीनों जवान हुए और तीनों ने फाँसी पाई। एक ने एक काफिले पर छापा मारा। उस तरफ लोग बहुत थे। काफिलेवालों ने उसे पकड़ लिया और अपने-आप एक फाँसी बना कर लटका दिया। जिस वक्त उसकी लाश को फाँसी पर से उतारा मैं भी वहाँ जा पहुँचा। लड़के की लाश देख कर गश की नौबत आई मगर चुप। अगर जरा उन लोगों को मालूम हो जाय कि यह उसका बाप है; तो मुझे भी जीता न छोड़ें। एकाएक किसी ने उनसे कह दिया कि यह उसका बाप है। यह सुनते ही दस-पंद्रह आदमी चिपट गए और आग जला कर मुझसे कहा कि अपने लड़के की लाश को इसमें जला। भाई, जान बड़ी प्यारी होती है। इन्हीं हाथों से, जिनसे लड़के को पाला था, उसे आग में जला दिया।

अब दूसरे लड़के का हाल सुनिए - वह रावलपिंडी में राह-राह चला जाता था कि एक आदमी ने, जो घोड़े पर सवार था, उसको चाबुक से हटाया! उसने झल्लाकर तलवार म्यान से खींची और उसके दो टुकड़े कर डाले। हाकिम ने फाँसी का हुक्म दिया। और आज का हाल तो आप लोगों ने खुद ही देखा। इस लड़की के बाप ने करार किया था कि मेरे बेटे के साथ निकाह पढ़वावेगा। लड़के ने जब देखा कि यह दूसरे की बीवी बनी, तो आपे से बाहर हो गया!'

मियाँ आजाद और खोजी बड़ी हसरत के साथ वहाँ से चले।

खोजी - चलिए, अब किसी दुकान पर अफीम खरीद लें।

आजाद - अजी, भाड़ में गई आपकी अफीम। आपको अफीम की पड़ी है, यहाँ मारे गम के खाना-पीना भूल गए।

खोजी - भई, रंज घड़ी दो घड़ी का है। यह मरना-जीना तो लगा ही रहता है।

दोनों आदमी बातें करते हुए जा रहे थे, तो क्या देखते हैं कि एक दुकान पर अफीम झड़ाझड़ बिक रही है। खोजी की बाँछें खिल गईं, मुरादें मिल गईं। जाते ही एक चवन्नी दुकान पर फेंकी। अफीम ली, लेते ही घोली और घोलते ही गट-गट पी गए।

खोजी - अब आँखें खुलीं।

आजाद - यों नहीं कहते कि अब आँखें बंद हुई!

खोजी - क्यों उस्ताद, जो हम हाकिम हो जायँ, तो बड़ा मजा आए। मेरा कोई अफीमची भाई किसी को कत्ल भी कर आए, तो बेदाग छोड़ दूँ।

आजाद - तो फिर निकाले भी जल्द जाइए।

दोनों आदमी यही बातें करते हुए एक सराय में जा पहुँचे। देखा, एक बूढ़ा हिंदू जमीन पर बैठा चिलम पी रहा है।

आजाद - राम-राम भई, राम-राम!

बूढ़ा - सलाम साहब, सलाम। सुथना पहने हो और राम-राम कहते हो?

आजाद - अरे भाई, राम और खुदा एक ही तो हैं। समझ का फेर है। कहाँ जाओगे।

बूढ़ा - गाँव यहाँ से पाँच चौकी है। पहर रात का घर से चलने, नहावा, पूजन कीन, चबेना बाँधा और ठंडे-ठंडे चले आयन। आज कचहरी मौं एक तारीख हती। साँझ ले फिर चले जाब। जमींदारी माँ अब कचहरी धावे के सेवाय और का रहिगा?

आजाद - तो जमींदार हो? कितने गाँव हैं तुम्हारे?

बूढ़ा - ऐ हुजूर, अब यो समझो, कोई दुइ हजार खरच-बरच करके बच रहत हैं।

आजाद ने दिल में सोचा कि दो हजार साल की आमदनी और बदन पर ढंग के कपड़े तक नहीं! गाढ़े की मिरजई पहने हुए है; इसकी कंजूसी का भी ठिकाना है? यह सोचते हुए दूसरी तरफ चले, तो देखा, एक कालीन बड़े तकल्लुफ से बिछा और और एक साहब बड़े ठाट से बैठे हुए हैं। जामदानी का कुरता, अद्धी का अँगरखा, तीन रुपए की सफेद टोपी, दो-ढाई सौ की जेब घड़ी, उसकी सोने की जंजीर गले में पड़ी हुई। करीब ही चार-पाँच भले आदमी और बैठे हुए हें और दोसेरा तंबाकू उड़ा रहे हैं। आजाद ने पूछा, तो मालूम हुआ आप भी एक जमींदार हैं। पाँच-छह कोस पर एक कसबे में मकान है। कुछ 'सीर' भी होती है। जमींदारी से सौ रुपए माहवार की बचत होती है।

आजाद - यहाँ किस गरज से आना हुआ।

रईस - कुछ रुपए कर्ज लेना था, मगर महाजन दो रुपए सैकड़ा सूद माँगता है।

मियाँ आजाद ने जमींदार साहब के मुंशी को इशारे से बुलाया, अलग ले जा कर यों बातें करने लगे -

आजाद - हजरत, हमारे जरिये से रुपया लीजिए। दस हजार, बीस हजार, जितना कहिए; मगर जागीर कुर्क करा लेंगे और चार रुपए सैकड़ा सूद लेंगे।

मुंशी - वाह! नेकी और पूछ-पूछ! अगर आप चौदह हजार भी दिलवा दें, तो बड़ा एहसान हो। और, सूद चाहे पाँच रुपए सैकड़ा लीजिए तो कोई परवा नहीं। सूद देने में तो हम आँधी हैं।

आजाद - बस, मिल चुका। यह सूद की क्या बात-चीत है भला? हम कहीं सूद लिया करते हैं? मुनाफा नहीं कहते?

मुंशी - अच्छा हुजूर, मुनाफा सही।

आजाद - अच्छा, यह बताओ कि जब सौ रुपए महीना बच रहता है, तो फिर चौदह हजार कर्ज क्यों लेते हैं?

मुंशी - जनाब, आपसे तो कोई परदा नहीं। सौ पाते हैं, और पाँच सौ उड़ाते हैं। अच्छा खाना खाते हैं, बारीक और कीमती कपड़े पहनते हें, यह सब आए कहाँ से। बंक से लिया, महाजनों से लिया; सब चौदह हजार के पेटे में आ गए। अब कोई टका नहीं देता।

आजाद दिल में उस बूढ़े ठाकुर का इन रईस साहब से मुकाबिला करने लगे। यह भी जमींदार, यह भी जमींदार; उनकी आमदनी डेढ़ सौ से ज्यादा, इनकी मुश्किल से सौढ़े की धोती और गाढ़े की मिरजई पर खुश हैं। और यह शरबती और जामदानी फड़काते हैं। वह ढाई तल्ले का चमरौध जूता पहनते हैं, यहाँ पाँच रुपया की सलीमशाही जूतियाँ। वह पालक और चने की रोटियाँ खाते हें और यह दो वक्त शीरमाल और मुर्गपुलाव पर हाथ लगाते हैं, वह टके गज की चाल चलते हैं। यहाँ हवा के घोड़ों पर सवार। दोनों पर फटकार! वह कंजूस और यह फजूलखर्च। वह रुपए को दफन किए हुए, यह रुपए लुटाते फिरते हैं। वह खा नहीं सकते, तो यह बचा नहीं सकते।

शाम को दोनों आदमी रेल पर सवार हो कर पूना जा पहुँचे।


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