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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


खोजी ने एक दिन कहा - अरे यारो, क्या अंधेर है। तुम रूम चलते-चलते बुड्ढे हो जाओगे। स्पीचें सुनीं, दावतें चखीं, अब बकचा सँभालो और चलो। अब चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय, हम एक न मानेंगे। चलिए, उठिए। कूच बोलिए।

आजाद - मिरजा साहब, इतने दिनों में खोजी ने एक यही तो बात पक्की कही। अब जहाज का जल्द इंतिजाम कीजिए।

खोजी - पहले यह बताइए कि कितने दिनों का सफर है?

आजाद - इससे क्या वास्ता? हम कभी जहाज पर सवार हुए हों तो बताएँ।

खोजी - जहाज! हाय गजब! क्या तरी-तरी जाना होगा? मेरी तो रूह काँपने लगी। भैया, मैं नहीं जाने का।

आजाद - अजी, चलो भी, वहाँ तुरकी औरत के साथ तुम्हारा ब्याह कर देंगे।

खोजी - खुश्की-खुश्की चलो तो भई, मैं चलूँगा। समुद्र में जाते पाँव डगमगाता है।

मिरजा - जनाब, आपको शर्म नहीं आती? इतनी दूर तक साथ आए, अब साथ छोड़ देते हो? डूब मरने की बात है।

खोजी - क्या खूब! यों भी डूबूँ और वों भी डूबूँ। खुश्की ही खुश्की क्यों नहीं चलते?

मिरजा - आप भी वल्लाह, निरे चोंच ही रहे। खुश्की की राह से कितने दिनों में पहुँचोगे भला? खुश्की की एक ही कही।

खोजी - अब आपसे हुज्जत कौन करे। जहाज का कौन एतबार। जरा किसी सूराख की राह से पानी आया, और बस, पहुँचे जहन्नुम सीधे।

आजाद - तो न चलोगे? साफ-साफ बता दो। अभी सवेरा है।

खोजी - चलें तो बीच खेत, मगर पानी का नाम सुना और कलेजा दहल उठा। भला क्यों साहब, यह तो बताइए कि समुद्र का पाट गंगा के पाट से कोई दूना होगा या कुछ कम-बेश?

मिरजा - जी, बस और क्या। चलिए, आपको समुंदर दिखलावें न, थोड़े ही फासले पर है।

खोजी - क्यों नहीं। हमको ले चलिए और झप से चपरगट्टू करके जहाज पर बिठा दीजिए। एक शर्त से चलते हैं। बेगम साहबा जमानत करें। हमारे सिर की कसम खायँ कि जबरदस्ती न करेंगे।

आजाद - इसमें क्या दिक्कत है। चलिए, हम बेगम साहबा से कहलाए देते हैं। आप और आपके बाप, दोनों के सिर की कसम खा लें तो सही।

मिरजा - हाँ-हाँ, वह जमानत कर देंगी। आइए, उठिए।

मियाँ आजाद और मिरजा, दोनों मिल कर गए और बेगम से कहा - इस सिड़ी से इतना कह देना कि तू जहाज देखने जा। ये लोग जबरदस्ती सवार न करेंगे। बेगम साहबा ने जो सारी दास्तान सुनी, तो तिनक कर बोलीं कि हम न कहेंगे। आप लोगों ने जरा सी बात न मानी और सीढ़ी हटा ली। अच्छा, खैर, परदे के पास बुला लो।

खोजी ने परदे के पास आ कर सलाम किया; मगर जवाब कौन दे। बेगम साहबा तो मारे हँसी के लोटी जाती हैं। मियाँ आजाद के खयाल से अपनी चुलबुलाहट पर लजाती भी हैं और खिलखिलाती भी। शर्म और हँसी, दोनों ने मिल कर रुखसारों को और भी सुर्ख कर दिया। इतने में खोजी ने फिर हाँक लगाई कि हुजूर ने गुलाम को क्यों याद फरमाया है?

मिरजा - कहती हैं कि हम जमानत किए लेते हैं।

खोजी - आप रहने दीजिए, उन्हीं को कहने दीजिए।

बेगम - ख्वाजा साहब, बंदगी। आप क्या पूछते हैं।

खोजी - ये लोग मुझे जहाज-दिखाने लिए जाते हैं। जाऊँ या न जाऊँ? जो हुक्म हो, वह करूँ।

बेगम - कभी भूले से न जाना। नहीं फिर के न आओगे।

खोजी - आप इनकी जमानत करती हैं।

बेगम - मैं किसी को जामिन-वामिन नहीं होती। 'जर दीजिए जामिन न हूजिए'। ये डुबो ही देंगे। मुई करौली रखी ही रहेगी।

खोजी - चलिए, बस, हद हो गई। अब हम नहीं जाने के।

आजाद - भई, तुम जरा साथ चल कर सैर तो देख आओ।

खोजी - वाह! अच्छी सैर है। किसी की जान जाय, आपने नजदीक सैर है। उस जानेवाले पर तीन हरफ।

खैर, समझा-बुझा कर दोनों आदमी खोजी को ले चले। जब समुद्र के किनारे पहुँचे तो खोजी उसे देखते ही कई कदम पीछे हटे और चीख पड़े। फिर दस पाँच कदम पीछे खिसके और रोने लगे। या खुदा बचाइए! लहरें देखते ही किसी ने कलेजे को मसोस लिया।

मिरजा - क्या लुत्फ है! खुदा की कसम, जी चाहता है, फाँद ही पड़ूँ।

खोजी - कहीं भूल से फाँदने वाँदने का इरादा न करना। हयाबार के लिए एक चुल्लू काफी है।

आजाद - अजब मसखरा है भई एक आँख से रोता है, एक आँख से हँसता है।

इतने में दो-चार मल्लाह सामने आए। खोजी ने जो उन्हें गौर से देखा, तो मिरजा साहब से बोले - ये कौन है भई? इनकी तो कुछ वजा ही निराली है। भला, ये हमारी बोली समझ लेंगे?

मिरजा - हाँ, हाँ, खूब। उर्दू खूब समझते हैं।

खोजी - (एक मल्लाह से) क्यों भई माँझी, जहाज पर कोई जगह ऐसी भी है, जहाँ समुंदर नजर न आए और हम आराम से बैठे रहें? सच बताना उस्ताद! अजी, हम पानी से बहुत डरते हैं भई!

माँझी - हम आपको ऐसी जगह बैठा देंगे, जहाँ पानी क्या, आसमान तो सूझ ही न पड़े।

खोजी - अरे, तेरे कुरबान। एक बात और बता दो। गन्ने मिलते जायँगे राह में या उनका अकाल है?

माँझी - गन्ने वहाँ कहाँ? क्या कुछ मंडी है? अपने साथ चाहे जितने ले चलिए।

खोजी - हाथ, गँड़ेरियाँ ताजी-ताजी खाने में न आएँगी। भला हलवाई की दुकान तो होगी? आखिर ये इतने शौकीन अफीमची जो जाते हैं, तो खाते क्या हैं?

माँझी - अजी, जो चाहो, साथ रख लो।

खोजी - और जो मुँह-हाथ धोने को पानी की जरूरत हो तो कहाँ से आवे?

आजाद - पागल है पूरा! इतना नहीं समझता कि समुदंर में जाता है और पूछता है कि पानी कहाँ से आएगा।

खोजी - तो आप क्यों उलझ पड़े? आपसे पूछता कौन है? क्यों यार माँझी, भला हम गन्ने यहाँ से बाँध ले चले और जहाज पर चूसें, मगर छिलके फेकेंगे कहाँ। आखिर हम दिन भर में चार-छह पौंड़े खाया ही चाहें।

आजाद - यह बड़ी टेढ़ी खीर है, गन्नों के छिलके खाने पड़ेंगे।

खोजी - आपसे कौन बोलता है? क्यों भई, जो करौली बाँधे तो हर्ज तो नहीं है कुछ?

माँझी - लैसन ले लीजिएगा, और क्या हर्ज है?

खोजी - देखिए, एक बात तो मालूम हुई न! अच्छा यह बताओ कि बहुरूपिए तो जहाज पर नहीं चढ़ने पाते?

माँझी - चाहे जो सवार हो। दाम दे, सवार हो ले।

खोजी - यह तो तुमने बेढब सुनाई। जहाज पर कुम्हार तो नहीं होते?

माँझी - आज तलक कोई कुम्हार नहीं गया।

खोजी - ऐ, मैं तेरी जबान के कुरबान। बड़ी ढारस हुई। खैर कुम्हार से तो बचे। बाकी रहा बहुरूपिया। उस गीदी को समझ लूँगा। इतनी करौलियाँ भोंकूँ कि याद ही करे। हाँ, बस एक और बात भी बता देना। यह कैद तो नहीं है कि आदमी सुबह-शाम जरूर ही नहाय?

माँझी - मालूम देता है, अफीम बहुत खाते हो?

खोजी - हाँ खूब पहचान गए। यह क्योंकर बूझ गए भाई? शौक हो, तो निकालूँ?

माँझी - राम-राम! हम अफीम छूते तक नहीं।

खोजी - ओ गीदी! टके का आदमी और झख मारता है। निकालूँ करौली?

मिरजा - हाँ, हाँ, ख्वाजा साहब! देखिए, जरी करौली म्यान ही में रहे।

खोजी - खैर, आप लोगों की खातिर है। वर्ना उधेड़ कर धर देता पाजी को। आप लोग बीच में न पड़ें, तो भुरकुस ही निकाल दिया होता।

इतने में घोड़े पर सवार एक अंगरेज आ कर आजाद से बोला - इस दरख्त का क्या नाम है ?

आजाद - इसका नाम तो मुझे मालूम नहीं। हम लोग जरा इन बातों की तरफ कम ध्यान देते हैं।

अंगरेज - हम अपने मुल्क की सब घास फूस पहचानता है।

खोजी - विलायत का घसियारा मालूम होता है।

अंगरेज - चिड़िया का इल्म जानता है आप?

आजाद - जी नहीं यह इल्म यहाँ नहीं सिखाया जाता।

अंगरेज - चिड़िया का इल्म हम खूब जानता है।

खोजी - चिड़ीमार है लंदन का। बस, कलई खुल गई।

अंगरेज घोड़ा बढ़ा कर निकल गया। इधर आजाद और मिरजा साहब के पेट में हँसते-हँसते बल पड़ गए।


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