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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


शहर से कोई दो कोस के फासले पर एक बाग है, जिसमें एक आलीशान इमारत बनी हुई है। इसी में शाहजादा हुमायूँ फर आ कर ठहरे हैं। एक दिन शाम के वक्त शाहजादा साहब बाग में सैर कर रहे थे और दिल ही दिल में सोचते जाते थे कि शाम भी हो गई मगर खत का जवाब न आया। कहीं हमारा खत भेजना उन्हें बुरा तो न मालूम हुआ। अफसोस, मैंने जल्दी की। जल्दी का काम शैतान का। अपने खत और उसकी इबारत को सोचने लगे कि कोई बात अदब के खिलाफ जबान से निकल गई हो तो गजब ही हो जाय। इतने में क्या देखते हैं कि एक आदमी साँड़नी पर सवार दूर से चला आ रहा है। समझे, शायद मेरे खत का जवाब लाता होगा। खिदमतगारों से कहा कि देखो, यह कौन आदमी है? खत लाया है या खाली हाथ आया है? आदमी लोग दौड़े ही थे कि साँड़नी सवार हवा हो गया।

थोड़ी देर में एक चपरासी नजर आया। समझे, बस, यह कासिद है। चपरासी ने दरबान को खत दिया और शाहजादा साहब की बाँछे खिल गईं।

दिल ने गवाही दी कि सारी मुरादें मिल गईं। खत खोला, तो एक लेक्चर का नोटिस था। मायूस हो कर खत को रख दिया और सोचा कि अब खत का जवाब आना मुश्किल है। गम गलत करने को एक गजल गाने लगे। इतने ही में डाक का हरकारा लाल पगिया जमाए, धानी दगला फड़काए, लहबर तोते की सुरत बनाए आ पहुँचा और खत दे कर रवाना हुआ। शाहजादे ने खत खोला और इबारत पढ़ी तो फड़क गए। हाय, क्या प्यारी जबान है, क्या बोल-चाल है। जबान और बयान में भी निगाह की तरह जादू कूट-कूट कर भरा है। उस नाजुक हाथ के सदके, जिसने से सतरें लिखी हैं। लिखते वक्त कलाई लचकी जाती होगी। एक-एक लफ्ज से शोखी टपकती है, एक-एक हरफ से रंगीनी झलकती है। और नक्शा तो ऐसा हल किया कि कलम तोड़ दिए। आखिर में लिखा था -

इश्क का हाल बेसवा जानें,
हम बहू-बेटियाँ ये क्या जानें?
खुद ही शेर पढ़ते थे और खुद ही जवाब देते थे।

एकाएक उनके एक दोस्त आए और बोले - कहिए, कुछ जवाब आया? या धता बता दिया?

शाहजादा - वाह, धता तुम जैसों को बताती होंगी। लो, यह जवाब है।

दोस्त - (लिफाफा पढ़ कर) वाह, बड़े अदब से खत लिखा है।

शाहजादा - जनाब, कुछ बाजारी औरतें थोड़े हैं। एक-एक लफ्ज में शराफत बरसती है।

दोस्त - फिर पूछते क्या हो! गहरे हैं। हमें न भूलिएगा।

अब शाहजादे को फिक्र हुई कि किसी तरह मुलाकात की ठहरे। बने या बिगड़े। जब आमने-सामने बात हो, तब दिल को चैन आए। सोचते-सोचते आपको एक हिकमत सूझ ही गई। मूँछों का सफाया कर दिया, नकली बाल लगा लिए, जनाने कपड़े पहने और पालकी पर सवार हो कर हुस्नआरा के दरवाजे पर जा पहुँचे। अपनी महरी को साथ ले लिया था। महरी ने पुकारा - अरे, कोई हैं? जरी अंदर खबर कर दो कि मिरजा हुमायँ फर की बहन मिलने आई हैं।

बड़ी बेगम ने जो सुना, तो आ कर हुस्नआरा से बोलीं - जरा करीने से बैठाना। तमीज से बातें करना। कोई भारी सा जोड़ा पहन लो, समझीं!

हुस्नआरा - अम्माँजान, कपड़े तो बदल लिए हैं?

बड़ी बेगम - देखूँ। यह क्या सफेद दुपट्टा है।

हुस्नआरा - नहीं, अम्माँजान, गुलाबी है। वही जामदानी का दुपट्टा जिसमे कामदानी की आड़ी बेल है।

बड़ी बेगम - बेटा, कोई और भारी जोड़ा निकालो।

हुस्नआरा - हमें तो यही पसंद है।

इतने में आशिक बेगम पालकी से उतरीं और जा कर बोलीं - आदाब बजा लाती हूँ।

हुस्नआरा - तस्लीम! आइए।

आशिक - आओ बहन, गले तो मिलें।

दोनों बहनें बेझिझक आशिक, बेगम से गले मिलीं।

सिपहआरा -

आमद हमारे घर में किसी महलका की है;
यह शाने किर्दगार यह कुदरत खुदा की है।

हुस्नआरा -

यह कौन आया है रख कर फूल; मुए अंबर अफशाँ में;
सबा इतराई फिरती है जो इन रोजों गुलिस्ताँ में।

आशिक -

'सफदर' जबाँ से राजे मुहब्बत अयाँ न हो;
दिल आशनाए-दर्द हो, लब पर फुगाँ न हो।

सिपहआरा - आपने आज गरीबों पर करम किया। हमारे बड़े नसीब।

आशिक - बहन, हमारी तो कई दिन से ख्वाहिश थी कि आपसे मिलें, मगर फिर हम सोचे कि शायद आपको नागवार हो। हम तो गरीब हैं। अमीरों से मिलते हुए जरा वह मालूम होता है।

हुस्नआरा - बजा है। आप तो खुदा के फज्ल से शाहजादी हैं, हम तो आपकी रिआया हैं।

आशिक - आप दोनों बहनें एक दिन कोठे पर टहल रही थीं, तो हुमायूँ फर ने मुझे बुला कर दिखाया था।

हुस्नआरा ने गिलौरी बना कर दी और आशिक बेगम ने उन्हीं के हाथों से खाई। कत्था केवड़े में बसा हुआ, चाँदी-सोने का वर्क लगा हुआ, चिकनी डली और इलायची। गरज कि बड़े तकल्लुफवाली गिलौरियाँ थी। थोड़ी देर के बाद तरह-तरह के खाने दस्तरख्वान पर चुने गए और तीनों ने मिल कर खाना खाया। खाना खा कर आशिक बेगम ने बेतकल्लुफी से हुस्नआरा की रानों पर सिर रख दिया और लेट रहीं। सिपहआरा ने उठ कर कश्मीर का एक दुशाला उढ़ा दिया और करीब आ कर बैठ गई।

आशिक - बहन, अल्लाह, जानता है, तुम दोनों बहनें चाँद को भी शरमाती हो।

हुस्नआरा - और आप?

अपने जोबन से नहीं यार खबरदार हनोज;
नाजी-अंदाज से वाकिफ नहीं जिनहार हनोज।

तीनों में बहुत देर तक बातें होती रहीं। दस बजे के करीब आशिक बेगम उठ बैठीं और फरमाया कि बहन, अब हम रुख्सत होंगे। जिंदगी है तो फिर मिलेंगे।

सिपहआरा -

बेचैन कर रहा है क्या-क्या दिलोजिगर को;
हरदम किसी का कहना, जाते हैं हम तो घर को।

इस तरह मुहब्बत की बातें करके आशिक बेगम रुख्सत हुई और जाते वक्त कह गईं कि एक दिन आपको हमारे यहाँ आना पड़ेगा। पालकी पर सवार हो कर आशिक बेगम ने मामाओं, खिदमतगारों और दरबानों को दो-दो अशर्फियाँ इनाम की दीं और चुपके से मामा को एक तसवीर दे कर कहा कि यह दे देना।

कहारों ने तो पालकी उठाई और मामा ने अंदर जा कर तसवीर दी। हुस्नआरा ने देखा, तो धक से रह गईं। तसवीर के नीचे लिखा था -

'प्यारी,

मैं आशिक बेगम नहीं हूँ, हुमायूँ फर हूँ। अब अगर तुमने बेवफाई की तो जहर खा कर जान दे दूँगा।'

हुस्नआरा - बहन, गजब हो गया!

सिपहआरा - क्या, हुआ क्या? बोलो तो!

हुस्नआरा - लो, यह तसवीर देखो।

सिपहआरा - (तसवीर देख कर) अरे, गजब हो गया! इसने तो बड़ा जुल दिया।

हुस्नआरा - (हीरे की कील नाक से निकाल कर) बहन, मैं तो यह खा कर सो रहती हूँ।

सिपहआरा - (कील छीन कर) उफ जालिम ने बड़ा धोखा दिया।

हुस्नआरा - हम गले मिल चुकीं। जालिम जानू पर सिर रख कर सोया।

सिपहआरा - मगर बाजी, इतना तो सोचो कि बहन कह-कह कर बात करते थे। बहन बना गए हैं।

हुस्नआरा - यह सब बातें हैं। किसकी बहन और कैसा भाई! -

वह यों मुझे देख कर गया है;
खाल उसकी जो खींचिए, सजा है!

सिपहआरा - वाह! किसी की मजाल पड़ी है जो हमसे शरारत करे?

हुस्नआरा - खबरदार, अब उससे कुछ वास्ता न रखना। आदमियों को ताकीद कर दे कि किसी का खत बेसमझे-बूझे न लें, वर्ना निकल दिए जायँगे?

सिपहआरा - जरी सोच लो। लोग अपने दिल में क्या कहेंगे कि अभी तो इतने जोश से मिलीं और अभी यह नादिरी हुक्म।

हुस्नआरा - हाँ, सच तो है। अभी तक हमी तुम जानते हैं।

सिपहआरा - कहीं ऐसा न हो कि वह किसी से जिक्र कर दें।

हुस्नआरा - इससे इतमिनान रखो। वह शोहदे तो हैं नहीं।

सिपहआरा - वाह, शोहदे नहीं, तो और हैं कौन! शोहदों के सिर पे क्या सींग होते हैं?

हुस्नआरा - अब आज से छत पर न चढ़ना।

सिपहआरा - वाह बहन, बीच खेत चढ़े। किसी ने देख ही लिया तो क्या! अपना दिल साफ रहना चाहिए।

हुस्नआरा - मुझे तो ऐस मालूम होता है कि शाहजादे साहब तुम्हारी फिक्र में हैं।

सिपहआरा - चलिए, बस, अब छेड़खानी रहने दीजिए।

हुस्नआरा - अरे वाह! दिल में तो खुशी हुई होगी। चाहे जबान से न कहो।

सिपहआरा - आखिर बुरा क्या है? शाहजादे हें कि नहीं। और सूरत तो तुम देख ही चुकी हो। लो आज के दूसरे ही महीने दरवाजे पर शहनाई बजती होगी।

सिपहआरा - हम उठ कर चले जायँगे, हाँ! यह हँसी हमको गवारा नहीं।

हुस्नआरा - खुदा की कसम, मैं दिल्लगी से नहीं कहती। आखिर उस बेचारे में क्या बुराई है! हसीन, मालदार, शौकीन, नेकबख्त।

सिपहआरा - बस, और दस-पाँच बाते कहिए न।

सिपहआरा के दिल पर इन बातों का बहुत बड़ा असर हुआ। आदमी की तबीयत भी क्या जल्द पलटा खाती है। अभी तो हुमायूँ फर को बुरा-भला कह रही थीं और अब दिल ही दिल में खिली जाती हैं कि हाँ, है तो सच। आखिर उनमें ऐब ही क्या हैं?

दोनों बहनों में तो ये बातें हो रही थीं और वह महरी, जो आशिक बेगम के साथ आई थी, दरवाजे पर चुपकी खड़ी सुन रही थी। जब हुस्नआरा चुप हुई, तो उसने अंदर पहुँच कर सलाम किया।

हुस्नआरा - कौन हो?

महरी - हुजूर, मैं हूँ अच्छन।

हुस्नआरा - कहाँ से आई हो?

महरी - आप मुझे इतनी जल्द भूल गईं! बेगम साहबा ने भेजा है।

हुस्नआरा - बेगम साहबा कौन?

महरी - वही आशिक बेगम जो आपसे मिल गई हैं।

हुस्नआरा - कहो, क्या पैगाम भेजा है।

महरी - (मुसकिरा कर) हुजूर को जरा वहाँ तक तकलीफ दी है।

महरी का मुसकिराना दोनों बहनों को बहुत बुरा लगा। मगर करतीं क्या। महरी उन्हें चुप देख कर फिर बोली - बेगम साहबा ने फरमाया है कि अगर कुछ हर्ज न हो, तो इस वक्त हमारे यहाँ आइए।

सिपहआरा - कह देना हमें फुरसत नहीं।

महरी - उन्होंने कहा कि अगर आपको फुरसत न हो, तो मैं खुद ही आ जाऊँ।

सिपहआरा - जी, कुछ जरूरत नहीं है। बस, अब दूर ही से सलाम है। और अब आज से तुम न आना यहाँ। सुना कि नहीं?

महरी - बहुत अच्छा। लौंडी हुक्म बजा लावेगी। बेगम साहबा की जैसी नौकरी, वैसी ही हुजूर की।

सिपहआरा- चलो, बस। बहुत बानें न बनाओ। कह देना, खैर इसी में हैं कि अब कोई खत वत न आए। शाहजादे हैं, इससे छोड़ दिया, कोई दूसरा होता तो खून हो जाता। इतने बड़े शाहजादे और गरीब शरीफजादियों पर नजर डालते हैं। बस चले, तो वह सजा दूँ कि उम्र भर याद करें। वाह! अच्छा जाल फैलाया है।

हुस्नआरा - बस, अब खामोश भी रहो। कोई सुन लेगा। अब कुछ कहो न सुनो। (महरी से) चलो, सामने से हटो।

महरी - हुजूर, जानबख्शी हो तो अर्ज करूँ।

हुस्नआरा - अब तुम जाओ, हमने कई दफे कह दिया। नहीं पछताओगी।

महरी रवाना हुई। कसम खाई कि अब नहीं आने की। सिपहआरा का चेहरा मारे गुस्से के लाल-भभूका हो गया। हुस्नआरा समझाती थीं कि बहन, अब और बातों का खयाल करो। लेकिन सिपहआरा ठंडी न होती थीं। बहुत देर के बाद बोली - बस, मालूम हुआ कि कोई शोहदा है; अगर सच्ची मुहब्बत है, तो हया और शर्म के साथ जाहिर करना चाहिए या इस बेतुकेपन से?


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