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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


शाहजादा हुमायूँ फर महरी को भेज कर टहलने लगे, मगर सोचते जाते थे कि कहीं दोनों बहनें खफा न हो गई हों, तो फिर बेढब ठहरे। बात की बात जाय, और शायद जान के भी लाले पड़ जायँ। देखें, महरी क्या खबर लाती है। खुदा करे, दोनों महरी को साथ ले कर छत पर चली आवें। इतने में महरी आई और मुँह फुला कर खड़ी हो गई।

शाहजादा - कहो, साफ-साफ।

महरी - हुजूर, क्या अर्ज करूँ!

शाहजादा - वह तो हम तुम्हारी चाल ही से समझ गए थे कि बेढब हुई। कह चलो, बस।

महरी - अब लौंडी वहाँ नहीं जाने की।

शाहजादा - पहले मतलब की बात तो बताओ कि हुआ क्या?

महरी - मैंने जा कर परदे के पास से सुना कि आप ही की बातें चुपके-चुपके कर रही हैं। मैं जो गई, तो बड़ी बहन ने रुखाई के साथ बातें कीं, और छोटी बहन तो बस, बरस ही पड़ीं। मैं खड़ी काँप रही थी कि किस मुसीबत में पड़ी। बहुत तेज हो के बोलीं - अब न आना, नहीं तो तुम जानोगी। और उनसे भी कान खोल के कह देना कि बहुत चल न निकलें। बहुत ही बिगड़ीं। मैं चोर की तरह चुपके-चुपके सुनती रही।

हुमायूँ - अफसोस! तो बहुत ही बिगड़ीं?

महरी - क्या कहूँ हुजूर, अपने आपे ही में नहीं थीं।

हुमायूँ - हमने बड़ी गलती की। पहले तो हमें जाना न था, और गए तो पहचनवाना न था।

महरी - अब जाने वाने का इरादा न कीजिएगा?

दूसरे दिन हुमायूँ फर छत पर निकले, तो क्या देखते हैं कि हुस्नआरा बेगम अपने कोठे पर चढ़ी हैं और मुँह पर नकाब डाले खड़ी हैं। इतने में सिपहआरा भी ऊपर आईं और शाहजादे को देखते ही उचक कर आड़ में हो रहीं। दम के दम में हुस्नआरा भी आँखों से ओझल हो गईं। बेचारे नजर भर कर देखने भी न पाए थे कि दोनों नजर से गायब हो गईं। सोचे, ऐसी ही हया फट पड़ी थी, तो कोठे पर क्यों आईं!

अब उधर की कैफियत सुनिए। हुस्नआरा को मालूम ही न था कि हजरत इस वक्त कोठे पर टहल रहे हैं। जब सिपहआरा ने कोठे पर आ कर शाहजादे को देख लिया तो चुपके से कहा - बहन, यहीं बैठ जाओ, वह ताक-झाँक से बाज न आवेंगे हुस्नआरा ने छलाँग भरी, तो खट से नीचे। सिपहआरा भी उचक कर जीने पर जा पहुँची!

हुस्नआरा - पटकी पड़े। ऐ वाह, अच्छा घर परख लिया है।

सिपहआरा - मेरा बस चले, तो उसका घर उजड़वा दूँ।

हुस्नआरा - यह क्या सितम करती हो? घर आबाद करते हैं या उजड़वाते हैं?

सिपहआरा - बाजी, अल्लाह खैर करे। यह मुआ जब देखो, कोठे पर खड़ा रहता है।

हुस्नआरा - तो तुम काहे को अपनी जबान खराब करती हो? आदमी ही तो वह भी है!

सिपहआरा - बाजी, तुम चाहे मानो, चाहे न मानो; यह मुआ बहुरूपिया है कोई।

इतने में एक लौंडी ने आ कर कहा - लीजिए, बड़ी बेगम साहब ने यह मिठाई दी है। वह जो उस दिन आई नहीं थीं, उन्होंने मिठाइयों के दो ख्वान भेजे हैं।

लौंडी की लड़की का नाम प्यारी था। उसने मिठाई जो देखी, तो तुतला कर बोली -जला सी हमें दीजिए।

सिपहआरा - अरे वाह, इनको दीजिए। बड़ी वह बनके आई हैं! अच्छा, इतना बता दे कि कै ब्याह करेगी?

प्यारी - पहले मिठाई दीजिए, तो बताऊँ।

सिपहआरा - तो मिल चुकी। गढ़ैया में मुँह धो आ।

प्यारी - मैं एक खसम करूँगी, औल फिल छोड़के दूसला। और फिल तीसला। फिल चौथा। उन सबको लातें माल माल के निकाल दूँगी। ले, अब दीजिए।

सिपहआरा - जा अब न दूँगी।

हुस्नआरा - दे दो, दे दो, रो रही है।

सिपहआरा - अच्छा ले, मगर पानी न पीने दूँगी।

प्यारी - हाँ, न पीऊँगी। लाओ तो जला।

इस पर कहकहा पड़ा। जरा सी लड़की और कैसी बातें बनाती है! इतने में बड़ी बेगम आ कर बोली - अरे, तुम्हारी वही गोइयाँ जो उस दिन आई थीं, उन्हीं के यहाँ से मिठाई के दो ख्वान आए हैं। एक औरत साथ थी। कह गई है कि दोनों बहनों को कल बुलाया है। सो कल किसी वक्त चली जाना, घड़ी दो घड़ी दिल बहला के चली आना। नहीं तो मुफ्त की शिकायत होगी।

हुस्नआरा - कल की कल के हाथ है अम्माँजान!

बेगम साहबा तो चली गईं। इधर हुस्नआरा का रंग उड़ गया। बोलीं - बहन, यह टेढ़ी खीर है।

सिपहआरा - एक काम कीजिए। अब बे खुशामद से काम न चलेगा। उनके नाम एक खत लिखिए और साफ-साफ मतलब समझा दीजिए। मुए को अच्छे-अच्छे लटके याद हैं। जब इधर दाल न गली, तो अम्माँजान से लासा लगाया और वह भी कितनी भोली हैं!

एकाएक दरवाजे पर एक नया गुल खिला। दस बारह आदमियों ने मिल कर गाना शुरू किया -

मान करे नंदलाल सों,
सोहागिन जचा मान करे नंदलाल सों।
दूध-पूत और अन्न-धन-लच्छमी
गोद खिलाए नंदलाल सों। मान.।

दस-पाँच आदमी गाने गाते हैं। दो-चार ताल देते जाते हैं। दो-एक मजीरा बजाते हैं। एक हजरत ढोलकी थप-थपाते हैं।

घर भर में खलबली मच गई कि यह माजरा क्या है? लड़का किसके हुआ है? बड़ी बेगम बेवा, दोनों बहनें कुँआरी। यह क्या अंधेर है भई!

मामा - अरे, तुम कौन लोग हो?

कई आदमी - ऐ हुजूर, खुदा सलामत रखे। भाँड़ हैं।

एक साहब हिनहिना कर बोले - मेरे बछेड़े की कुछ न पूछो। यह माँ के पेट ही से हिनहिनाता निकला था।

दूसरे साहब ने उचक कर फरमाया - हें-हें-हैं, दो बागे हैं, और उधर तालियाँ बज रही है। 'मान करे नंदलाल...'

बड़ी बेगम - अरे लोगों, यह है क्या? यह दिन-दहाड़े क्या अंधेर हैं? इन निगोड़े भाँड़ों से पूछो - आए किसके यहाँ हैं?

दरबान - चुप रहो जी, आखिर कहाँ आए हो?

एक भाँड़ - वाह शेरा, क्यों न हो। क्या दुम हिलाके भूँके हो।

दरबान - आखिर तुम लोगों से किसने क्या कहा? कुछ घास तो नहीं खा गए हो?

मामा - यह क्या गजब करते हो!

भाँड़ - गजब पड़े बुरे की जान पर, और आँख लड़े हमसे।

सिपाही - मियाँ, कसम खा कर कहते हे कि यहाँ लड़का-वड़का नहीं हुआ। तुम मानते ही नहीं हो।

भाँड़ - वाह जवान! क्यों न हो, खड़ी मूँछें और चढ़ी दाढ़ी।

सिपाही - (आहिस्ता) भला लड़का होगा किसके? दो लड़कियाँ, वे कुँआरी हैंगी; एक बड़ी बेगम, वह बूढ़ी खप्पट। और तो कोई औरत ही नहीं; तुम यह बक क्या रहे हो!

भाँड़ - यह अच्छी दिल्लगी है भई, फिर उस मर्दक ने कहा ही क्यों था?

सिपाही - यह काँटे किसके बोए हुए हैं?

भाँड़ - अरे साहब, कुछ न पूछिए। बड़ा चकमा हो गया।

दरबान - ले, अब मजीरा वजीरा हटाओ; नहीं तो यहाँ ठीक किए जाओगे।

भाँड़ - वल्लाह, हो बड़े नमकहलाल।

उधर दोनों बहनों में यों बातें होने लगीं।

सिपहआरा - यह उसी की शरारत है।

हुस्नआरा - किनकी? नहीं; तोबा।

सिपहआरा - आप चाहे न मानें, हम तो यही कहेंगे।

हुस्नआरा - बहन, वह शाहजादा हैं, उनसे यह हरकत नहीं हो सकती।

सिपहआरा - अच्छा, फिर ये भाँड़ क्यों आए? अगर किसी ने बहका कर भेजा नहीं, तो आए कैसे?

हुस्नआरा - हाँ, कहती तो सच हो; मगर अल्लाह जानता है, उससे ऐसी हरकत नहीं हो सकती।

सिपहआरा - आप मेरे कहने से उन्हें एक खत लिख भेजिए कि फिर ऐसी हरकत की, तो हम जहर ही खा लेंगे।

हुस्नआरा खत लिखने पर राजी हो गईं और यों खत लिखा -

'हया से मुँह न मोड़ेंगे, सताए जिसका जी चाहे;
वफादारी में हमको आजमाए जिसका जी चाहे।
कभी मानिंदे गौहर आबरू 'सफदर' न जाएगी;
वजाहिर खाक में हमको मिलाए जिसका जी चाहे।

अरे जालिम, कुछ खुदा का डर भी है? क्यों जी, शरीफों की ये ही हरकतें होती है? शर्म नहीं आती! बहन बना कर अब ये शरारतें करते हो! ये ही मरदों के काम हैं! अगर अब किसी की भेजा तो हम हीरे की कनी खा लेंगी। खून तुम्हारी गर्दन पर होगा। आखिर तुम अपने दिल में हमको समझते क्या हो? अगर भूत सिर पर सवार है, तो कहीं और मुँह काला कीजिए। हम घरगिरस्त शरीफजादियाँ, इन बातों से क्या वास्ता? दिल लेना जाने न दिल देना।

'काँटों में न हो अगर उलझना,
थोड़ा लिखा बहुत समझना!'

हुमायूँ फर के पास जब यह खत पहुँचा तो बहुत शरमाए। समझ गए कि यहाँ हमारी दाल न गलेगी। दिल में इरादा कर लिया कि अब भूल कर भी ऐसी चालें न चलेंगे।


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