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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


एक आलीशान महल की छत पर हुस्नआरा और उनकी तीनों बहनें मीठी नींद सो रही हैं। बहारबेगम की जुल्फ से अंबर की लपटें आती थीं; रूहअफजा के घूँघरवाले बाल नौजवानों के मिजाज की तरह बल खाते थे; सिपहआरा की मेहँदी अजब लुत्फ दिखाती थी और हुस्नआरा बेगम के गोरे-गोरे मुखड़े के गिर्द काली-काली जुल्फों को देख कर धोखा होता था कि चाँद ग्रहण से निकला है।

इधर तो ये चारों परियाँ बेखबर आराम में हैं, उधर शाहजादा हुमायूँ फर अपने दोस्त मीर साहब से इधर-उधर की बातें कर रहे हैं।

मीर - कुछ अड़ोसी-पड़ोसियों का तो हाल कहिए। दोनों हसीनें नजर आती हैं या नहीं?

शाहजादा - अरे मियाँ, अब तो चौकड़ी है, एक से एक बढ़-चढ़ कर। सब मस्त है। मगर बला की हयादार।

मीर - यह कहिए, गहरे हो उस्ताद।

शाहजादा - अजी, अभी ख्वाब देख रहा थ एक महरी हुस्नआरा का खत लाई है। खत पढ़ रहा था कि आप बला की तरह आ पहुँचे। जी चाहता है गोली मार दूँ।

मीर - क्यों साहब, आपने तो कान पकड़े थे।

शाहजादा - दिल पर काबू भी तो हो?

मीर - कलंक का टीका लगाओेगे? खुदा के लिए फिर तोबा करो। आखिर चारों छोकड़ियों में से आप रीझे किस पर? या चारों पर दिल आया है?

शाहजादा - चार निकाह तो जायज हैं।

मीर - तो यह कहिए चारों पर दाँत हैं।

शाहजादा - नहीं मियाँ, हँसता हूँ। दो ही तो कुँआरी हैं।

ये बातें हो ही रही थीं कि एकाएक महल्ले में चोर-चोर का गुल मचा। कोई चिराग जलाता है कोई बीवी के जेवर टटोलता है। चारों तरफ खलबली मच गई। पूछने से मालूम हुआ कि बड़ी बेगम साहबा के घर में चोर घुसा था। शाहजादे ने जो यह बात सुनी, तो मीर साहब से बोले - भई मौका तो अच्छा है। चलो, इस वक्त जरा हो आएँ। इसी बहाने एहसान जताएँ।

मीर - सोच लो, ऐसा न हो, पीछे मेरे माथे जाय। तुम तो शाहजादे बन कर छूट जाओगे, उल्लू मैं बनूँगा। आखिर वहाँ चल कर क्या कहोगे?

शाहजादा - अजी, कहेंगे क्या! बस अफसोस करेंगे। शायद इसी फेर में एक झलक मिल जाय। और नहीं, तो आवाज ही सुन लेंगे।

दोनों आदमी बेगम साहबा के मकान पर पहुँचे, तो क्या देखते हैं कि चालीस पचास आदमी एक चोर को घेरे खड़े हें और चारों तरफ से उस पर बेभाव की पड़ रही हें। एक ने तड़ से चपत जमाई, दूसरे ने खोपड़ी पर धौल लगाई। चोर पर इतनी पड़ी कि बिलबिला गया। झल्ला-झल्ला कर रह जाता था। दो-तीन भले आदमी लोगों को समझा रहे थे, बस करो, अब तो खोपड़ी पिलपिली कर दी। क्या जमाते ही जाओगे?

एक - भाई, खूब हाथ गरमाए।

दूसरा - हम तो पोले हाथ से लगाते थे। जिसमें चोट कम आए, मगर आवाज खूब हो।

चोर - छूटूँगा तो एक एक से समझूँगा। क्या करूँ, बेबस हूँ; वर्ना सबको पीस कर धर देता।

बहारबेगम के मियाँ भी खड़े थे। बोले - एक ही शैतान है।

शाहजादा - आखिर, यह आया किधर से?

नवाब साहब - मैं घूम कर कोई दस बजे के लगभग आया। खाना खा कर लेटा ही था कि नींद आ गई। यह गुल मचा, तो तलवार ले कर दौड़ पड़ा। अब सुनिए, मैं तो ऊपर से आ रहा हूँ, और चोर नीचे से ऊपर जाता है। रास्ते में मुठभेड़ हुई। इसने छुरी निकाली, मगर मैंने भी तलवार का वह हाथ चलाया कि जरा हाथ ओछा न पड़े, तो भंडारा खुल जाय। फिर तो ऐसा सहमा कि होश उड़ गए। भागते राह न मिली। अब छत पर पहुँचा और चाहता था कि झपट कर नीचे कूद पड़े; मगर मेरी छोटी साली ने इस फुरती से रस्सी का फंदा बना कर फेंका कि उलझ कर गिरा। उठ कर भागने को ही था कि मैं गले पर पहुँचा गया और जाते ही छाप बैठा। औरतों ने दोहाई देना शुरू की; लेकिन मैंने न छोड़ा। आपने इस वक्त कहाँ तकलीफ फरमाई?

शाहजादा - मैंने कहा, चल कर देखूँ क्या बात हुई। बारे शुक्र है कि खैरियत हुई। मगर आपकी साली बड़ी दिलेर हैं। दूसरी औरत हो, तो डर जाय।

यहाँ तो यह बातें हो रही थीं, उधर अंदर चारों बहनों में भी यही जिक्र था। चारों हँस-हँस कर यही बातें कर रही थीं -

सिपहआरा - है-है बाजी, मैंने जब उसे काले-काले संडे को देखा, तो सन से जान निकल गई।

रूहअफजा - मुआ तंबाकू का पिंडा।

हुस्नआरा - वह तो खैर गुजरी कि संदूक हाथ से गिर पड़ा, नहीं तो सब मूस ले जाता।

सिपहआरा - बहारबेगम की चिड़चिड़ी सास लाखों ही सुनाती कि मेरी बहू के गहने सब बेच खाए ।

बहारबेगम - चोर-चोर की भनक कान में पड़ी, तो मैं कुलबुला कर चौंक पड़ी। भागी, तो जूड़ा भी खुल गया। अल्लाह जानता है, बड़ी मिहनत से बाँधा था। चलो खैर!

रूहअफजा - बस, हमारी बाजी को चोटी कंघी की फिक्र रहती है।

हुस्नआरा - जितना इनको इस बात का खयाल है, उतना हमारे खानदान भर में किसी को नहीं है। जभी तो दूल्हा भाई इतने दीवाने रहते है।

बहारबेगम - चलो, बैठी रहो; छोटे मुँह बड़ी बात!

हुस्नआरा - दूल्हा भाई को इनके साथ इश्क है।

बहारबेगम - क्या टर-टर लगाई है नाहक!

अब दिल्लगी सुनिए कि मिरजा हुमायँ फर बाहर बैठे चुपके-चुपके सारी बातें सुन रहे थे। नवाब बेचारे कट-कट गए, मगर चुप। अंदर जा कर समझाएँ, तो अदब के खिलाफ चुपके बैठे रहें, तो भी रहा नहीं जाता। जान अजाब में थी। खैर, हुक्का पी कर शाहजादा रुख्सत हुए। उनके चले जाने के बाद नवाब साहब अंदर आए और बोले - तुम लोगों की भी अजब आदत है। जब देखोगी कि कोई गैर आदमी आके बैठा है, बस, तभी गुल मचाओगी। इस वक्त एक भलेमानस बैठे थे और यहाँ चुहल हो रही थी।

बहारबेगम - वह भलामानस निगोड़ा कौन था, जो इतने वक्त पंचायत करने आ बैठा?

रूहअफजा - तो अब कोई उनके मारे अपने घर में बात न करे? घोट कर मार न डालिए।

हुस्नआरा - हम भी तो सुनें, वह भलेमानस कौन थे?

नवाब - अजी, यही, जो सामने रहते हैं; शाहजादे।

हुस्नआरा - तो आपने आ कर हमसे कह क्यों न दिया? फिर हम काहे को बोलते? बहारबेगम - अपनी खता न कहेंगे, दूसरों को ललकारेंगे।

नवाब - उस वक्त वहाँ से आने का मौका न था। मुझसे पूछा कि चोर को किसने पकड़ा। मैंने कहा, मेरी छोटी साली ने तो बहुत ही हँसे।

नवाब साहब बाहर चले गए, तो फिर बातें होने लगीं।

सिपहआरा - जरा उसकी ढिठाई तो देखो कि चोर का नाम सुनते ही आ डटा। भला क्या वजह थी इसकी? ऐसा कहाँ का बड़ा रुस्तम था?

हुस्नआरा - तीन बजे के वक्त आप जो आए, तो क्यों आए!

रूहअफजा - मैं बताऊँ! उसको यह खबर न होगी कि दूल्हा भाई घर पर हैं। यह न होते, तो घर में घुस पड़ता।

सिपहआरा - काम तो शोहदों के जैसे हैं।

अब एक और दिल्लगी सुनिए। चोर आया, गुल गपाड़ा हुआ, पकड़ा गया जमाने भर में हुल्लड़ मचा, महल्ला भर जाग उठा; चोर थाने पर पहुँचा; मगर बड़ी बेगम साहबा अभी तक खर्राटे ही ले रही हैं। जब जागीं, तो मामा से बोलीं - कुछ गुल सा मचा था अभी?

मामा - हाँ, कुछ आवाज तो आई थी!

बेगम - हरी, किसी से पूछो तो।

मामा - ऐ बीबी, पूछना इसमें क्या है? भेड़िया-बेड़िया आया होगा।

बेगम - मैंने आज हाथी को ख्वाब में देखा है, अल्लाह बचाए।

इतने में चोर के आने की खबर मिली। तब तो बेगम साहबा के होश उड़ गए। मामा को भेजा कि जा पूछ, कुछ ले तो नहीं गया।

हुस्नआरा - अम्माँजान बहुत जल्द जागीं! क्या तू भी घोड़े बेच कर सोई थी! अल्लाह री नींद!

मामा- जरी आँख लग गई थी। मगर कुछ गुल की आवाज जरूर आई थी।

हुस्नआरा - महल्ला भर जाग उठा, तुम्हारे नजदीक कुछ ही कुछ गुल था। ठीक! जाके अम्माँ से कह दे कि चोर आया था, मगर जाग हो गई।

सिपहआरा - ऐ, काहे के वास्ते बहकती हो। मामा, तू जा के सो रह; शोर-गुल कहीं कुछ न था, कोई सोते में बर्रा उठा होगा।

हुस्नआरा - नहीं मामा, यह दिल्लगी करती हैं। चोर आया था।

मामा - ऐ, गया चूल्हे में निगोड़ा चोर! इधर आने का रुख करे, तो आँखे ही फूट जायँ। क्या हँसी ठट्ठा है।

सिपहआरा - देखो तो सही भला!

मामा - अभी बेगम साहबा सुन लें, तो दुनिया सिर पर उठा लें।

मामा ने जा कर बेगम से कहा - हुजूर, कुछ है न वै, बेकार को जगाया। न भेड़िया, न चोर, कोई सोते-सोते बर्रा उठा था।

बेगम - जरा बाहर जा कर तो पूछ कि यह गुल कैसा था?

महरी - बीबी, मैं अभी बाहर से आई हूँ, कोठे पर कलमुँहा आया था। मोठरी का कुलुफ तोड़ कर जब संदूक उठाया, तो जाग हो गई। इतने में नवाब साहब कोठे पर से नंगी तलवार लिए दौड़ आए।

बेगम - नवाब साहब के दुश्मनों को तो कहीं चोट-ओट नहीं आई?

महरी - ना बीबी, एक फाँस तक तों चुभी नहीं।

बेगम - चोर कुछ ले तो नहीं गया।

महरी - एक झंझी तक नहीं।

बेगम - चोर अब कहाँ है?

महरी - खादिमहुसैन थाने पर ले गया।

मामा - अब चक्की पीसनी पड़ेगी।

बेगम - तू तो कहती थी कि कोई सोते-सोते बर्रा उठा था। झूठी जमाने भर की। चल, जा, हट!

अब थाने का हाल सुनिए। थानेदार नदारद; जमादार शराब पिए मस्त; कांस्टेबिल अपनी-अपनी डयुटी पर। एक कांस्टेबिल पहरे पर पड़ा सो रहा था। खादिमहुसैन ने बहुत गुल मचाया। तब जाके हजरत की नींद खुली। बिगड़े कि मुझे जगाया क्यों? चोर को छोड़ दो।

खादिमहुसैन - वाह, छोड़ देने की एक ही कही। मैं भी थाने में मुहर्रिर रह चुका हूँ।

कांस्टेबिल - न छोड़ोगे तुम?

खादिमहुसैन - होश की दवा करो मियाँ! इसके साथ तुमको भी फँसाऊँ तो सही।

कांस्टेबिल - (चोर से) तुझे इन्होंने अपने यहाँ कै घंटे रखा था?

चोर - पकड़ के बस यहाँ ले आए?

कांस्टेबिल - दुत गौखे! अबे, तू कहना कि मैं राह-राह चला जाता था, इनसे मुझसे लागडाट थी। इन्होंने घात पा कर मुझे पकड़ लिया, खूब पीटा और चार घंटे तक अस्तबल की कोठरी में बद रखा।

चोर - लागडाट क्या बताऊँ!

कांस्टेबिल - कह देना कि मेरी जोरू पर यह बुरी निगाह डालते थे। बस, लागडाट हो गई।

चोर - मगर मेरी जोरू तो चार बरस हुए, एक के साथ निकल गई।

कांस्टेबिल - बस, तो बात बन गई! कह देना, इन्हीं की साजिश से निकली थी। तो इन पर दो जुर्म कायम होंगे। यह एक कि तुमको झूठ-मूठ फाँस लिया, दूसरे जबरदस्ती कैद रखा।

खादिमहुसैन - तुम्हारी बातों पर कुछ हँसी आती है, कुछ गुस्सा।

कांस्टेबिल - जब बड़ा घर देखोगे, सब हँसी का हाल खुल जायगा।

खादिमहुसैन - हमारे घर में चोरी हो और हमीं फँसे?

खैर कांस्टेबिल साहब रोजनामचा लिखने बैठे। खादिमहुसैन ने सारी दास्तान बयान की। जब उसने यह कहा कि नवाब साहब तलवार से ले कर दौड़े, तो कांस्टेबिल ने कलम रोक दिया और कहा - जरा ठहरो, तलवार का लैसंस उनके पास है?

खादिमहुसैन - उनके साथ तो बीस सिपाही तलवार बाँधे निकलते हैं। तुम एक लैसंस लिए फिरते हो!

आखिर रिपोर्ट खतम हुई और खादिम अपने घर आया।


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