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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


कई दिन तक तो जहाज खैरियत से चला गया, लेकिन पेरिस के करीब पहुँचकर जहाज के कप्तान ने सबको इत्तिला दी कि एक घंटे में बड़ी सख्त आँधी आनेवाली है। यह खबर सुनते ही सबके होश-हवास गायब हो गए। अक्ल ने हवा बतलाई, आँखों में अँधेरी छाई, मौत का नक्शा आँखों के सामने फिरने लगा। तुर्रा यह कि आसमान फकीरों के दिल की तरह साफ था, चाँदनी खूब निखरी हुई, किसी को सान-गुमान भी नहीं हो सकता था कि तूफान आएगा; मगर बेरोमीटर से तूफान की आमद साफ जाहिर थी। लोगों के बदन के रोंगटे खड़े हो गए, जान के लाले पड़ गए; या खुदा, जाएँ तो कहाँ जाएँ, और इस तूफान से नजात क्योंकर पाएँ? कप्तान के भी हाथ-पाँव फूल गए और उसके नायब भी सिट्टी-पिट्टी भूल गए। सीढ़ियों से तख्ते पर आते थे और घबरा कर फिर ऊपर चढ़ जाते थे। कप्तान लाख-लाख समझाता था, मगर किसी को उसकी बात पर यकीन न आता था -

किसी तरह से समझता नहीं दिले नाशाद;

वही है रोना, वही चीखना, वही फरियाद।

इतने में हवा ने वह जोर बाँधा कि लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। कप्तान ने एक पाल तो रहने दिया, और जहाज को खुदा की राह पर छोड़ दिया। लहरों की यह कैफियत की आसमान से बातें करती थीं। जहाज झोंके खा कर गेंद की तरह इधर से उधर उछलता था। सब के सब जिंदगी से हाथ धो बैठे, अपनी जानों को रो बैठे। बच्चे सहम कर अपनी माँओं से चिपटे जाते थे। कोई औरत मुँह ढँक कर रोती थी कि उम्र भर की कमाई इस समुद्र में गँवाई। कोई अपने प्यारे बच्चे को छाती से लगा कर कहती - बेटा, अब हम रुख्सत होते हैं। पर वह नादान मुसकिराता था और इस भोलपन से माँ के दिल पर बिजलियाँ गिराता था। किसी को मारे खौफ के चुप लग गई थी, किसी के हाथ-पाँवों में कँपकँपी थी। कोई समुद्र में कूद पड़ने का इरादा करके रह जाता था, कोई बैठा देवतों को मनाता था। क्या बूढ़े, क्या जवान, सबकी अक्ल गुम थी। वेनेशिया के चेहरे का रंग काफूर हो गया। हँसोड़ के दिल से हँसी का खयाल कोसों दूर हो गया। मियाँ आजाद का चेहरा जर्द, अपिल्टन के हाथ-पाँव सर्द। मियाँ आजाद सोचने लगे, या खुदा, यह किस मुसीबत से दो-चार किया, माशूक के एवज मौत को गले का हार किया! जी लगाने की खूब सजा पाई, इश्क की धुन में जान भी गँवाई। हमारी हड्डियाँ तक गल जाएँगी; पर हुस्नआरा हमारी खबर भी न पाएँगी। सिपहआरा बार-बार फाल देखेंगी कि आजाद कब मैदान से सुर्खरू हो कर आएँगे और हम कब मसजिद में घी के चिराग जलाएँगे मगर आजाद की किश्ती गोते खाती है और जरा देर में तह की खबर लाती है।

जहाज में तो यह कुहराम मचा था, मगर खोजी लंबी ताने सो ही रहे थे। इस नींद पर खुदा की मार, इस पिनक पर शैतान की फटकार! आजाद ने जगाया कि ख्वाजा साहब, उठिए, तूफान आया है। हजरत ने लेटे ही लेटे भुनभुना कर फरमाया कि चुप गीदी, हमने ख्वाब में बहुरूपिया पकड़ पाया है। तब तो आजाद झल्लाए और कस कर एक लात लगाई। खोजी कुलबुला कर उठ बैठे और समुद्र की भयानक सूरत देखी, तो काँप उठे।

कप्तान खूब समझता था कि हालत हर घड़ी नाजुक होती जाती है; लेकिन पुराना आदमी था, कलेजा मजबूत किए हुए था। इससे लोगों को तसल्ली होती थी कि शायद जान बच निकले। सामने पेरिम का जजीरा नजर आता था मगर वहाँ तक पहुँचना मुहाल था। सब के सब दुआ कर रहे थे कि जहाज किसी तरह इस टापू तक पहुँच जाय। मरने की तैयारियाँ हो रही थीं। इतने में आजाद ने क्या देखा कि अपिल्टन वेनेशिया का हाथ पकड़ कर तख्ते पर खड़े रो रहे हैं। आजाद को देखते ही वेनेशिया ने कहा - मिस्टर आजाद, रुख्सत! हमेशा के लिए रुख्सत!

आजाद - रुख्सत!

हँसोड़ - है-है!लो, अब भँवर में जहाज आ गया।

यह सुन कर औरतों ने वह फरियाद मचाई कि लोगों के कलेजे दहल गए।

अपिल्टन - बस, इतनी ही दुनिया थी!

आजाद - हाँ, इतनी ही दुनिया थी!

खोजी - भई आजाद, खुदा गवाह है, मैं इस वक्त अफीम के नशे में नहीं। अफसोस, तुम्हारी जान जाती है, हुस्नआरा समझेंगी कि आजाद ने धोखा दिया। हाय, आजाद तेरी जवानी मुफ्त गई।

एकाएक जहाज तीन बार घूमा और हवा के झोंके से कई गज के फासले पर जा पहुँचा। अब लाइफ-बोट के सिवा और कोई तदबीर न थी। जहाज डूबने ही को था, दस फुट से ज्यादा पानी उसमें समा गया था। लाइफ-बोट समुद्र में उतारे गए और आजाद लड़कों और औरतों को उठा-उठा कर लाइफबोट में बैठाने लगे। उनकी अपनी जान खतरे में थी, मगर इसकी उन्हें परवा न थी! जब वह वेनेशिया के पास पहुँचे, तो उसने इनसे हाथ मिलाया और अपिल्टन और वह, दोनों लाइफबोट में कूद पड़े। आजाद की दिलेरी पर लोग हैरत से दाँतों तले उँगली दबाते थे। लोगों को यकीन हो गया था कि यह कोई फरिश्ता है, जो बेगुनाहों की जान बचाने के लिए आया है।

टापू के वाशिंदे किनारे पर खड़े रोशनी कर रहे थे कि शोले उठें और जहाज के लोग समझ जाएँ कि जमीन करीब है। सैकड़ों आदमी गुल मचाते थे, तालियाँ बजाते थे। कुछ लोग रो रहे थे। मगर कुछ ऐसे भी थे, जो दिल में खिले जाते थे कि अब पौ बारह हैं।

एक - बस, अब जहाज डूबा। तड़के ही से लैस होकर आ डटूँगा।

दूसरा - हमें एक बार जवाहिरात का एक संदूक मिल गया था।

तीसरा - अजी हमने इसी तरह बहुत-कुछ पैदा किया।

चौथा - अजी, क्या बकते हो? कुछ तो खुदा से डरो। वे सब तो मुसीबत मे हैं, और तुम लोगों को लूट की धुन सवार है। शर्म हो, तो चुल्लू-भर पानी में डूब मरो।

मियाँ खोजी बार-बार हिम्मत बाँध कर लाइफ-बोट की तरफ जाते और डर कर लौट आते थे। आखिर आजाद ने उन्हें भी घसीट कर लाइफ-बोट में पहुँचाया। वहाँ जाते ही उन्होंने गुल मचाया कि अफीम की डिबिया तो वहीं रह गई! मियाँ जरी कोई लपक के हमारी डिबिया ले आए। आजाद ने कहा - मियाँ तुम भी कितने पागल हो? यहाँ जानों के लाले पड़े हैं, तुम्हें अपनी डिबिया ही की फिक्र है।

लाइफ-बोट कुल तीन थे उनमें मुश्किल से पचास-साठ आदमी बैठ सकते थे। लेकिन हर शख्स चाहता था कि मैं भी लाइफ-बोट में पहुँच जाऊँ। कप्तान ने यह हालत देखी, तो जंजीरें खोल दीं। किश्तियाँ बह निकलीं। अब बाकी आदमियों की जो हालत हुई, वह बयान में नहीं आ सकती। अहगर कोई फोटोग्राफर इन बदनसीबों की तसवीर उतारता, तो बड़े से बड़े संगदिल भी उसे देख कर सिर धुनते। मौत चिमटी जाती है, और मौत के पंजों में फँसी हुई जान फड़फड़ा रही है। मगर जान बड़ी प्यारी चीज है। लोग खूब जाते थे कि जहाज के डूबने में देर नहीं,

लाइफ-बोट भी दूर निकल गए। मगर फिर भी यह उम्मीद है, शायद किसी तरह बच जायँ। दो बदनसीब बहनें यों बातें कर रही थीं -

बड़ी बहन-कूद पड़ो पानी में। शायद बच जायँ।

छोटी बहन - लहरें कहीं न कहीं पहुँचा ही देंगी।

बड़ी - अम्माँ सुनेंगी तो क्या करेंगी?

छोटी - मैं तो कूदती हूँ।

बड़ी - क्यों जान देती है?

एक औरत ने अपने प्यारे बच्चे को समुद्र में फेंक दिया और कहा - यह लड़का तेरे सिपुर्द करती हूँ।

यह कह कर खुद भी गिर पड़ी।

अब सुनिए; जिस लाइफ-बोट पर वेनेशिया, और अपिल्टन थे, वह हवा के झोंके से पेरिम से दूर हट गया। वेनेशिया ने कहा - अब कोई उम्मेद नहीं।

अपिल्टन - खुदा पर भरोसा रखो।

वेनेशिया - या खुदा, हमें बचा ले। हम बेगुनाह हैं।

अपिल्टन - सब्र, सब्र!

वेनेशिया - लो, आजाद की किश्ती भी इधर ही आने लगी। अब कोई न बचेगा।

दोनों किश्तियाँ थोड़े ही फासले पर जा रही थीं, इतने में एक लहर ने अपिल्टन की किश्ती को ऐसा झोंका दिया कि वह नीचे ऊपर होने लगी और तीन आदमी समुद्र में गिर पड़े। अपिल्टन भी उनमें से एक थे। उनके गिरते ही वेनेशिया ने एक चीख मारी और बेहोश हो गई। आजाद ने यह हाल देखा, तो फौरन बोट पर से कूद पड़े और जान हथेली पर लिए हुए, लहरों को चीरते, अपिल्टन की मदद को चले। इधर अपिल्टन का कुत्ता भी पानी मे कूदा और उनके सिर के बाल दाँतों से पकड़े ऊपर लाया। मियाँ आजाद भी तैरते हुए जा पहुँचे और अपिल्टन को पकड़ लिया। उसी वक्त किश्ती भी आ पहुँची और लोगों ने मदद दे कर अपिल्टन को खींच लिया। मगर किश्ती इतनी तेजी से निकल गई कि आजाद उस पर न आ सके। अब उनके लिए मौत का सामना था। मगर वह कलेजा मजबूत किए टापू की तरफ तैरते चले जाते थे। टापूवालों ने उन्हें आते देखा, तो और भी हौसला बढ़ाया, और हिम्मत दिलाई। सब के सब दुआ कर रहे थे कि या खुदा इस जवान को बचा। ज्यों ही आजाद टापू के करीब पहुँचे, रस्सियाँ फेकी गईं और आजाद ऊपर आए। सब ने उनकी पीठ ठोंकी। वेनेशिया ने मियाँ आजाद से कहा - तुम न होते तो, मैं कहीं की न रहती। तुम्हारा एहसान कभी न भूलूँगी।

अपिल्टन - भाई, देखना, भूल न जाना। टर्की से खत लिखते रहना।

आजाद - जरूर, जरूर!

वेनेशिया - आजाद, जैसे बहन को अपने भाई की मुहब्बत होती है, वैसे ही मुझको तुम्हारी मुहब्बत है।

आजाद - मैं जहाँ रहूँगा, आप लोगों से जरूर मिलूँगा।

खोजी - यार, हमारी अफीम की डिबिया जहाज ही में रह गई। देखें, किस खुशनसीब के हाथ लगती है।

सब लोग यह जुमला सुन कर खिलखिला कर हँस पड़े।


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