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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग एक

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


आजाद तो उधर काहिरे की हवा खा रहे थे, इधर हुस्नआरा बीमार पड़ीं। कुछ दिन तक तो हकीमों और डॉक्टरों की दवा हुई, फिर गंडे-ताबीज की बारी आई। आखिर आबोहवा तब्दील करने की ठहरी। बहारबेगम के पास गोमती के किनारे एक बहुत अच्छी कोठी थी। चारों बहनें बड़ी बेगम और घर के नौकर-चाकर सब इस नई कोठी में आ पहुँचे।

बेगम - मकान तो बड़ा कुशादा है! देखूँ, चंद्रबेधी है या सूर्यबेधी।

हुस्नआरा - हाँ, अम्माँजान, यह जरूर देखना चाहिए।

रूहअफजा - ले लो, जरूर। हजार काम छोड़ कर।

दोनों बहनें हँसती-बोलती मकान के दालान और कमरे देखने लगीं। छत पर एक कमरे के दरवाजे जो खोले, तो देखा दरिया लहरें मार रहा है। हुस्नआरा ने कहा - बाजी, इस वक्त जी खुश हो गया। हमारी पलंगड़ी यहीं बिछे। बरसों की बीमार यहाँ रहे, तो दो दिन में अच्छा-भला चंगा हो जाय।

सिपहआरा - बहार बहन, भला कभी अँधेरे-उजाले दूल्हा भाई नहाने देते हैं दरिया में?

बहारबेगम - ऐ है, इसका नाम भी न लेना। इनको बहुत चिढ़ है इस बात की।

सुबह का वक्त था, चारों बहनें ऊँची छत पर हवा खाने लगीं कि इतने में एक तरफ से धुआँ उठा। हुस्नआरा ने पूछा - यह धुआँ कैसा है?

रूहअफजा - इस घाट पर मुर्दे जलाए जाते हैं।

हुस्नआरा - मुर्दे यहीं जलते हैं?

बहारबेगम - हाँ, मगर यहाँ से दूर है।

सिपहआरा - हाय, क्या जाने कौन बेचारा जल रहा होगा?

रूहअफजा - जिंदगी का भरोसा नहीं।

बड़ी बेगम ने सुना कि यहाँ मुर्दे जलाए जाते हैं, तो होश उड़ गए। बोलीं - ऐ बहार तुम यहाँ कैसे रहती हो? खुरशेद दूल्हा आएँ, तो उनसे कहूँ।

हुस्नआरा - फायदा? बरसों से तो वह यहाँ रहते हैं; भला तुम्हारे कहने से मकान छोड़ देंगे!

सिपहआरा - यह हमेशा यहाँ रहते हैं, कुछ भी नहीं होता। हम जो दो दिन रहेंगे, तो मुर्दे आ कर चिपट जायँगे भला?

बड़ी बेगम का बस चलता, तो खड़े-खड़े चली जातीं; मगर अब मजबूर थीं। यहाँ से चारों बहनें दूसरी छत पर गईं तो बहारबेगम ने कहा - यह जो उस तरफ दूर तक ऊँचे-ऊँचे टीले नजर आते हैं, यहाँ आबादी थी। जहाँ तुम बैठी हो, यहाँ वजीर का मकान था। मजाल क्या था कि कोई इस तरफ आ जाता! मगर अब वहाँ खाक उड़ती हैं, कुत्ते लोट रहे हैं।

इतने में एक किश्ती इसी घाट पर रुकी। उस पर से दो आदमी उतरे, एक बूढ़े थे, दूसरा नौजवान। दोनों एक कालीन पर बैठे और बातें करने लगे। बूढ़े मियाँ ने कहा - मियाँ आजाद सा दिलेर जवान भी कम देखने में आएगा। यह उन्हीं का शेर है -

सीने को चमन बनाएँगे हम,

गुल खाएँगे गुल खिलाएँगे हम।

जवान (गुलबाज) - मियाँ आजाद कौन थे जनाब?

इस पर बूढ़े मियाँ ने आजाद की सारी दास्तान बयान कर दी। दोनो बहनें कान लगा कर दोनों आदमियों की बातें सुनती थीं और रोती थीं। हैरत हो रही थी कि ये दोनों कौन हैं और आजाद को कैसे जानते हैं? महरी से कहा - जाके पता लगा कि वह दोनों आदमी, जो दरख्त के साये में बैठे हुक्का पी रहे हैं, कौन हैं? महरी ने एक भिश्ती के लड़के को इस काम पर तैनात किया। लड़के ने जरा देर में आ कर कहा - दोनों आदमी सराय में ठहरेंगे और दो दिन यहाँ रहेंगे। मगर हैं कौन, यह पता न चला। महरी ने जा कर यही बात हुस्नआरा से कह दी। हुस्नआरा ने कहा - उस लड़के को यह चवन्नी दो और कहो, जहाँ ये टिकें, इनके साथ जाए और देख आए। महरी ने जोर से पुकारा - अबे ओ शुबराती! सुन, इन दोनों आदमियों के साथ जा। देख, कहाँ टिकते हैं।

शुबराती - अजी, अभी पहुँचा।

शुबराती चले। रास्ते में आपको शौक चर्राया कि छल्लामीरी खेलें। एक घंटे में शुबराती ने कोई डेढ़ पैसे की कौड़ियाँ जीतीं। मगर लालच का बुरा हो, जमे, तो दम के दम में डेढ़ पैसा वह हारे, और बारह कौड़ियाँ गिरह से गईं, वहाँ से उदास हो कर चले। राह में बंदर का तमाशा हो रहा था। अब मियाँ शुबराती जा चुके। कभी बंदरिया को छेड़ा, कभी बकरे पर ढेला फेंका। मदारी ने देखा कि लौंडा तेज है, तो बोला - इधर आओ जवान, आदमी हो कि जानवर?

शुबराती - आदमी।

मदारी - सूअर कि शेर?

शुबराती - हम शेर, तुम सूअर।

मदारी - गधा कि गधी?

शुबराती - गधा

मदारी - उल्लू कि बैल!

शुबराती - तुम उल्लू, तुम्हारे बाप बैल, और तुम्हारे दादा बछिया के ताऊ।

थोड़ी देर के बाद मियाँ शुबराती यहाँ से रवाना हुए, तो एक रईस के यहाँ एक सपेरा साँप का तमाशा दिखा रहा था। मियाँ शुबराती भी डट गए। सँपेरा तोंबी में भैरवी का रंग दिखाता था।

रईस ने कहा - तब जानें, जब किसी के सिर से साँप निकालो।

सपेरे ने कहा - हुजूर, मंतर में सब कुदरत है। मुल कोई आध सेर आटा तो पेट भर खाने को दो। जिसके बदन से कहिए, साँप निकालूँ।

लौंडे यह सुन कर हुर्र हो गए कि धरे न जायँ। मियाँ शुबराती डटे खड़े रहे।

सपेरा - वाह जवान, तुम्हीं एक बहादुर हो।

शुबराती - और हमारे बाप हमसे बढ़ कर।

सपेरा - यहाँ बैठ तो जाओ।

मियाँ शुबराती बेधड़क जा बैठे। सपेरे ने झूठमूठ कोई मंत्र पढ़ा और जोर से मियाँ शुबराती की खोपड़ी पर धप जमा कर कहा यह लीजिए साँप। वाह-वाह का दौंगड़ा बज गया। रईस ने सँपेरे को पाँच रुपए इनाम दिए और कहा - इस लौंडे को भी चार आने पैसे दे दो। मियाँ शुबराती ने चवन्नी पाई, तो फूले न समाए। जाते दी गोल-गप्पेवाले से पैसे के कचालू, धेले के दही-बड़े, धेले की सोंठ की टिकिया ली और चखते हुए चले। फिर तकिए पर जा कर कौड़ियाँ खेलने लगे। दो पैसे की कौड़ियाँ हारे। वहाँ से उठे, तो हलवाई की दुकान पर एक आने की पूरियाँ खाईं और कुएँ पर पानी पिया। वहाँ से आ कर महरी को पुकारा।

महरी - कहो, वह हैं?

शुबराती - वह तो चले गए।

महरी - कुछ मालूम हैं, कहाँ गए?

शुबराती - रेल पर सवार हो कर कहीं चल दिए।

महरी ने जा कर हुस्नआरा ने यह खबर कही, तो उन्होंने कहा - लौंडे से पूछो, शहर ही में हैं या बाहर चले गए? महरी ने जा कर फिर शुबराती से पूछा - शहर में हैं या बाहर चले गए? शुबराती को इसकी याद न रही कि मैंने पहले क्या कहा था, बोला - किसी और सराय में उठ गए।

महरी - क्यों रे झूठे, तू तो कहता था, रेल पर चले गए?

शुबराती - मैंने?

महरी - चल झूठे, तू गया कि नहीं।

शुबराती - अब्बा की कसम, गया था।

महरी - चल दूर हो, मुआ झूठा।

इतने में बड़ी बेगम का पुराना नौकर हुसैनबख्श आ गया। हुस्नआरा ने उसे बुला कर कहा - बड़े मियाँ, एक साहब आजाद के जानने वालों में यहाँ आए हैं और किसी सराय में ठहरे हैं। तुम जरा इस लौंडे शुबराती के साथ उस सराय तक जाओ और पता लगाओ कि वह कौन साहब हैं। अब मियाँ शुबराती चकराए कि खुदा ही खैर करे। दिल में चोर था, कहीं ऐसा न हो कि वह अभी सराय में टिके ही हों, तो मुझ पर बेभाव की पड़ने लगें। दबे दाँतों कहा, चलिए। आगे-आगे हुसैनबख्श और पीछे-पीछे मियाँ शुबराती चले। राह में शुबराती ने एक लौंडे की खोपड़ी पर धप जमाई, और आगे बढ़े, तो एक दीवाने पर कई ढेले फेंके, और दो कदम गए, तो एक बूढ़ी मामा से कहा - नानी, सलाम। वह गालियाँ देने लगी, मगर आप बहुत खिलखिलाए। और आगे चले, तो एक अंधा मिला। आपने उससे कहा - आगे गड्ढा है, और उसकी लाठी छीन ली। हुसैन बख्स कभी मुसकिराते थे, कभी समझाते। चलते-चलते एक तेली मिला, मियाँ शुबराती ने पूछा - क्यों भई तेली, मरना, तो अपनी खोपड़ी मुझे दे देना। मंतर जगाऊँगा। तेली ने कहा - चुप! लौंडा बड़ा शरीफ है। और आगे बढ़े, तो एक अंगरेज से पूछा - क्यों बड़े भाई, अपनी दाढ़ी नहीं रँगते? उसने कहा - कहो, तुम्हारे बाप की दाढ़ी रँग दें नील से। अब सुनिए, दो हिंदू बोरिया-बकचा सँभाले कहीं बाहर जाने के लिए घर से निकले। मियाँ शुबराती एक आँख दबा कर सामने जा खड़े हुए। वे समझे, सचमुच काना है। एक ने कहा - अबे, हट सामने से ओ बे काने! आपने वह आँख खोल दी। दूसरी दबा ली। दोनों आदमी इसे असगुन समझ कर अंदर चले गए। इतने में एक कानी औरत सामने से आई। मियाँ शुबराती ने देखते ही हाँक लगाई - 'एक लकड़िया बाँसे की, कानी आँख तमाशे की!'

ज्यों ही दोनों सराय में पहुँचे, हुसैनबख्श ने बढ़ कर बूढ़े मियाँ को सलाम किया। बड़े मियाँ बोले - जनाब, मियाँ आजाद से मेरी पुरानी मुलाकात है। मेरी लड़कियों के साथ वह मुद्दत तक खेला किए हैं। मेरी छोटी लड़की से उनके निकाह की भी तजवीज हुई थी; अगर अब तो वह एक बेगम से कौल हार चुके हैं। इसके बाद कुछ और बातें हुईं। शाम को हुसैनबख्श रुख्सत हुए और घर आ कर हुस्नआरा से कहा - वह तो आजाद के पुराने मुलाकाती हैं। शायद आजाद ने उनकी एक लड़की से निकाह करने का वादा भी किया है। यह सुनते ही हुस्नआरा का रंग फक हो गया। रात को हुस्नआरा ने सिपहआरा से कहा - कुछ सुना? उस बुड्ढे की एक लड़की के साथ आजाद का निकाह होने वाला है।

सिपहआरा - गलत बात है।

हुस्नआरा - क्यों?

सिपहआरा - क्यों क्या, आजाद ऐसे आदमी ही नहीं।

हुस्नआरा - दिल्लगी हो, जो कहीं आजाद उससे भी इकरार कर गए हों। चलो खैर-चार निकाह तो जायज भी हैं। लेकिन अल्लाह जानता है, यकीन नहीं आता। आजाद अगर ऐसे हरजाई होते तो जान हथेली पर ले कर रूम न जाते।

हुस्नआरा ने जबान से तो यह इतमीनान जाहिर किया, पर दिल से यह खयाल दूर न कर सकी कि मुमकिन है, आजाद ने वहाँ भी कौल हारा हो। एक तो उनकी तबीयत पहले ही से खराब थी, उस पर यह नई फिक्र पैदा हुई तो फिर बुखार आने लगा। दिल को लाख लाख समझातीं कि आजाद बात के धनी हैं, लेकिन यह खयाल दूर न होता। इधर एक नई मुसीबत यह आ गई कि उनके एक आशिक और पैदा हो गए। यह हजरत बहारबेगम के रिश्ते में भाई होते थे। नाम था मिर्जा अस्करी। अस्करी ने हुस्नआरा को लड़कपन में देखा था। एक दिन बहारबेगम से मिलने आए, और सुना कि हुस्नआरा बेगम आज-कल यहीं हैं, तो उन पर डोरे डालने लगे। बहारबेगम से बोले - अब तो हुस्नआरा सयानी हुई होंगी?

बहारबेगम - हाँ, खुदा के फजल से अब सयानी हें।

अस्करी - दोनो बहनों में हुस्नआरा गोरी हैं न?

बहारबेगम - ऐ, दोनों खासी गोरी-चिट्टी हैं; मगर हुस्नआरा जैसी हसीन हमने तो नहीं देखी। गुलाब के फूल जैसा मुखड़ा है।

अस्करी - तुम हमारी बहन कैसी हो?

बहारबेगम - इसके क्या मानें?

अस्करी - अब साफ-साफ क्या कहूँ, समझ जाओ। बहन हो, बड़ी हो, इतने ही काम आओ। फिर और नहीं तो क्या आकबत में बख्शाओगी?

बहारबेगम - अस्करी, खुदा जानता है, हमें दिल से तुम्हारी मुहब्बत है।

अस्करी - बरसों साथ-साथ खेले हैं।

बहारबेगम - अरे, यों क्यों नहीं कहते कि मैंने गोदियों में खिलाया है।

अस्करी - यह हम न मानेंगे। ऐसी आप कितनी बड़ी हैं मुझसे। बसर नहीं हद दो बरस।

बहारबेगम - ऐ लो, इस झूठ को देखो, छतें पुरानी हैं।

अस्करी - अच्छा, फिर कोई पंद्रह-बीस बरस की छुटाई बड़ाई है?

बहारबेगम - हई है?

अस्करी - अच्छा, अब फिर किस दिन काम आओगी?

बहारबेगम - भई, अगर हुस्नआरा मंजूर कर लें, तो है। मैं आज अम्माँजान से जिक करूँगी।

इतने में हुस्नआरा बेगम ने ऊपर से आवाज दी - ऐ बाजी, जरी हमको हरे-हरे मुलायम सिंघाड़े नहीं मँगा देतीं? मुहम्मद अस्करी ने रसूखियत जताने के लिए मामा से कहा - मेरे आदमी से जा कर कहो कि चार सेर ताजे सिंघाड़े तुड़वा कर ले आए। हुस्नआरा ने जो उनकी आवाज सुनी, तो सिपहआरा से पूछा - यह कौन आया है? सिपहआरा ने कहा - ऐ, वही तो हैं अस्करी! थोड़ी देर में मिर्जा अस्करी तो चले गए, और चलते वक्त बहारबेगम से कह गए कि हमने जो कहा है, उसका खयाल रहे। बहारबेगम ने कहा - देखो, अल्लाह चाहे तो आज के दूसरे ही महीने हुस्नआरा बेगम के साथ मँगनी हो। हुस्नआरा उसी वक्त नीचे आ रही थीं। यह बात उनके कान में पड़ गई। पाँव-तले से मिट्टी निकल गई। उलटे-पाँव लौट गईं और सिपहआरा से यह किस्सा कहा। उसे भी होश उड़ गए। कुछ देर तक दोनों बहनें सन्नाटे में पड़ी रहीं। फिर सिपहआरा ने दीवाने-हाफिज उठा लिया और फाल देखी, तो सिरे पर ही यह शेर निकला -

बैरों ई दाम मुर्गे दिगर नेह;

कि उनका रा बुलंद अस्त आशियाना।

(यह लाल दूसरी चिड़िया पर डाल। उनका का घोंसला बहुत ऊँचा है।)

सिपहआरा यह शेर पढ़ते ही उछल पड़ी। बोली - लो फतह है। बेड़ा पार हो गया। इतने में बहारबेगम आ पहुँचीं और हुस्नआरा से बोली - तुम लोगों ने मिर्जा अस्करी को तो देखा होगा? कितना खूबसूरत जवान है!

सिपहआरा - देखा क्यों नहीं, वही शौकीन से आदमी हैं न?

बहारबेगम - अबकी आएगा तो ओट में से दिखा दूँगी। बड़ा हँसमुख, मिलनसार आदमी है। जिस वक्त आता है, मकान भर महकने लगता है। मेरी बीमारी में बेचारा दिन भर में तीन-तीन फेरे करता था।

हुस्नआरा ये बातें सुन कर दिल ही दिल में सोचने लगी कि यह कह क्या रही हैं। कैसे अस्करी? यहाँ तो आजाद को दिल दे चुके। वह टर्की सिधारे, हम कौल हारे। इनको अस्करी की पड़ी है। बहार बेगम ने बड़ी देर तक अस्करी की तारीफ की; मगर हुस्नआरा कब पसीजनेवाली थीं। आखिर, बहार-बेगम खफा होकर चली गईं।

दूसरे दिन जब अस्करी फिर आए, तो बहारबेगम ने उनसे कहा - मैंने हुस्नआरा से तुम्हारा जिक्र तो किया, मगर वह बोली तक नहीं। उस मुए आजाद पर लट्टू हो रही हैं।

अस्करी - मैं एक तरकीब बताऊँ, एक काम करो। जब हुस्नआरा बेगम और तुम पास बैठी हो, तो आजाद का जिक्र जरूर छेड़ो। कहना, अस्करी अभी-अभी अखबार पढ़ता था, उसका एक दोस्त है आजाद, वह नानबाई का लड़का है। उसकी बड़ी तारीफ छपी है। कहता था, इस नानबाई के लौंडे की खुशकिस्मती को तो देखो, कहाँ जा कर शिप्पा लड़ाया है? जब वह कहें कि आजाद शरीफ आदमी हैं, तो कहना, अस्करी के पास आजाद के न जाने कितने खत पड़े हैं। वह कसम खाता है कि आजाद नानबाई का लड़का है, बहुत दिनों तक मेरे यहाँ हुक्के भरता रहा।

यह कह कर मिर्जा अस्करी तो विदा हुए, और बहारबेगम हुस्नआरा के पास पहुँचीं।

हुस्नआरा - कहाँ थी बहन? आओ, दरिया की सैर करें।

बहारबेगम - जरा अस्करी से बातें करने लगी थी। किसी अखबार में उनके एक दोस्त की बड़ी तारीफ छपी है। क्या जाने, क्या नाम बताया था? भला ही सा नाम है। हाँ, खूब याद आया, आजाद। मगर कहता था कि नानबाई का लड़का है।

हुस्नआरा - किसका?

बहारबेगम - नानबाई का लड़का बताता था। तुम्हारे आशिक साहब का भी तो यही नाम है। कहीं वही अस्करी के दोस्त न हों।

सिपहआरा - वाह, अच्छे आपके अस्करी हैं जो नानबाइयों के छोकरों से दोस्ती करते फिरते हैं।

बहार तो यह आग लगाकर चलती हुई, इधर हुस्नआरा के दिल में खलबली मची। सोचीं, आजाद के हाल से किसी को इत्तला तो है नहीं, शायद नानबाई ही हों। मगर यह शक्ल-सूरत, यह इल्म और कमाल, यह लियाकत और हिम्मत नानबाई में क्योंकर आ सकती है? नानबाई फिर नानबाई है। आजाद तो शाहजादे मालूम होते हैं। सिपहआरा ने कहा - बाजी, बहार बहन तो उधार खाए बैठी हैं कि अस्करी के साथ तुम्हारा निकाह हो। सारी कारस्तानी उसी की है। अस्करी के हथकंडों से अब बचे रहना। वह बड़ा नटखट मालूम होता है।

शाम को मामा ने एक खत ला कर हुस्नआरा को दिया। उन्होंने पूछा - किसका खत है?

मामा - पढ़ लीजिए।

सिपहआरा - क्या डाक पर आया है?

मामा - जी नहीं, कोई बाहर से दे गया है।

हुस्नआरा ने खत खोल कर पढ़ा। खत का मजमून यह था -

कदम रख देख कर उल्फत के दरिया में जरा ऐ दिल;

खतरा है डूब जाने का भी दरिया के नहाने में।

हुस्नआरा बेगम की खिदमत में आदाब। मैं जताए देता हूँ कि आजाद के फेर में न पड़िए। वह नीच कौम आपके काबिल नहीं। नानबाई का लड़का, तंदूर जलाने में ताक, आटा गूँधने में मश्शाक। वह और आपके लायक हो! अव्वल तो पाजी, दूसरे दिल का हरजाई, और फिर तुर्रा यह कि अनपढ़! बहार बहन मुझे खूब जानती हैं। मैं अच्छा हूँ या बुरा, इसका फैसला वही कर सकती हैं। आजाद मेरे दुश्मन नहीं, मैं उन्हें खूब जानता हूँ। इसी सबब से आपको सलाह देता हूँ कि आप उसका खयाल दिल से दूर कर दें। खुदा वह दिन न दिखाए कि आजाद से तुम्हारा निकाह हो।

तुम्हारा

- अस्करी

हुस्नआरा ने इस खत के जवाब में यह शेर लिखा -

न छेड़ ऐ निकहते बादे-बहारी, राह लग अपनी;

तुझे अठखेलियाँ सूझी हैं, हम बेजार बैठे हैं।

सिपहआरा ने कहा - क्यों बाजी, हम क्या कहते थे? देखा, वही बात हुई न? और झूठा तो इसी से साबित है कि मियाँ आजाद को अनपढ़ बताते हैं। खुदा की शान, यह और आजाद को अनपढ़ कहें! हम तो कहते ही थे कि यह बड़ा नटखट मालूम होता है।

हुस्नआरा ने यह पुर्जा मामा को दिया कि जा, बाहर दे आ। अस्करी ने यह खत पाया, तो जल उठे। दिल में कहा - अगर आजाद को नीचा न दिखाया, तो कुछ न किया। जा कर बड़ी बेगम से मिले और उनसे खूब नमक-मिर्च मिला-मिला कर बातें कीं। बहारबेगम ने भी हाँ-में-हाँ मिलयी और अस्करी की खूब तारीफें कीं। आजाद को जहाँ तक बदनाम करते बना, किया। यहाँ तक कि आखिर बड़ी बेगम भी अस्करी पर लट्टू हो गईं मगर हुस्नआरा और सिपहआरा अस्करी का नाम सुनते ही जल उठती थीं। दोनों आजाद को याद कर-करके रोया करतीं और बहारबेगम बार-बार अस्करी का जिक्र करके उन्हें दिक किया करतीं। यहाँ तक कि एक दिन बड़ी बेगम के सामने सिपहआरा और बहारबेगम में एक झौड़ हो गई। बहार कहती थीं कि हुस्नआरा की शादी मिर्जा अस्करी से होगी, और जरूर होगी। सिपहआरा कहती थीं - यह मुमकिन नहीं।

एक दिन बड़ी बेगम ने हुस्नआरा को बुला भेजा, लेकिन जब हुस्नआरा गईं, तो मुँह फेर लिया। बहारबेगम भी वहीं बैठी थीं। बोलीं - अम्माँजान तुमसे बहुत नाराज हैं हुस्नआरा!

बेगम - मेरा नाम न लो।

बहारबेगम - जी नहीं, आप खफा न हों। मजाल है, आपका हुक्म न मानें।

बेगम - सुना हुआ है सब।

बहारबेगम - हुस्नआरा, अम्माँजान के पास आओ।

हुस्नआरा परेशान कि अब क्या करूँ। डरते-डरते बड़ी बेगम के पास जा बैठीं। बड़ी बेगम ने उनकी तरफ देखा तक नहीं।

बहारबेगम - अम्माँजान, यह आपके पास आई हुई हैं, इनका कसूर माफ कीजिए।

बेगम - जब यह मेरे कहने में नहीं हैं, तो मुझसे क्या वास्ता? अस्करी सा लड़का मशाल ले कर भी ढूँढ़े, तो न पाए। मगर इन्हें अपनी ही जिद है।

बहारबेगम - हुस्नआरा, खूब सोच कर इसका जवाब दो।

बेगम - मैं जवान-सवाब कुछ नहीं माँगती।

बहारबेगम - आप देख लीजिएगा, हुस्नआरा आपका कहना मान लेंगी।

बेगम - बस, देख लिया।!

बहारबेगम - अम्माँजान, ऐसी बातें न कहिए।

बेगम - दिल जलता है बहार, दिल जलता है।! अपने दिल में क्या-क्या सोचते थे, मगर अब उठ ही जायँ यहाँ से, तो अच्छा।

यह कह कर बड़ी बेगम उठ कर चली गईं हुस्नआरा भी ऊपर चली गई और लेट कर रोने लगीं। थोड़ी देर में बहार ने आ कर कहा - हुस्नआरा, जरी पर्दे ही में रहना, अस्करी आते हैं। हुस्नआरा ने अस्करी का नाम सुना, तो काँप उठीं। इतने में अस्करी आ कर, बरामदे में खड़े हो गए।

बहारबेगम - बैठो अस्करी।

अस्करी - जी हाँ, बैठा हूँ। खूब हवादार मकान है। इस कमरे में तुम रहती हो न?

बहारबेगम - नहीं, इसमें हमारी बहनें रहती हैं।

अस्करी - अब हुस्नआरा की तबीयत कैसी है?

बहारबेगम - पूछ लो, बैठी तो हैं।

अस्करी - नहीं, बताओ तो आखिर?

बहारबेगम - तुम भी तो हकीम हो? भला पर्दे के पास से नब्ज तो देखो?

हुस्नआरा मुसकिराईं। सिपहआरा ने कहा - ऐ, हटो भी! बड़े आए वहाँ से हकीम!

बहारबेगम - तुम तो हवा से लड़ती हो।

सिपहआरा - लड़ती ही हैं!

अस्करी - इस वक्त खाना खा चुकी होंगी। शाम को नब्ज देख लूँगा।

बहारबेगम - ऐ, अभी खाना कहाँ खाया?

सिपहआरा - हाँ-हाँ खा चुकी हैं।

मिर्जा अस्करी तो रुख्सत हुए, मगर बहारबेगम को सब्र कहाँ? पूछा - हुस्नआरा, अब बोलो, क्या कहती हो?सिपहआरा तिनक कर बोली - अब कोई और बात भी है, या रात-दिन यही जिक्र है? कह दिया एक दफा कि जिस बात से यह चिढ़ती हैं, वह क्यों करो।

बहारबेगम - होना वही है, जो हम चाहती हैं।

हुस्नआरा - खैर, बहन, हो होना है, हो रहेगा। उसका जिक्र ही क्या?

सिपहआरा - बहार बहन, नाहक बैठे-बिठाए रंज बढ़ाती हो।

बहारबेगम - याद रखना, अम्माँजान अभी-अभी कसम खा चुकी हैं कि वह तुम दोनो की सूरत न देखेंगी। बस, तुम्हें अब अख्तियार है, चाहे मानो, चाहे न मानो।

कई दिन इसी तरह गुजर गए। हुस्नआरा जब बड़ी बेगम के सामने जातीं, तो वह मुँह फेर लेतीं। दोनों बहनें रात-दिन रोया करतीं। सोचीं कि यह तो सब के सब हमारे खिलाफ हैं, आओ, रूहअफजा को बुलाएँ, शायद वह हमारा साथ दें। मामा ने कहा - मैं अभी-अभी जाती हूँ। जहाँ तक बन पड़ेगा, बहुत कहूँगी। और, कहना क्या है, ले ही आऊँगी।

इतने में बहारबेगम ने आ कर कहा - ऐ हुस्नआरा, जरी पर्दा करके अस्करी को नब्ज दिखा दो। जीने पर खड़े हैं। हुस्नआरा मजबूर हो गई। सिपहआरा को इशारे से बुलाया और कहा - बहार बहन तो बाहर ही बैठेंगी। मेरे बदले तुम नब्ज दिखा दो। सिपहआरा ने मुसकिरा कर कहा - अच्छा, और पर्दे के पास बैठ कर नब्ज दिखाया।

अस्करी - दूसरा हाथ लाइए।

बहारबेगम - बुखार तो नहीं है?

अस्करी - थोड़ा सा बुखार तो जरूर है। कमजोरी बहुत है।

जब अस्करी चले गए, तो हुस्नआरा ने बहारबेगम से कहा - आपके अस्करी तो बड़े होशियार हैं!

बहारबेगम - क्या शक भी है?

हुस्नाआरा - उफ, मारे हँसी के बुरा हाल है। वाह रे हकीम!

सिपहआरा - 'नीम हकीम, खतरे जान।'

बहारबेगम - यह काहे से?

हुस्नआरा - नब्ज किसकी देखी थी?

बहारबेगम - तुम्हारी।

हुस्नआरा - अरे वाह, कहीं देखी हो न? बस, देख ली हिकमत।

बहारबेगम - फिर किसी नब्ज देखी? क्या सिपहआरा बैठ गई थीं?

सिपहआरा - और नहीं तो क्या? कमजोरी बताते थे। कमजोरी हमारे दुश्मनों को हो!

बहारबेगम - भला इलाज में क्या हँसी करनी थी?

बाहर जा कर बहार ने अस्करी को खूब आड़े-हाथों लिया - ऐ बस, जाओ भी, मुफ्त में हमको बद बनाया! हुस्नआरा ने हँसी-हँसी में सिपहआरा को अपनी जगह बिठा दिया, और तुम जरा न पहचान सके। खुदा जानता है, मुझे बहुत शरम आई।

शाम को रूहअफजा बेगम आ पहुँचीं और बड़ी बेगम के पास जा कर सलाम किया।

बड़ी बेगम - तुम कब आईं?

रूहअफजा - अभी-अभी चली आती हूँ। हुस्नआरा कहाँ हैं?

बहारबेगम - हमें उनका हाल मालूम नहीं। कोठे पर हैं।

रूहअफजा - जरी, बुलवाइए!

बहारबेगम - दोनो बहनें हमसे खफा हैं।

रूहअफजा कोठे पर गई, तो दोनों बहनें उनसे गले मिल कर खूब रोईं।

रूहअफजा - यह तुमको क्या हो गया हुस्नआरा? वह सूरत ही नहीं। माजरा क्या है?

सिपहआरा - अब तो आप आई हैं; सब कुछ मालूम हो जायगा। सारा घर हमसे फिरंट हो रहा है। हमें तो खाना-पीना उठना-बैठना सब हराम है!

बहारबेगम को यह सब्र कैसे होता कि रूहअफजा आएँ और दोनो बहनें इनसे अपना दुखड़ा रोएँ। आ कर धीरे से बैठ गईं।

रूहअफजा - बहन, यह क्या बात है! आखिर किस बात पर यह रंजारंजी हो रही हैं?

बहारबेगम - मैं तुमसे पूछती हूँ, अस्करी में क्या बुराई है? शरीफ नहीं है वह, या पढ़ा-लिखा नहीं है, या अच्छे खानदान का नहीं है? आखिर इनके इनकार का सबब क्या है?

सिपहआरा - हमने एक दफे कह दिया कि हम अस्करी का नाम नहीं सुनना चाहते।

रूहअफजा - तो यह कहो, बात बहुत बढ़ गई है। मुझे जरा भी कुछ हाल मालूम होता, तो फौरन ही आ जाती।

बहारबेगम - अब आई हो, तो क्या बना लोगी? यह एक न मानेंगी।

रूहअफजा - वह तो शायद मान भी जायँ, मगर आपका मान जाना अलबत्ता मुश्किल है।

बहारबेगम - यह कहिए, आप इनकी तरफ से लड़ने आई हैं?

रूहअफजा - हाँ, हमसे तो यह नहीं देखा जाता कि खाहमख्वाह झगड़ा हो।

ये बातें हो रही थीं कि बड़ी बेगम साहब भी लठियाँ टेकती हुई आईं।

रूहअफजा - आइए अम्माँजान, बैठिए।

बेगम - मैं बैठने नहीं आई, यह कहने आई हूँ कि अस्करी के साथ हुस्नआरा का निकाह जरूर होगा। इसमें सारी दुनिया एक तरफ हो, मैं किसी की न सुनूँगी। मैं जान दे दूँगी। यह न मानेंगी, तो जहर खा लूँगी; मगर करूँगी यहीं, जो कह रही हूँ।

बड़ी बेगम यह कह कर चली गईं। हुस्नआरा इतना रोईं कि आँखें लाल हो गईं। रूहअफजा ने समझाया, तो बोलीं बहन, अम्माँजान मानेंगी नहीं, और हम सिवा आजाद के और किसी के साथ शादी न करेंगे? नतीजा यह होना है कि हमीं न होंगे।


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