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कविता

कौए की काँव
प्रमोद कुमार तिवारी


काँव... काँव... काँव...
कौए की काँव
आँगन में रखी
दूध-भात की कटोरी
नीम की डाल पर बैठा
गिरिधर पंडित की झिड़की
और शोभा काकी की आशीष
सुनता, चोंच खुजलाता, सिर हिलाता
घुप्प काला कौआ

अपनी मुंडेर पर
बिठाने की जिद में
कौए को
सब जगह से उड़ाते बच्चे

काँव... काँव... काँव...
अपने हिस्से का प्रसाद खिलाया
शोख रमवतिया ने
चुपके से
रंगे हाथ पकड़ी गईं
रामदई काकी
सोना से चोंच मढ़वाने की रिश्वत देते

काँव... काँव... काँव...
काँव छा गई चमक बन कर
पाँच साल से नइहर की राह देखती
अन्नू की भाभी के चेहरे पर
काँव समा गई
मजबूती बन कर
कुबड़ी दादी की लाठी में
काँव के दम पर झिड़क दिया
बुधिया चाची ने
द्वार आए साहूकार को
परंतु गहरा गया
मेजर चाचा के बाबूजी की
आँखों का सूनापन

काँव... काँव... काँव...
कौए की काँव
काँव नहीं डोर
जिससे बँधे थे
पंद्रह साल से बेटे की राह देखती
मलती दादी के प्रान
काँव नहीं धुन
जो नचाती थी दिलों को
और रोप देती थी
आँखों में सपना
सपना
जिसमें 'देह की महक' से
'नए बैल की घंटी की गूँज' तक
समाई होती थी
जिसमें
'छोनू की लेलगाली'
मोनी की गुड़िया
और माला की लाल गोटेदार साड़ी
चमकती थी।

काँव... काँव... काँव...
काँव नहीं 'खिड़की'
जिसमें से दिखता था
चुन्नू को शहर का स्कूल
रामरती को पछांही गाय
और गोपी काका को
बिटिया का पीला हाथ।
काँव में धड़कती थी
एक पूरी की पूरी दुनिया
जो सरकती जा रही थी
मेरे बौद्धिक हाथों से।

 


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