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कविता

क्या तो अर्थ
प्रमोद कुमार तिवारी


जानते हो! तुम्हारी तेजवाली धड़कन
कई बार सुनी है मैंने
अपने सीने में
उस बियाबान में जहाँ परिंदे तक नहीं दिखते
धप्प से आकर
मूँद लेते हो तुम मेरी आँखें
जाने कितनी बार देखा है
लार्ड्स पर छक्का जड़ने के बाद
तुम्हें उछलकर तालियाँ बजाते
और कनखियों से गुस्सा जताते।
बंद कमरे में, पीठ पर महसूसी है
तुम्हारी नजरों की आँच
जब खीझ रहा होता हूँ
आइंस्टीन के सूत्रों से।
उस शाम कित्ता मजा आया
जब उस नकचढ़े टोनी की हीरो होंडा को
पछाड़ दिया तुम्हारी बुलेट ने।
और मनाली की पिकनिकवाले दिन
वो तो तुमने मना कर दिया
वरना मैंने धुन डाला था
सलमान खान को
कमबख्त कैसे घूर रहा था तुम्हें

क्या कहा अर्थ!
कि साइकिल चलाना भी नहीं जानते
कि कभी स्टेडियम नहीं गए
छोड़ो ना,
अर्थ ही में कौन सा बड़ा अर्थ होता है।

 


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