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कविता

गाली-1
प्रमोद कुमार तिवारी


'कमेसरा की दादी' काँपती आवाज में
दे रही थीं गाली
ब्रह्मा, विष्णु, महेश को
उनकी झुर्रियों में अटके थे
शर्मीलेपन के ढेर सारे कण।
कि नटवर नारायण तो हमेशा के चालू ठहरे
वे कहाँ पकड़ में आनेवाले
और ब्रह्मा की बुढ़ौती का खयाल तो करना ही पड़ेगा
बहुत होगा तो उनकी सन जैसे दाढ़ी में
पोत दिया जाएगा अलकतरा।
परंतु हर बार पकड़ा जाते बेचारे बमभोला
अड़भंगी, नसेड़ी, शंभु की खूब होती मलामत
कि साँप-बिच्छू वाले बौड़म के हाथ में
पड़ गई बेचारी भोली 'गउरा'।

खेतों-खलिहानों तक फैलते जा रहे थे
गालियों के सुर
जाने क्या जादू था गाली में
कि सासू की मार भूल गई फुलमतिया
नए पाहुन को गरियाने का आमंत्रण पा कर।
और रसिक राजा दशरथ से मोछमुंडा देवर तक
सरपट दौड़ने लगे गालियों के सुर

गनेस की औरत तो इतना डूब के जोड़ रही थी
रिश्तेदारों के नए संबंध
कि बेमानी हो गई थी
आँचल पकड़ कर रोते बच्चे की आवाज
इंडिया गेट जैसे पेट वाले भसुरजी ने
गवनिहारिनों को दिए दो कड़कड़ सौटकिया नोट

चउठारी आए बुढ़ऊ को गाली के बिना
फीका लग रहा था खाना
शाप दे रहे थे गाँववालों के संस्कार को।
बी.एच.यू. के बिरला छात्रावास के पुराने छात्र ने
थाली पीट-पीट नाचते हुए, फागुन की एक रात में
लैंगिक संबंधों पर किया शोधकार्य
सुबह गले पर चूना थोप कर निकला
डी.लिट. की डिग्री की तरह।
मंत्रीजी चेला को बता रहे थे
कुछ भाव गिर गया है इस साल
अस्सी की होली में कमबख्तों ने
नहीं लिया मेरा नाम।
बहुत दिनों से मुँह फुलाए आलमगीर भाई को
कबीरा के बहाने इतना गरियाया गिरिधर पंडित ने
कि 'ससुरा सठिया गया है' कहते हुए
उनको गले लगाना ही पड़ा।
जी भर पाहुनों को गरिया लेने के बाद भी
बहुत कुछ बचा रह गया था
जिसे आँचल की खूँट में बाँध कर
घर ले गई रधिया
और जिसे कई दिनों तक चभुलाते रहे
पोपले मुँहवाले अजिया ससुर

पर मुई! जाने कैसी गाली थी उस बच्चे की
कि धू-धू जलने लगा पूरा शहर
जिसे बुझा रहे हैं लोग
एक दूसरे के खून से।

 


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