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कविता

गाली-2
प्रमोद कुमार तिवारी


एक अजीब शस्त्र था
जिसे लोग फेंक रहे थे एक-दूसरे पर
पर जाने कैसा जादू था
कि वे सारे जाकर लगते
उनके घरों की महिलाओं को
बाघमल फेंकता सामने अट्टहास कर रहे
वज्रांग शेरप्रसाद पर
जो जाकर लगती उसकी निरीह माँ को
दाँत किटकिटाकर फेंकता एक वीर्यवान गोला
आतंककारी इकराम पर
पर जाने कहाँ से आ जाती बीच में
नेहभरी आँखोंवाली उसकी मासूम बहन
इस परम जादू को गढ़ा था हमारे पूर्वजों ने
अंतरराष्ट्रीयता था यह जादू
सारे पुरुषों ने दिखाई थी अभूतपूर्व एकता
भाषा और भूगोल की सीमा से परे
इनके ज्यादातर शस्त्र
कर रहे थे उस संरचना पर वार
जिन पर टिका था हमारा अस्तित्व।
क्या रहा होगा उस व्यक्ति के मन में
जिसने पहली बार चढ़ाया होगा सूली पर
नवजीवन देनेवाले इन अंगों को।
सर्जक अंगों की इस ऐतिहासिक अवमानना पर
क्यों नहीं खौला चैतन्यों का खून
किसी नामलेवा के निर्माण में
तिल-तिल खुद को खपाती
हर माह 'उन दिनों' का साँसत भोगती
माँ की बेचैनी का विचार क्यों नहीं आया
उस पूर्वज के मन में।
सदियों पुराने इन शस्त्रों की
भरपूर मौजूदगी पर
क्यों नहीं आती हमें
शर्म।


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