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कविता

विश्वविद्यालय में सौंदर्यीकरण
प्रमोद कुमार तिवारी


अरे! ये पत्ती यहाँ कैसे उग गई
और ये डाल टेढ़ी क्यों है?
पौधों को बिलकुल शऊर नहीं होता
ठीक वहीं फेंक देंगे कनखी
जहाँ होनी चाहिए कायदे से खाली जगह
जहाँ होनी चाहिए शाखा
वहाँ बस गूमड़ बन के रह जाएगा।
बताइए भला अब इस नीरस अमलतास का यहाँ क्या काम
यहाँ तो टॉर्च लिली ही फबेगी
इस पेड़ को चार फीट से ज्यादा नहीं होना चाहिए
और इस लतर का तो समूल नाश करो
बार-बार काटने पर भी
वी.सी. के रास्ते तक फैली मिलती है
नहीं-नहीं यह कँटीला पौधा मेडिसीनल है तो क्या हुआ
मिसफिट है ए-क्लास यूनिवर्सिटी के लिहाज से।
ओह ये चट्टान रास्ते की चिकनाई में रोड़ा क्यों
जरा घिसिए या फिर उखाड़िए इसे
डिफ्रेंट आइडेंटिटी क्या होती है भला
चीजें सिमेट्री में ही अच्छी लगती हैं
इस पेड़ को भी हटाइए
इसकी शाखा हाकिन्स की थ्योरी की ओर पहुँचते-पहुँचते
दादी के अनुभवों की बात करने लगती है
अचानक खड़ी सी ये चट्टान चुनौती देती है
इस पर सीढ़ियाँ बना दो।
इस जंगली पौधे को भी हटा दो
अनुशासन से बिलकुल अपरिचित है यह
विषय के अतिक्रमण की जैसे कसम खाई हो इसने।
उस भटकटैए को तो बिलकुल तमीज नहीं
बस चले तो पूरी यूनिवर्सिटी को लोकसंस्कृति का अड्डा बना दे
उसे तो यह भी नहीं मालूम
कि ठहाके जाहिल लगाते हैं
अरे! बस इतना मुस्कराइए कि दाँत न दिखें
सवाल वर्ल्डक्लास यूनिवर्सिटी का है
कोई हँसी-ठट्ठा है क्या?


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