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कविता

महानगर में पुरबिए
प्रमोद कुमार तिवारी


वे रोप रहे हैं पाँव, सपने और व्यवसाय
उन महानगरों में
जो चाहता है सिर्फ उनका जाँगर
एक अजीब सी बेचारगी और हेकड़ी के साथ
पसीने के प्यासे महानगर में
दुगुने पसीने में लपेट के जमा रहे हैं निगाह
किसी अनजान-से ठीहे पर
जहाँ टिका सकें अपने गाँव के सपनों को।
कि गोबरउरा के जनम की तरह
चाहे जैसे पर मिले मुक्ति
सदियों पुराने नरक से।
ठसक और निरीहता का अद्भुत मिश्रण है उनमें
कि हम जहाँ रहे हैं
तनी रही हैं मूँछें
कि सात समुंदर तक को नाप कर
सोना उगा देनेवाला जोर है
हमारी बाजुओं में
पेट की बेचारगी
और लाठी की चमक को लिए-लिए
बाढ़, अकाल और परिवार के बोझ को
महानगरों की खूँटी पर टाँग रहे हैं पुरबिए।
घनघोर इर्ष्या और अपूर्व आत्मीयता को
काँखों में दबाए
किसी चोरबगली में जाति को छिपाए
महानगरों को सँवार रहे हैं पुरबिए
खर-पतवारों की तरह
एक तरफ से उन्हें हटाता जा रहा है महानगर
पर जलकुंभी की तरह
नगर को आगोश में लेते जा रहे हैं पुरबिए
सुविधाओं के प्यासे महानगरों की ओर जाती पटरियों पर
चिटियों की फौज की तरह चढ़े आ रहे हैं पुरबिए
अजीब दुविधा में घिरे हैं पुरबिए
कि चाय की दुकान
और सेठ की दरबानी के बीच
मूँछ के नुकीलेपन को कहाँ रखें?


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