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कविता

भगवानजी! कंघी रखते हो?
प्रमोद कुमार तिवारी


मेरे प्यारे भगवानजी!
कई दिनों से घुमड़ रहे हैं
मन में कुछ सवाल
मसलन कंघी रखते हो
अगर हाँ तो किस चीज की
सोने की, हीरे की, पीतल की
या हम सब की तरह प्लास्टिक की
दाढ़ी-मूँछ का मामला कैसा है?
ज्यादातर तो सफाचट ही नजर आते हो
वैसे बहुत इच्छा है
आपके हज्जाम से मिलने की
आखिर इतनी सफाई से कैसे बनाता है तुम्हारी दाढ़ी
बिलकुल न उगे जैसा।
खिजाब या नेचुरल गार्नियर जैसे विकल्प भी
होते हैं क्या तुम्हारे हजाम के पास।
वैसे एक इच्छा और है मन में
जो नहीं चाहता था तुम्हे बताना
पर सोचा तुम्हारे अंतर्यामीपन को
खामखा क्यों दूँ चुनौती
दरअसल सोचता हूँ
सारी गुप्त सूचनाएँ ले लूँ तुम्हारे हजाम से
जैसे होम अफेयर कैसा है तुम्हारा
कहाँ-कहाँ चलती है उनकी
नौकरानी को वे भी गरियाती हैं क्या
आभूषणों के विज्ञापनों पर
कैसी होती है उनकी प्रतिक्रिया
किचेन और संडास के हालात कैसे हैं
नाली जाम हो जाने पर
क्या करते हो तुम
अरे याद आया! मच्छरदानी लगाते हो
या मच्छरराज से है कोई साँठ-गाँठ
कभी-कभार चाय-वाय भी पीते हो या
केवल सोमरस से ही...
तुम्हारे तकिए के नीचे
अप्सरा केंद्रित कोई हॉट मैगजिन छुपी होती है क्या?
बहुत सारे सवाल हैं मन में
सारे के सारे पूछ लूँ तुम्हारे हज्जाम से
साथ ही यह भी कि
कौन-कौन सी किताबें हैं तुम्हारे सेल्फ में
और बंदा
एक दो किताबें उड़ा सकता है क्या?

 


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