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कविता

सपनों का राजकुमार
प्रमोद कुमार तिवारी


आता था सफेद घोड़े पर सवार
मेरा राजकुमार
चाँद से भी तेज घोड़ा दौड़ाते
सन्न से निकल जाते हम
बादलों के पार।
माँ की डाँट अक्सर
रेशमी बादलों से उठाकर
डाल देती, चूल्हे के सामने
हम इंद्रधनुष पर बैठे
उड़ा रहे होते बादलों के गुब्बारे
कि अपनी टाई के लिए चीखता भाई
पटक देता जमीन पर।
आखिर मिला वह राजकुमार
पर कब सपनों में दीमक लग गए
कहाँ बिला गया इंद्रधनुष
कुछ पता न चला
जब आँख खुली
रेशमी बादलों की जगह
तपती रेत थी
और था वह
एकदम अनचिन्हा।

बहुत प्यार जताता वह
मैं
उसके सपनों की रानी
ख्वाबों की मल्लिका
उसकी जिंदगी, नींद, चैन
और जाने क्या-क्या
पर बस कुछ क्षणों के लिए
और उस क्षण
खुद को कोठे पर पाती हूँ
प्यार टटोल रहे उसके उद्धत बाजू
कुचल डालते हैं मेरे पूरे वजूद को
केंचुए की तरह रेंगती हैं
शरीर पर उसकी उँगलियाँ
जब भी वह आता है
मेरा माथा टकरा जाता है
किसी छुपे स्वाभिमान से
और उभर आता है
अपमान का एक बड़ा सा गूमड़।
कुचले होठों और नाखून के खरोचों में
मैं भी तलाशती हूँ प्यार
जो बन जाता है आतंक
हर बार।
मेरे पिता की दी कार पर
आते हैं उसके दोस्तये बताने
कि 'बकारडी' पर भारी पड़ती हैं मेरी आँखें
कि फुर्सत में बनाया है मुझे ब्रह्मा ने
हजारों साल पुरानी माँ
बार-बार कहती है
ऐसा होता है, सब ठीक हो जाएगा
मैं भी नए सिरे से उठाती हूँ
अपने कुचले वजूद को
हर शाम देखती हूँ राह
अपने सपनों के मीता का
हर सुबह पाती हूँ
उसकी लाश।

 


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