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कहानी

बहादुर

अमरकांत


मैं उनका ही होता, जिनसे
            मैंने रूप-भाव पाए हैं।
वे मेरे ही हिये बँधे हैं
            जो मर्यादाएँ लाए हैं।

मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
            मेरे पैर और पथ मेरा,
            मेरे अंत और अथ मेरा,
                       ऐसे किंतु चाव उनके हैं।

मैं ऊँचा होता चलता हूँ
            उनके ओछेपन से गिर-गिर
            उनके छिछलेपन से खुद-खुद
                        मैं गहरा होता चलता हूँ

 


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