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निबंध

संपादकाचार्य सुब्रह्मण्यम् अय्यर
गणेशशंकर विद्यार्थी


देश से सर्वश्रेष्‍ठ पत्र-संपादक उठ गया! ये संपादकाचार्य थे मद्रास के मि.सुब्रह्मण्‍यम् अय्यर। देश-भर में उनसा चतुर, योग्‍य और कुशाग्र बुद्धि का कोई पत्र-संपादक नहीं था। 23 वर्ष की अवस्‍था में उन्‍होंने 'हिंदू' पत्र को साप्‍ताहिक रूप में निकाला। वह ऐसे उत्‍तम ढंग से निकाला कि कुछ ही दिनों में श्रेष्‍ठ पत्रों में गिना जाने लगा। शीघ्र ही 'हिंदू' सप्‍ताह में तीन बार निकलने लगा और 1889 में वह दैनिक हो गया। अय्यर महोदय की विद्वत्‍ता की सिक्‍का देश भर पर जम गया। मि.ह्मूम उनके लेखों को लंदन के 'टाइम्‍स' के अच्‍छे लेखों की टक्‍कर का कहते थे। मेहता साहब उनकी लियाकत की दाद देते थे। मि.गोखले उनकी विलक्षण बुद्धि के कायम थे और मालवीय जी उन्हें राजनीति में गुरु-तुल्‍य मानते थे। विद्धता के अतिरिक्‍त वे कुछ विशेष गुणों के आदमी थे - अत्‍यंत दृढ़ और कष्ट-विरोध से तनिक भी न डरने वाले इसी कारण स्‍वदेशी के गरम दिनों में वे शासकों के कोपभागी भी बन गये थे। 1898 में उनके जीवन में एक बड़ा भारी परिवर्तन हुआ जिससे पता लगता है कि इस महापुरुष में अपने को स्थिति के अनुसार बनाने की कैसी बढ़ी-चढ़ी शक्ति थी। उस साल कुछ कारणों से आपने 'हिंदू' से नाता तोड़ लिया और इसकी बजाय कि वे अंग्रेजी में, जिसके लिखने में वे सिद्धहस्‍त थे, कोई पत्र निकालते, उन्‍होंने देशी भाषा तमिल में पत्र निकाला और वह भी दैनिक और कुछ ही वर्षों में यह देशी दैनिक 'स्‍वदेश मित्रम्' ऐसी जबरर्दस्‍त शक्ति बन गया कि आज मद्रास प्रांत के निरंकुश लोग उसकी तीव्र आलोचना से थर-थर काँपते हैं। जैसे गवेषणापूर्ण लेख - 'हिंदू' में निकलते थे, बढ़े हुए हाथ की कलम ने वैसे ही लेख 'मित्रम्' में भी लिखे और यह न केवल इस ख्याल से कि अय्यर महोदय को कुछ न कुछ तो करना ही था, परंतु इस उत्‍साहवर्धक विचार के अनुसार भी कि अब समय आ गया है कि देशी भाषा के जानकर लोग संसार की गति से उसी प्रकार परिचित हों जिस प्रकार कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग हो सकते हैं और नि:संदेह इस काम में सफलता का मुकुट यदि पहले-पहल इस देश में किसी के सिर पर रखा जायेगा तो वह सिर अय्यर महोदय का ही है। ऐसे महापुरुष की मृत्‍यु पर हमें हार्दिक दु:ख है। उनकी मृत्‍यु देश की भारी क्षति है, परंतु यह उनके लिए कोई कष्‍ट की बात न थी क्‍योंकि आज वे वर्षों से शारीरिक व्‍यथा से अत्‍यंत पीड़ित थे। हमारी प्रार्थना है कि उनकी आत्‍मा शांति पावे और देश में उनके-से कर्मवीरों की अधिकता हो।


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हिंदी समय में गणेशशंकर विद्यार्थी की रचनाएँ