hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कहानी

एक चिड़िया एक पिंजरा और कहानी
विमलेश त्रिपाठी


एक चिड़िया एक पिंजरा और कहानी जैसा कुछ
अर्थात्मैं
एक लड़की को जानता था
जो नहीं रहते अकेले जान ही नहीं सकते कभी
कि कैसे खामोशी से पैदा होता है डर,
कैसे बातें करता है कोई खुद से
और भागता फिरता है आइनों के बीच
एक जिंदा शक्स की तलाश में
समझ ही नहीं सकते वे सचमुच।
                                   - ओरहान वेली

पूर्वकथन अर्थात एक भूमिका जो जरूरी नहीं थी

 

पता नहीं आप इसे किस तरह लें, लेकिन सच मानिए बेहद संकोच के साथ ही यहाँ कुछ बातें कह देना मुझे बेहद जरूरी लगा।

सही मायने में इस कहानी को बिल्कुल इस तरह शुरू नहीं होना था। इसे भी वैसे ही शुरू होना था जैसे कि अक्सर कहानियाँ शुरू होती हैं। मसलन कह लीजिए कि कुछ ऐसी शुरुआत कि एक जमाने पहले मैं एक लड़की को जानता था। मैं नहीं जानता कि आप इस पर विश्वास करेंगे या नहीं कि अक्सर लोग किसी और की स्मृति अपने जेहन में सजाकर भले न रखें, कोई एक तो होती ही है जो समय के सरपट भाग जाने के बाद भी अपने निशान छोड़ जाती है। मसलन कोई एक खत, या कोई एक शक्ल आपकी हिंदी की नोट बुक में बनी हुई आपको ही समर्पित और कि इसके नीचे एक कोड भाषा में लिखा हुआ आपका नाम और इसके आगे का लिखा किसी दैवीय अक्षर में जिसे दूसरे किसी के लिए पढ़ पाना किसी भी कोण से नामुमकिन। ...लेकिन सब कुछ के तयशुदा होने के बावजूद मैं ऐसा नहीं कर सका, मतलब लिख न सका।

अव्वल तो इस कहानी का लिखा जाना भी नहीं था, क्योंकि एक वादा जो एक ऐसे वक्त में किया गया था जिस वक्त की यादें बाद के दिनों में बचकानी लगने लगती हैं और उनकी स्मृतियाँ हमें गुदगुदाकर या कुछ हद तक मुँह चिढ़ाकर चली जाती हैं और जो रह जाता है वो यह अहसास कि कितने बच्चे थे हम, कितने मासूम। हम वही थे जिसके लिए वादा या कसमों के लिए मर जाने तक की तड़प और ऊर्जा सच की तरह सच होती थी।

उससे किए गए वादे को निभाने के लिए ही तो इतनी बातें।

तो लिखा जाना तय नहीं था और अब भी नहीं लिखी जा सकेगी यह कहानी। हाँ, अगर आपको कुछ जानने की उत्सुकता है तो आप हो लें मेरे साथ, मैं आपको रोकूँगा नहीं।

एक पाठ-यात्रा में मौसम की सबसे घनघोर बारिश अर्थात आतमपुर कहाँ है

 

मुझे बैठ भर पाने की भी जगह नहीं मिली है। इस ट्रेन की कसैली गंध के बीच मैं टॉयलेट के पास एक पुराना अखबार बिछाकर बैठा हूँ। बहुत देर तक चुक्कीमुक्की बैठे रहने से कमर और घुटने के दर्द ने मुझे थोड़ा पसर जाने के लिए बाध्य किया है - मेरा सिर घुटने में दबा है। मैं यात्रा पर हूँ लेकिन इसे ठीक-ठीक यात्रा कहना शायद सही नहीं होगा। बिना सोचे-समझे अगर हम किसी ट्रेन पर सवार हो जाएँ - इस निर्णय से विलग कि जाना कहाँ है - तो इसे यात्रा कहेंगे क्या? लेकिन सबको कहीं न कहीं जाना तो जरूर होता है।

तो मुझे यही कहना चाहिए कि मैं सवार हूँ कहीं जाने को - क्या इसे सिर्फ ट्रेन की सवारी मान लूँ? लेकिन यह मन जो बार-बार किसी पागल की तरह उसी दरवाजे पर चला जाता है, मन की यह यात्रा? मन की तंतुएँ भी अनिमेष आवाजाही कर रही हैं - चाह कर भी जिन्हें नाथ नहीं पाता। कुछ भी सिलसिलेवार नहीं - भटक गए किसी कथाकार के तिलस्मी प्लॉट की तरह... कि वह लिखता है और लिख लेने के गरूर के बगैर ही लिखता है। क्या इसे एक वजह माना जा सकता है कि मुझे नहीं पता कि जाना कहाँ है, कहाँ पहुँचना? कितने नादान हैं हम कि पूरी उम्र कहीं भी पहुँच न पाने तक की यात्रा करते हैं और अंत में यह अनुभव कि हम एक वृत्त की परिधियों के चक्कर लगा रहे थे। आप सावधान रहें। आप जो यूँ ही बेमन से मेरे चलने या मन की इस आवा जाही में शामिल हो जाएँगे - आपको पूरी आजादी है कि आप एक सही और सुरक्षित जगह या किसी अभीष्ठ जगह मेरा साथ छोड़ दें... रुक जाएँ... आपके उपर बंदिश रही है कभी किसी की? आप चाहें तो किसी को पढ़ें, चाहे तो नहीं... कोई कह रहा हो उसका कहा हर बार सुना ही जाय, ये जरूरी तो नही...।

लेकिन मैं ??

कैसा तो लगता था जब वह रोती थी।

अगर वह नहीं रोती, चुप-चाप खडी रहती मुझे सिर्फ देखती हुई, तो शायद मैं इतना नतशिर और पागलपन की हद तक बेचैन नहीं होता। हर रोज जब पूरी दुनिया एक भयानक अँधेरे में गुम हो जाती थी और मैं खुद को छिपाने के लिए एक किसी जगह की तलाश में निकल जाता था। कभी तो पीछा छूटे उस विलाप से। सुनते तो आए हैं कि रोने से पहाड़ तक पिघले हैं, जंगल रोए हैं तो रेगिस्तान की सूर्ख आँख भी नम हुई है। फिर मेरी इस देह की क्या बिसात या औकात! मुझे हर बार लगता था कि उसका रोना मेरे पूरे अस्तित्व को मोम के पुतले की तरह पिघला कर पानी कर देगा। जब कि वह चली गई थी, उसका रोना बदस्तूर जारी था। कहाँ से आती थी वह आवाज मुझे पता नहीं चलता था। मेरे पिता मुझे किसी डॉक्टर के पास ले जाते थे, वह मेरे दिमाग के पता नहीं कितने एक्स-रे निकालता था। कई तरह के सवाल पूछते हुए वह कहीं दूर किसी वियाबान में खो जाता था। लेकिन सपने में उसका रोना... नींद में मेरा चिखना और मेरी असामान्य-सी लगती मेरी हरकतें किसी भी लिहाज से कम होती नहीं दिखती थीं।

ऐसी भटभटाई आँखों से क्यों देख रहे हो भाई...?? सुनना है... तो सुनो... अगर सुनने का नहीं ही मन है तो जाओ दरवाजे पर शिखर की एक पुड़िया खा लो... दिमाग में हवा लगने दो... तुम अगर न भी सुनो... कोई भी न सुने तब भी यह सब तो कहना ही है मुझे... तुमसे नहीं तो खुद की ही किसी प्रतिछाया से... मैं कहूँगा ही... बाद में तुम चाहो तो एक भद्दी गाली दे लेना मुझे और शिखर का पूरा पिच्च थूककर अपनी बोरियत निकाल लेना... सच कहता हूँ मुझे बुरा नहीं लगेगा।

एक दिन का वाकया आपको बताऊँ। उस दिन मैं बेहद खुश था। आपको यकीन नहीं होगा कि मैं भी कभी खुश रहा करता था। जैसे बच्चे हुआ करते हैं एक कागज पर कोई टेढ़ी-मेढ़ी आकृति बनाकर। कि जैसे दुनिया का कोई नायाब चित्र बना गए हों। वैसे ही मैं बेहद खुश था क्योंकि उस दिन मैंने एक कविता लिखी थी और पहली बार अपनी लिखी हुई कोई कविता मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गई थी। आप विश्वास करेंगे कि वह कविता उसी के लिए लिखी गई थी। अब तो वह कविता मुझे याद भी नहीं... आपकी भी रुचि इसमें नहीं होगी।

वाकया यह कि वह आई थी। और रोज के आने से ज्यादा आई थी। शायद यह इसलिए भी हो कि रोज घर में आती थी और उसका आना मेरे मन के घर में नहीं होता था। वह रोज से ज्यादा सुंदर लग रही थी। यह मन में सुंदर लगना हो सकता था। उस दिन वह भी खुश थी। शायद यह मन में खुश होना था। उसके काले चेहरे पर एक अजीब तरह की चमक थी। पता नहीं वह चमक सचमुच की थी या मेरी खुशी की चमक धीरे- से उसके चेहरे पर जाकर बैठ गई थी, मैं कुछ ठीक तरह से नहीं कह सकता।

उसका नाम रश्मि था। उसके पिता और सौतेली माँ हमारे ही मकान में किराये की एक कोठरी में रहने आए थे। पिता सौतेला था या माँ तब ठीक से मालूम नहीं था। वह कई बार उदास होकर आती थी मेरे घर। तब और ज्यादा जब मेरी माँ इलाहाबाद से यहाँ रहने आ जाती थी। अपनी पढ़ाई के कारण मुझे अक्सर यहीं रहना पड़ता था। लेकिन लगभग हर समय मेरा ध्यान रखने के लिए माँ चली ही आती थीं । उनका जाना तभी होता था जब इलाहाबाद में रिश्तेदारों के यहाँ कोई खास अवसर हो या ऐसे समय जब उनका इलाहाबाद में रहना बेहद जरूरी हो। लेकिन ये सारी बाते बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं।

उसका आना और आँख में उदासियों की सैकड़ों परतें चढ़ाकर मेरे घर की एक-एक दीवार को घूरना ज्यादा महत्वपूर्ण था। वह कई बार आलमारी में सजी किताबों की ओर देखती थी हसरत भरी नजर से और उसके बाद एक ऐसी निगाह से मुझे देखती थी जैसी निगाह से उसके जितनी उम्र की लड़की मेरे जितनी उम्र के किसी लड़के को नहीं देखती। अब मैं सोचता हूँ कि उसके देखने को मनोवैज्ञानिक तौर पर असामान्य ही कहा जाना चाहिए। उसके कपड़े कई-कई दिनों तक एक ही रहते थे। बाल बिखरे-बिखरे और चेहरे पर धूसर सा कुछ छाया रहता था हमेशा। वह घर की चीजों से दूर-दूर रहती और मैंने ध्यान दिया था कि अम्मा ने उसे कभी-भी रसोई घर में न जाने दिया। वह घर के बरामदे में जमीन पर ही बैठ रहती थी। मैं आते जाते उसकी निगाह से बचता-सा भी उसे देख लेता था। उसका रंग सांवला था नैन-नक्श तीखे। उसे सुंदर नहीं कहा जा सकता, लेकिन न चाहते हुए भी मेरी आँखें अनायास भी बार-बार उस ओर चली जाती थीं।

अम्मा जब भी इलाहाबाद जातीं तो यह हिदायत जरूर देकर जातीं - घर का सामान इन्हें न छूने देना। उनका मतलब उन तीन लोगों से होता जिनमें वह लड़की भी शामिल थी। अच्छी लड़की है पर जाति तो उसकी...। दूर रहना। तू समझ रहा है न क्या कह रही हूँ मैं। वे कहते हुए मुझे अजीब निगाह से देखती थीं। एकदम अजीब जिसे अजीब के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता था। और मैं, जी अम्मा - कहते हुए बस उनका चेहरा ताकता रह जाता था।

कई बार मैने सोचा कि उस लड़की से पूछूँ - सुनो तुम्हारा नाम क्या है? इस पूछने में उसकी जाति के बारे में पूछना भी शामिल होता। लेकिन क्या सिर्फ इसलिए कि माँ उसकी जाति बताते-बताते रह जाती थीं और दूर रहने की नसीहत दे के चली जाती थीं याकि उस पूछने में पता नहीं कितना कुछ छुपा होता...।

लेकिन यह पूछने का साहस शुरू दिनों में तो मुझे नहीं ही हुआ। तब आँखें कहती थीं और आँखें ही सुनती भी थीं। और उसका भी एक लंबा सिलसिला। लेकिन उस दिन उसे खुश देखकर मैंने पूछ ही लिया - ऐसे क्या घूरती हो मेरी किताबों की ओर?? और कहने की जरूरत नहीं कि इस पूछने में मेरी ओर क्यों देखती हो ऐसे घूरकर भी शामिल था। उसने कुछ नहीं कहा और अपनी बड़ी जीभ बाहर निकाल कर बच्चों की तरह चिढ़ा दिया और माँ के कमरे की ओर चली गई। मैं कुछ कहता या करता इससे पहले ही वह आँख से ओझल हो चुकी थी। मैंने सोचा कि उससे उसका नाम पूछ लूँ हालाँकि मुझे उसका नाम मालूम था और मैंने अपनी कविता का शीर्षक ही दिया था - रश्मि के लिए। और मैं चाहता था कि वह जाने कि वह मेरे लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि मैं उसे समर्पित कर के कोई एक कविता लिख सकता हूँ।

उससे उसका नाम पूछने का हुलास पता नहीं क्यूँ दिल में एक वेग के साथ उठता था उसका कारण तो मुझे बाद में पता चला, भाषा का इतिहास और शरीर के व्याकरण की जब खोज करना शुरू किया हम दोनों ने मिलकर।

उस एक दिन पता नहीं मन के किस कोने से कोई एक शरारत की धुन बजी। मैं दरवाजे की ओट में छुपा उसके निकलने की प्रतीक्षा कर रहा था। वह आ रही थी कि मैं उसकी ओर लपका। हाथ पकड़ में आ गए। कुछ लम्हों तक हाथ से हाथ ने जद्दोजहद किए... फिर फिसल गए... वह हाथ झटकती छूटकर जा रही थी... मेरी मजबूत हथेलियों में उसके नर्म हाथ कसमसा कर रह गए होंगे। उसकी आँखों में उस कसमसाहट की एक तस्वीर उभरी थी और उसने फिर से जीभ निकाला था - व्ओ !!!! उसकी जीभ का रंग गुलाबी था। मैंने भी आईने के सामने खड़ा होकर उसी तरह जीभ निकाल कर कहा - व्ओ!!! और मेरे चेहरे की मासुमियत के बीच शर्म की-सी एक हँसी खेल गई।

यह पहली बार था कि मैंने इस तरह किसी लड़की का हाथ पकड़ा था कि मेरी उँगलियों के रक्तिम निशान उसकी कलाइयों पर उग आए थे।

आतमपुर आ गया है क्या?

अच्छा ठीक है, यह कोई टुटपुँजिया स्टेशन होगा। प्लेटफॉर्म नहीं दिख रहा... जंगल में रुकी पड़ी है ससुरी...। शायद किसी ने वैकुम किया है। अच्छा बताओ तो यह मन जो भाग रहा है बदहवास, उसको भी वैकुम किया जा सकता है क्या...। किसी को आता है तो करे न भाई, मेरे दिमाग की नसें फटती जा रही हैं। आतमपुर अभी कितनी दूर है भाई??? ...आगे बताता हूँ भई ...सब्र करो ...जरा सुरती मुझे भी...।

वह हँसी ऐसी थी कि जैसे सुबह का पीला सूरज होता है या कि किसी रोयेंदार पत्ते पर अटकी रह गई ओस की कोई एक चमकीली बूँद होती है। वह मेरी नहीं उस लड़की के चेहरे की हँसी थी जो मेरे कपोलों पर आकर चिपक गई थी। शर्म की-सी एक हँसी।

ये देखो तुम्हारी उँगलियों के निशान मेरी कलाई पर उग आए हैं... बड़े निर्दय इनसान हो तुम तो - उसने शिकायत के लहजे में कहा था। शिकायत भी कभी इतनी हसीन और मादक हो सकती है, यह मुझे पहली बार मालूम हुआ था।

तुम भागी क्यूँ?? उगे हुए इस निशान का मतलब समझती हो - मेरी आँखें उसके मासूम चेहरे में धँसती जा रही थी।

आज तक तो भागती ही रही हूँ, रोक सकोगे इस भागने को?? और ये निशान... - वह प्रश्न की तरह खड़ी थी मुझे हर ओर से घेरती हुई - लेकिन यह निशान उतना तकलीफदेह नहीं। इससे अधिक की आदत सीख लिया है इस शरीर ने। मेरा इतिहास ऐसे असंख्य निशानों से भरा हुआ है बाबू... तुम डर जाओगे। तुम बहुत मासूम हो। एकदम बच्चे। तुम्हें कुछ भी नहीं मालूम। किताबों की दुनिया ही तुम्हारे लिए ठीक है। तुम बरदाश्त नहीं कर पाओगे बच्चे!!! - वह मुझे बच्चा समझ रही थी। उसके इतिहास ही नहीं वर्तमान में भी सैकड़ों घाव के निशान थे। उसकी साँसों की तत्प धूप ने हौले-हौले मुझसे सब कुछ कह दिया था।

...और वह एक धूसर दुपहरी थी।

जानती हो मैंने एक कविता लिखी है - मेरे हाथ आनायास ही शरारत में उसके कपोलों की ओर फिसल गए थे।

- सुनाओ।

- नहीं, सुनाऊँगा नहीं। तुम इसे रख लो, बाद में पढ़ना अकेले में...।

- अकेले में क्यों ?? और तुम्हें कैसे पता कि मुझे पढ़ना आता है?

- तुम्हारी आँखें कहती हैं।

- अच्छा, तो कैसे कहती हैं आँखें?

- कहती हैं बस। ये कहने की नहीं समझने की बात है।

- होंठ नहीं कहते कुछ?

- कहते हैं न।

- कैसे?

- ऐसे... मैंने एक साँवले गुलाब पर अपना रक्तिम गुलाब रख दिया था - ऐसे... ऐसे...।।

यह पहली बार ही था कि कोई एक लड़की मेरे चेहरे पर अपना गर्म निश्वास छोड़ गई थी।

और बाद इसके यह सिलसिला बढ़ता ही गया था। जैसे समय को हम रोक नहीं सकते, हमारी सोच और आँखों से ओझल भी वह चलता रहता है चुप और बेआवाज। अपनी रौ में गुम। शायद वैसे ही यह सिलसिला भी बढ़ता गया था और हटात इतना समय गुजर गया कि किस तरह यहाँ कहाँ पहुँच गए हम का-सा एक एक प्रश्न अचानक हमसे टकरा गया और हम किंकर्तव्यविमूढ़-से एक दूसरे को ताकते भर रह गए थे। हम कहना ठीक नहीं होगा... सिर्फ मैं... बीच के एक दिन वह हमेशा के लिए दृश्य से ओझल हो गई थी।

हाँ भाई सच कहा तुमने। मेरे जेहन में उस लम्हा नैतिक-अनैतिक जैसे भारी-भरकम शब्द का निशान तक न था। और जिस लड़की के लिए हमारे रसोई घर में पैर तक रखने पर मनाही थी वह मेरे तथातथित पवित्र और सवर्ण देह की यात्रा कर रही थी। और उसके उद्दाम स्पर्श से मेरा रोम-रोम धुल रहा था और करोड़ों वर्षों की लगी काई मेरे देह से निकल कर मिट्टी की शक्ल में ढलती जा रही थी।

समय अपने अक्ष पर घूमता हुआ भी दो देहों के बीच की किसी गुफा में ठहर गया था।

आतमपुर अभी और कितनी दूर है बाबा?? हाँ, आए तो बताना। मुझे जितनी जल्दी हो सके पहुँचना है। किसलिए?? वो भी बता दूँगा भाई... आप भाग तो नहीं रहे न कहीं... मुझे आपलोगों के साथ की जरूरत है भई...

माँ पुरानी हिदायतों के साथ इलाहाबाद चली गई थीं। लड़की के पिता मेरे साथ गए थे स्टेशन तक। सामान कुछ ज्यादा था और उनकी जिद कि यह बच्चा कैसे सम्हालेगा इतना बोझ। मेरे मना करने पर भी वे साथ गए। स्टेशन से ट्रेन निकल चुकी थी और हम अब बाहर थे।

- चलें?

मैं उनके चेहरे को गौर से देख रहा था। काला बलिष्ठ शरीर और चेचक के दाग वाले उबड़खबड़ चेहरे पर रँगी हुई काली और ऐंठी हुई मूँछें। वह चेहरा एक बार देखते ही क्रूर लगता था। इसकी क्रूरता के सामने वह लड़की कितनी मासूम और निर्दोष लगती होगी...। मैं घर तक जाने वाली बस को आती हुई देखने लगा।

- आप जाईं... हमरा कुछ काम है इहाँ... हम बाद में आय रहे हैं। उनकी आवाज भी कुछ कर्कश।

मैं कुछ हड़बड़ी में घर तक आने वाली बस पर सवार हो गया।

मैं जल्दी-जल्दी घर की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। चप्पलों की आवाज कुछ तेज थी। जानबूझ। मुझे मालूम था कि नीचे के कमरे में वह कहीं होगी और इस तरह उसे मेरे लौट आने की सूचना मिल जाएगी।

लेकिन वह नहीं आई। पूरी शाम बीत गई। रात बीत गई और फिर दिन उगा। रात में एक देखे सपने की हल्की झिलमिलाहट थी। ...एक क्रूर राक्षस अट्टहास करता एक लड़की के पीछे भाग रहा था। लड़की भागते-भागते थक चुकी थी उसकी साँसें फूल चुकी थीं दौड़ते-दौड़ते वह जमीन पर धम्म से गिरकर निढाल हो गई थी... वह क्रूर राक्षस एक पल में उसके करीब पहुँचा था और उसकी देह पर सवार हो चुका था... लड़की जितनी तड़फड़ाती थी उस राक्षस की कसावट उतनी ही मजबूत होती जाती थी... अंततः वह थक गई थी और चिल्लाई थी ...बाबू ...बचाओ... यह सब पता नहीं कैसे मेरे सामने हो रहा था... और अचानक वह लड़की रश्मि के चेहरे में बदल गई थी और वह राक्षस काली ऐंठी हुई मूँछों वाले उसके बाप की शक्ल में... मैं बेतहासा दौड़ा था कि मेरे कदम किसी काँटेदार रस्सी के भँवर में फँस गए थे और मैं धड़ाम से जमीन पर जा गिरा था। और बेहोश। और यह अजीब ही था कि सपने में मैं अपनी बेहोशी को देख रहा था...। मैं अपनी बेहोशी में निसहाय था और मेरी बेहोश आँखों के सामने एक ऐसी अनहोनी घट रही थी जिसकी कल्पना तक करना हमें एक आत्मग्लानि और अपराधबोध से भर जाता है। लेकिन तब यह सपना मेरे लिए अर्थहीन था, जैसे और सपने होते हैं अपने होने में भी न होने की तरह।

सपने की बेहोशी में भी मैं किसी महीन मगर प्रभावशाली आवाज को अपने आस-पास गूँजता-सा महसूस कर रहा था - अपराध और वारदात का यह सिलसिला इस 21वीं शताब्दी में भी जारी है... दो अलग-अलग जातियों के प्रेमी युगलों की लाश गाँव के सिवान पर नृशंस आवस्था में मिली... ऑनर किलिंग का यह मसला... पुलिस जब घटनास्थल पर ... बताया गया कि... हमारी टीम ने इसका पता लगाने के लिए...। और उस घुरपेंच आवाज के बीच कोई चिड़िया बोली थी। इस बीच मुझे मेरी जाति याद आई थी और मेरे नाम के बाद लिखा लाने वाला एक शब्द बंदूक की किसी गोली की तरह झाँय-झाँय करता निकल गया था...। दूसरी और से उस लड़की के नाम के आगे लिखा जाने वाला शब्द किसी चिड़िया की तरह उड़ा था। शायद एक विस्फोट हुआ था हवा में और धरती का सीना एक पल के लिए काँप गया था।

...और मैं हकबकाकर उठ गया था। यह जानी पहचानी आवाज थी जो हर रोज सुबह चार बजे बोलती थी। मैंने देखा कि चार बज रहे थे और घड़ी के उपर हमेशा बैठी रहने वाली चिड़िया की आवाज थी। मैने एक बटन दबाकर उसे चुप करा दिया।

देखिए... कल रात ग्यारह बजे...। मैंने देखा टेलिविजन अब भी चल रही थी। मैं पता नहीं कितनी रात तक उसका इंतजार करता रहा था - पता नहीं कब नींद आई थी। पता नहीं नींद में कब सपने आए थे और कब सपनों के बीच मेरी बेहोशी में वारदात की खबरें धीरे-धीरे घुस गई थीं। मैं बेहोश नहीं था यह जानकर राहत मिली थी, कहीं भी दूर-दूर तक किसी बारदात के निशान न थे... या पता नहीं कि मैं अब भी होश में था या नहीं... एक अजीब भारी मन से मैने टेलिविजन को बंद किया। सिर पर एक भारी बोझ की तरह कुछ बैठा हुआ था और सपने का वह दृश्य रह-रह कर मेरे जेहन में किसी करुण गीत के लय की तरह रिपीट हो रहा था... बाबू बचाओ... और बीच इसके एक धड़ाम की आवाज। और बेहोशी।

और वह नहीं आई थी।

अगले एक दिन तक मैंने पता नहीं कितनी कविताएँ लिख दीं। जाहिरातौर पर यह उसी के लिए थीं। एक कविता के आँसू निकलते थे तो दुसरी उसे चुप कराती थी। एक गुस्से में होती तो दुसरी उसे प्यार से समझाती। इनके बीच इंतजार की कविताएँ भारी संख्या में थी और उन्हें समझाना किसी किसी भी कविता के बूते से बाहर की बात थी।

यह इंतजार का तीसरा दिन था।

वह कब धीरे से आई थी मुझे पता नहीं चला। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। मुझे लगा कि वह रात भर रोती रही थी।

- तुम उदास हो?

- यह उदासी? हाँ, यह उदासी ही तो है।

- क्यों? मुझे बताओ। तुम्हारा बाप मुझे बहुत क्रूर लगा। वह तुम्हें पीटता है न?

- यह सब तुम मत पूछो बच्चे। तुमने क्या किया इतने दिन?

- कविताएँ...। इंतजार... सपना... एक लम्हा रोया भी...। तुम पढ़ोगी मेरी कविताएँ...??

- पढ़ूँगी। तुम कहानी नहीं लिखते??

- कहानी लिखनी तो मुझे नहीं आती। और कहानी तो उसकी लिखी जाती है जो चला जाता है। तुम चली जाओगी?? इस उदासी का रण बताओगी तब मैं भी कहानी लिखने की कोशश करूँगा।

- ठीक है बड़े हो जाना फिर लिखना। अभी तुम बच्चे हो बच्चे। मैं बताऊँगी उदासी का कारण।

- बोलो न तुम नहीं जाओगी न। और सुनो मैं बच्चा नहीं हूँ। और तीन महीने बाद मैं पंद्रह साल का हो जाऊँगा। ...और मैं अभी ही कहानी भी लिख सकता हूँ - तुम्हारे यहाँ रहते भी कि चले गए कि नहीं रहने वाले की कहानी... तुम्हारी...।

- और मैं अभी ही बीस साल की हूँ। मैं चली जाऊँगी कभी तब लिखना कहानी।

- तुम चली जाओगी सच??

- नहीं जाऊँगी पगले... आह, मेरा बच्चा। लेकिन तुम लिखना। एक दुख लिखना... एक जाति लिखना जो मेरे नाम के आगे लगी रहती है हर समय और एक लड़की लिखना... एक चिड़िया लिखना... और एक पिंजरा... एक पिंजरे में एक चिड़िया लिखना... जरूर लिखना मेरे बच्चे।।

वह मुझे अपनी बाँहों में दबोचकर किसी बच्चे की तरह बेतहासा चूमने लगी थी। मैने देखा उसकी सूजी हुई आँखों में पीड़ा के सैकड़ों बादल एक साथ मँडरा रहे थे।

उस दिन मौसम की सबसे घनघोर बारिश हुई थी। इतनी कि मेरा पूरा घर बारिश के पानी में डूब चुका था। मेरे पिता का वह घर जो उस रात मेरा था और बारिश के उस पानी में दो वस्त्रहीन जिस्म अबाध तैर रहे थे। एक जब तैरते-तैरते थक जाता तो वह दूसरे की ओर सहायता की निगाह डालता और फिर दूसरा तैरने लगता। कई-कई बार वे दोनों साथ-साथ तैरते रहे... एक दूसरे में लोहे और चुंबक की तरह लिथड़े हुए... कभी-कभी बारिश की बूँदें मंद पड़ जाती कि पानी में बुलबुले छूटने लगते और दूसरी ओर से घमघोर और भारी और सघन बूँदें गिरनी शुरू हो जातीं। बारिश करोड़ों वर्षों से बारिश ही थी - बारिश के आगे किसी जाति या धर्म का विशेषण नहीं लगा था - वह बीते हुए कल की असंख्य श्रृंखलाओं के पार से चल कर आती हुई सिर्फ बारिश थी - उसमें डूबते-तैरते दो जिस्म भी किसी भी मानवीय विशेषण के परे सिर्फ जिस्म थे जो मन की पगडंडियों की यात्रा करते हुए एक दूसरे की साँसों में घुलकर एक हो जाते थे।

उस दिन मौसम की सबसे घनघोर और अंतिम बारिश हुई थी। बारिश जब थमी, वह जा चुकी थी। मुझे नहीं पता था कि उस दिन के बाद वह फिर कभी नहीं आएगी... कि वह हमेशा के लिए जा चुकी थी और पीछे छोड़ गई थी एक कहानी। नहीं कहानी नहीं, एक चिड़िया... एक पिंजरा... और एक समय के चेहरे पर अंकित धुँधला सा एक वादा... कहानी का वादा।

बाद के दिन सुबह के चमकीले धूप ने मुझे जगाया था। मेरा पूरा शरीर किसी मद्धिम आँच में तप रहा था। बिस्तर से उठा तो सिर हल्के से घुम गया। मैं फिर सो गया था। मैं देर तक उसकी राह देखता रहा था। सुबह से दोपहर और फिर शाम हो गई थी। सिर का घूमना थोड़ा कम हो गया था।

मैं नीचे उतरा। सीढ़ी जहाँ खत्म होती थी, वहीं एक कमरे का दरवाजा था - उसी कमरे में वे तीन लोग रहते थे। मैं चप्पल की जोर-जोर चटकारी देते हुए ही उतरा था। लेकिन कमरे की सिकड़ी बंद थी और उसपर ताला लटका हुआ था। मैं हैरान रह गया। कहाँ चली गई?

एक दिन एक महीना बना एक महीना एक साल बना और इस तरह पता नहीं कितना समय बीत गया। इंतजार की घड़ियाँ भी एक दिन ऊब गईं... लेकिन वह अंतिम बारिश, वह कहानी... वह स्नेह कि एकांत समर्पण। वे इतिहास की तरह मेरी आत्मा पर दर्ज हो गए थे। काश कि मैं उसे उस समय रोक पाता। स्मृतियों में बार बार संवाद का एक डुकड़ा रह-रह कर मुझे असंयत और बेचैन करता गुजर जाता था :

- तुम चली जाओगी, तो मैं मर जाऊँगा।

- मैं मर कर चली जाऊँगी।

- मत जाना।

- रोक लेना मुझे।

- कैसे?

- एक लड़का किसी लड़की को जाने से कैसे रोकता है?

- हाथ पकड़ कर, मिन्नतें करता है। फिल्मों में देखा है मैंने।

- धत्त, बुद्धु... तुम बहुत बच्चे हो।

- कैसे रोकता है बताओ न।

- नहीं बताऊँगी। अम्मा से पूछना।

- डर लगता है अम्मा से पूछने में।

- डर लगता है, तो फिर मुझे कैसे रोकोगे। मैं छोटी जात हूँ।

- मैं जात नहीं मानता।

- और तुम्हारी अम्मा? तुम्हारे जमींदार पिता ??

- देखना मैं रोक लूँगा।

- देखेंगे... नहीं रोक पाए तो कहानी लिखना एक। एक चिड़िया... एक पिंजरा... बारिश और मेरे नाम की एक कहानी... बुद्धु बच्चा!!

और वह सचमुच चली गई थी। मैं अपने तरीके से उसे रोकने की कोशिश करता उसके पहले ही। बिना कुछ कहे। सिर्फ यह कि कहानी लिखना। और उसके साथ एक पूरा समय चला गया था। बची रह गई थीं उसके लिए लिखी गई असंख्य कविताएँ... बेचैनी में फड़फड़ाती। ...और एक कहानी। कहानी?? जिसका लिखा जाना शेष था। और एक क्यों?? जिसका जवाब मेरे पास अधूरा था। इन सात सालों में मेरी समझ में यह बात आ गई थी। और उसकी कई बातों के अर्थ भी खुल गए थे। लेकिन सोचता रहा था कि एक कहानी जरूर लिखूँगा। पहली और आखिरी कहानी।

उसके चले जाने के बाद की बातों के जिक्र में क्या आपको कोई रुचि है। कि मैं लंबे समय तक बीमार रहा। हर रात मुझे डरावने सपने आते थे। और कई बार मैं जोर-जोर से चीखने लगता था। मेरी दिमागी हालत को देखकर बहुत बार मुझे सायक्रेटिस्ट के पास ले जाया गया। लेकिन मैं अपने आपे में कभी नहीं आया। हाँ इस बीच मैं जैसे-तैसे हिंदी से स्नातकोत्तर पास कर गया था और इसी शहर में मुझे अनुवादक की एक नौकरी मिल गई थी। अम्मा बहुत बीमार रहने लगी थीं और डॉक्टर की सलाह पर पिता ने उन्हें इलाहाबाद के पुस्तैनी मकान में शिफ्ट कर दिया था। इस शहर में मैं अकेला था। अपनी शेष और बच्ची स्मृतियों के साथ एकदम अकेला। हर रात अँधेरे में किसी लड़की के रोने की आवाज आती। कई बार वह आवाज इतनी साफ और नजदीक होती कि मैं डर जाता था... मैं जोर-जोर से चीखने लगता था। आस-पास के लोग मेरी इस आदत के अभ्यस्त हो चुके थे। मैं डर से डरा हुआ और उस लड़की के रोने की आवाज से बचने के लिए नींद की गोलियाँ खाता था। मैंनें कई बार शाराब भी पी थी।

रोज कलम और कॉपी लेकर संकल्प के साथ मैं बैठता था कहानी लिखने के लिए... घंटों इसी तरह बैठे रहने के बाद मुझे होश आता था और कॉपी के पन्ने अजीब-अजीब आकृतियों से भर जाते थे। बीच-बीच में कहीं-कही रश्मि लिखा हुआ जैसा कुछ दिखता था जिसे बड़ी मुश्किल से कोई पढ़ सकता था। कोई क्यों मैं तक। ...रश्मि ...कि चिड़िया ...कि पिंजरा ...कि एक लड़की...??

उस रात उसके रोने की आवाज बहुत तेज थी। मैंने ध्यान दिया कि उसकी आवाज रश्मि की आवाज की ही तरह थी... वह सपने में किसी पहाड़ पर हँकासी-पियासी चढ़ रही थी - उसके पीछे एक आदमी था जिसके हाथ में तेज धार वाला एक हथियार था... वह दौड़ती हुई पहाड़ के छोर की खाईं तक पहुँची थी - आगे रास्ता नहीं था - वह जोर से मेरा नाम लेकर चिल्लाई थी - बहुत देर तक उसकी करुण आवाज पहाड़ों की घाटियों में गूँजती रही थी। और उस रात मैं पूरी रात सोता-जागता हुआ छत के एक कोने में किसी पागल की तरह दुबका रहा था।

दूसरे दिन डाकमुंशी एक लिफाफा दे गया था। नाम और पता मेरा ही लिखा था जो रोमन अक्षरों में था। भेजने वाले की जगह पर एक आकृति बनी हुई थी - वह आकृति किसी लड़की की लगती थी जिसकी आँख से आँसू ढलकता हुआ साफ महसूस किया जा सकता था।

रश्मि?? - पूरे वेग से एक तस्वीर का टुकड़ा मेरे दिमाग की तंतुओं को बेधता चला गया था।

हाँ भाई, उसी का पत्र था। इतने सालों बाद... क्या लिखा था उसने?? बताता हूँ... इतना सबकुछ बताया है तो उसे क्यों नहीं बताऊँगा... अरे भई आतमपुर आने पर बताना कोई... बहुत जल्दी है... मुझे पहुँचना है... हाँ पत्र। मैं निकलता हूँ बाबा...। आपलोग भी क्या आतमपुर ही जा रहे हैं?? ये देखिए... उसी ने लिखा है खुद अपने हाथों से... आप खुद ही पढ़ लें... बहुत थक गया हूँ मैं... आतमपुर आए तो... (...??) मैं नहीं पढ़ सकता भाई... मेरी साँस फूलने लगती है... मुझे आतमपुर जाना है... मरने से पहले एक कहानी...

चिठिया हो तो हर कोई बाँचे अर्थात देह ही दुख है

आतमपुर मुहल्ला

दि : 27.01.1999

बच्चे,

बहुत बहुत प्यार। मैं जानती हूँ तुम मुझपर बहुत नाराज होगे। लेकिन सच मानो मैं आई नहीं, मुझे जबरदस्ती लाया गया। और तुम क्या मेरा यकीन करोगे कि आने के पहले मैं तुमसे एक बार जी भर मिलना चाहती थी... मिलना नहीं बल्कि रोना चाहती थी... मुझे कुछ कहना है बच्चे (माफ करना तुम्हें आज भी बच्चा कह रही हूँ... तुम तो अब बड़े हो गए होगे... याद भी नहीं कितने साल हो गए। मेरे लिए तो समय उसी दिन रुक गया था... अब तक रुका हुआ है, मेरे जेहन में आज भी तुम पंद्रह साल के बच्चे हो। तुम्हें बुरा लगा?? बुरा मत मानना बच्चे। तुमने कहानी लिखी कि नहीं??)

तुम्हें कह दूँ कि नहीं। लेकिन सोचती हूँ कि यह सब कर के तुम्हें परेशान तो नहीं कर रही न... लेकिन फिर लगता है कि तुमसे न कहूँगी तो यह सबकुछ अनकहा ही रह जाएगा और उसका बोझ मेरी आत्मा को सहन नहीं होगा। इतना कुछ तो अकेले सहा है। अब सहने की ताकत नहीं बची मेरे बच्चे।

बचपन से ही तो सहती आई थी। जब आठवीं में पढ़ती थी। मेरे पिता ने मेरी पढ़ाई बंद करवा दिया। मेरी माँ मेरी अपनी नहीं थी मेरे बच्चे। वह तो मेरे जन्म के साथ ही घर की चारदिवारी के भीतर घुटकर मर गई थी। वह सुंदर नहीं थी और मेरे पिता ने उसके काले रूप के कारण उसे कभी पसंद नहीं किया। और आफत तब आ गई जब घर में एक बेटी ने जन्म लिया। कहते हैं कि प्रसव के बाद मुझे और माँ को प्रसूति गृह में दो दिन यूँ ही छोड़ दिया गया था। मैं दो दिन माँ की छातियों से तिपकी उसका शेष लहू चूसती रही थी। कहते हैं कि दो दिन के बाद पिता ने जब घर का ताला खोला तो मेरी माँ मर चुकी थी। और मेरी चाँय-चाँय की आवाजें अपनी माँ की मृत्यु का शोक मना रही थी।

पट्टीदारों के सहारे मैं कितने दिन जीवित रहती। सो, बिरादरी वालों ने पिता की दूसरी शादी करा दिया। पिता यही चाहते भी थे। इस बार उनको अपेक्षाकृत सुंदर बहू मिली थी। कितना कुछ है लिखने को... तुम भी सोचोगे कि यह क्या लेकर बैठ गई मैं... लेकिन यह सब इसलिए कह रही हूँ कि जब तुम कहानी लिखोगे तो यह सब लिखना। लिखना कि इस विकास की चमचमाती रंगीनियों के बीच एक लड़की होना आज भी अभिशाप है। क्या ईश्वर ने हमें इसलिए ही बनाया, क्या इस इतनी बड़ी साजिश में तुम्हारी माँ का वह ईश्वर भी शामिल नहीं है, जिसके आस-पास तक जाने की मुझे मनाही थी।

तुम्हारे इतने करीब खुद को जाने देने में प्यार के बीच ईश्वर (ईश्वर या आदमी) के बनाए हुए नियमों के खिलाफ एक मौन विरोध भी शामिल था मेरे बच्चे। लेकिन उसकी कितनी बड़ी सजा दी गई मुझे, वह याद करती हूँ तो मेरा रोम-रोम मेरे अपने ही अस्तित्व को धिक्कारने लगता है। तब इस बात पर विश्वास होने लगता है कि हमारी सभ्यताओं, और इनके विकास और यहाँ तक कि ईश्वर के इतने पाखंडों के बीच भी मूलतः हम जानवर हैं। जानवर और सिर्फ जानवर। उस दिन जब मौसम की सबसे घनघोर बारिश हुई थी - मेरी सौतेली माँ ने हमें एक दूसरे से गुँथा हुआ देख लिया था। जब मैं कमरे में लौटी तो पिता का फुफकारता चेहरा मेरे सामने था। उसने मुझसे बिना पूछे ही मुझे जोर से एक लात मेरी कोख पर मारी थी और मैं धड़ाम से फर्श पर जा गिरी थी, मेरा माथा किसी चौकोर वस्तु से जा टकराया था और खून की एक पिचकारी- सी उभरी थी... वह औरत जिसे इस समाज और तुम्हारी माँ के ईश्वर ने मेरी माँ बनाकर मेरे पास भेजा था... जानते हो वह क्या कह रही थी... मुझे कहते हुए भी शर्म आ रही है... लेकिन मैं कहूँगी... तुम चाहो तो इसे कहानी में मत लिखना... कहानी में इतना असुंदर और घृणित शब्द (अश्लील भी) के इस्तेमाल से बचा जाता है, गुरुओं ने इसकी सलाह दी है। आखिर हम सभ्य जो हैं...(???) वह मक्कार औरत चिल्ला रही थी... बहुत जवानी चढ़ी है इस छिनाल पर पता नहीं किससे-किससे हँढ़वा रही है... तुम नामर्द की तरह क्या खड़े हो... बच्चे से इसकी गर्मी शांत नहीं होगी... अब तुम चढ़ो इस रंडी पर... खोल हरामजादी... चलो... मेरा मुँह क्या देख रहे हो...।

मैं काठ हो गई थी...एक बर्फ की सिली...। धरती के सारे मनुष्य उस दिन मर गए थे। नशे में धुत्त एक पुरुष उस काठ को अपनी वासना से रौंद रहा था। और एक औरत पूरी ताकत के साथ मेरे जबड़े को हथेलियों से भींचे मंत्र (?) का जाप कर रही थी।

तुम घबराओ नहीं बच्चे मैं मरी नहीं थी। मेरी साँसें चल रही थीं। और लगभग अधबेहोशी की अवस्था में ही आतमपुर की गाड़ी पर मुझे बिठा दिया गया था। समय मर गया था। ईश्वर मर गया था। इस पृथ्वी के सारे मनुष्य मर गए थे... और मेरी साँसें चल रही थीं।

वह पुरुष पता नहीं कैसे और कितनी बार... कितने समय और सहस्त्राब्दियों तक...। तुम सुनोगे...?? सुन सकोगे??

और एक दिन जब वह जानवर ऊब गया तो उसने मुझे एक दूसरे जानवर को सौंप दिया। इस सौंपने की एवज में उसे पच्चीस हजार मिले थे...। बारात आई थी... बाजे भी बजे थे शायद...।

और शादी की पहली रात ही उस दूसरे जानवर ने नशे की हालत में मुझे पीटा था। किस लिए बाबू?? मेरे संदूक में उसे एक कागज का डुकड़ा मिला था... तुम्हें याद है वह पहली कविता लिखी थी मेरे लिए तुमने... उसके ऊपर लिखा था - रश्मि के लिए।

मैने पता नहीं कितने समय तक उसे सहा। अपनी देह और अपनी आत्मा पर। देह से अधिक मेरे आत्मा पर गहरे घाव के निशान थे। इस बीच मैंने सोचा कि रात के अँधेरे में निकल कर कहीं भाग जाऊँ... कहीं के बारे में सोचती थी तो मुझे सिर्फ तुम्हारा चेहरा याद आता था... और सोचती थी कि अपने साथ तुम्हें भी क्यों एक नर्क में ढकेल दूँ...। एक ब्राह्मण के घर एक कुजात... और तुम्हारी ...और हर बार कई-कई दौड़ लगाकर वहीं लौट आती थी...।

मैं समझौता कर के जी ही रही थी। इस बीच उसकी मजदूरी का काम बंद हो गया था। उस नशाखोर को कोई काम पर नहीं रखना चाहता था। मैंने इस दौरान कई घरों के बर्तन माँजकर रोटी का जुगाड़ किया। लेकिन रोटी की जुगाड़ से ज्यादा उसे शराब की जरूरत थी। मैंने उससे मिन्नतें की थीं। उसकी हर जिद को पूरा किया था। हर तरह से अपने शरीर को उसके सामने प्रस्तुत किया था। मैं बहुत कमजोर हो गई थी। बाहर के जंगल में उससे भी ज्यादा खूँखार जानवर घात लगाए बैठे रहते थे। ऐसे में वह मुझे कई बार कम खतरनाक जानवर लगता था। आह एक स्त्री के शरीर में ऐसा क्या होता है... तुम बताओ बच्चे इस शरीर में ऐसा क्या आकर्षण होता है। क्या स्त्री की देह ही सबसे बड़ा दुख है? मुझे अपने अस्तित्व तक से नफरत हो गई थी। उस दिन ही अगर खुद को खत्म कर लिया होता जब मेरे अपने बाप ने...।

एक दिन उसने कहा कि वह दिल्ली जाना चाहता है कमाने के लिए। इस कस्बे में अब कुछ बचा नहीं...। घर की हालत तो ठीक नहीं थी। घर में नमक तक लाने के पैसे नहीं थे। दिल्ली जाने का भाड़ा कहाँ से आएगा...?? उसने कहा कि बालेश्वर देगा। उसका भाई रघुराई जूते की कंपनी में काम करता है, उसके लिए उसने नौकरी की बात भी की है। बालेश्वर एक दो बार हमारी झुग्गी में आया भी था... और वह वह मुझे ऐसे निहारता था कि मेरा रोम-रोम उसकी माँखों में छुपे भाव को पढ़कर जल उठता था। एक दिन गली के कोने में उसने मेरा हाथ पकड़ लिया - किस नर्क में रह रही हो तुम?? कहो तो... और मेरी आँखें जल उठीं थीं। उन आँखों के ताप का सामना वह नहीं कर पाया था। बालेश्वर का नाम सुन के मैं उसे सब कुछ बताना चाहती थी... लेकिन फिर मैंने सोचा कि चलो इस बहाने हो सकता है कुछ अच्छा घट जाए उसके जीवन में... मैं जानती थी कि बलेश्वर की इतनी हिम्मत नहीं कि वह मेरी जलती आँखों का सामना कर सके। कितनी सस्ती बातें लगती होंगी न तुम्हें यह बच्चे। किसी मुंबइया फिल्म की घिसी-पीटी स्टोरी की तरह। लेकिन तुमसे न कहूँगी तो और किससे...?? भले ही तुम्हारी कहानी कमजोर हो जाए... लेकिन इसे भी तुम लिखना मेरे बच्चे...।

और जिस दिन दिल्ली जाना था उसे, उसके एक दिन पहले की रात थी वह...। उसने तेज आवाज में दरवाजे पर दस्तक दिया था...। दरवाजा खुलते ही वह लड़खड़ाते कदमों से अंदर आ गया था... उसके पीछे एक और छाया थी। उसके साथ बालेश्वर भी था। मैं कैसे कहूँ कि उस रात क्या हुआ था... मेरे पास किसी लेखक की भाषा नहीं कि मैं उस रात या उसके बाद आनेवाली असंख्य रातों के बारे में कुछ ठीक-ठीक लिख सकूँ...। 21वीं सदी के चरम विकास और सभ्यता की तमाम नाटकीय विडंबनाओं के बीच मैं महज एक देह थी जिसका पूरा अस्तित्व वीर्य और खून के छीटों से लथ-पथ था...।

वह दिल्ली नहीं गया था, उसे कहीं जाना नहीं था और उसके बाद कई-कई शक्लों के पता नहीं कितने बालेश्वर आए थे मेरी आत्मा के शेष तंतुओं का रक्त पीने...

एक चिड़िया थी... कि वह एक लड़की थी जिसके लिए एक निर्दोष कवि ने पता नहीं कितनी ही कविताएँ लिखी थीं... लेकिन मैं अब तक मरी नहीं... अब भी मेरी देह साँस ले रही है मेरे बच्चे...। दुनिया के सारे मनुष्य मर गए हैं... सभ्यताएँ इतिहास की अंधी सुरंगों में लौट गई हैं... और मैं जिंदा हूँ कि हर बार तुम मेरे सामने खड़े हो जाते हो...

तुम आओगे मेरा यह पत्र पाकर... मेरे ले न सही एक कहानी के लिए... एक वादे के लिए...। तुम्हारे आने तक अगर मेरी देह जिंदा न भी रही तो भी कहानी का अंत तुम्हें यहीं मिलेगा... इसी आतमपुर में...

आँसू की दो बूँदें... एक सूखा हुआ गुलाब और एक मरा हुआ समय... और हाँ, मौसम की अँधेरी सुरंग में लौट गई एक बारिश... यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए... मेरे बच्चे (हालाँकि तुम अब बच्चे नहीं हो)

तुम्हारी ही (??)

- रश्मि माँझी।

आतमपुर समाचार... आतमपुर समाचार...

आतमपुर समाचार...???

आ गया आतमपुर?? यही है आतमपुर...?? दो मुझे आतमपुर समाचार की एक प्रति दो भाई...?

कत्ल??

कितनी कत्लें होगी और भाई... इसी एक वजह से मैंने अखबार पढ़ना छोड़ दिया है। कितनी कत्लों की सूचना देगा यह आखबार?? यह कौन है... रश्मि की यह तस्वीर। मुझे दो यह अखबार... बिना पैसे के एक अखबार नहीं दे सकते तुम... इसमें वह तस्वीर छपी है। देखा आप लोगों ने... यह उसी की तस्वीर है... क्या लिखा है थोड़ा पढ़कर सुनाओ भाई...

तो क्या अब वह इस दुनिया में नहीं रही... उसका कत्ल... किसने ...कैसे किया... क्यों??

यह उसी की तस्वीर है... क्या लिखा है थोड़ा पढ़कर सुनाओ भाई...

आतमपुर, 28 अक्टुबर

आतमपुर मुहल्ले में एक विवाहिता ने अपने पति का कत्ल सब्जी काटने वाले हथियार से कर दिया। सूत्रों से पता चला कि विवाहिता रात में नशे में धुत अपने पति का कत्ल कर अपने मायके चली गई और मायके में रह रहे अपने पिता और माँ की भी गला काटकर हत्या कर दी। हत्या के बाद उसने खुद को मारने की भी कोशिश की... इस कोशिश में उसने अपनी कलाई की दोनों नसें काट लीं और रात भर लाशों के बीच घर के अंदर बंद रही। सुबह गाँव के लोगों ने बेहोशी की अवस्था में उसे अस्पताल पहुँचाया। महिला अस्पताल में अपने जीवन से जूझ रही है... पुलिस ने बताया की वह हत्या की वजहों का पता लगा रही है और होश में आने पर इस बाबत महिला से पूछताछ की जाएगी।

आतमपुर स्टेशन के बाहर मैं उस अस्पताल का पता पूछते हुए बेतहासा सड़क पर दौड़ रहा था।... मुझे एक बार उससे मिलना था... कहना था कि मैं आ गया हूँ... उन तमाम बंदिशों को भूलकर जिसके कारण शायद तब तुम्हें रोक न पाया था। कि अब भी इस धरती के सारे मनुष्य मरे नहीं... और ईश्वर... और प्रेम और बारिश... मैं ...। मैं अस्पताल के एक कमरे में बढ़ता चला गया था... वह बेहोश थी... उसका शरीर पीला पड़ चुका था...।

पुलिस के एक सिपाही को मेरे उपर दया आ गई थी और उसने मुझे कमरे तक जाने दिया था... मैं रोने और न रोने के बीच की एक स्तब्ध आवस्था में खड़ा उसके होश में आने की प्रतीक्षा करने लगा ...बहुत समय तक मुझसे न रहा गया तो मैने एक बार उसके गाल पर हाथ फेरा और भर्राए हुए स्वर में कहा - रश्मि। उसने एक क्षण के लिए आँखें खोल दीं... एक हँसी उसके चेहरे पर खिल गई... उस चेहरे पर उस समय किसी तरह का कोई पश्चाताप नहीं था... वह कुछ कहना चाहती थी कि एक जोर की हिचकी आई... और उसकी साँसें असंभव तरीके से तेज हो गई... वह अब भी लगातार मेरे चेहरे की ओर देखती जा रही थी... कुछ क्षण बाद सब कुछ शांत हो चुका था... सिर्फ आँखें थीं कि खुली रह गई थीं... मेरी ओर लगातार सकून और पीड़ा से देखतीं... वैसे ही जैसे उसने मुझे मौसम की सबसे घनघोर बारिश के दिन देखा था...।

...और कहानी??

एक अधेड़ दढ़ियल आदमी के सामने एक पुरानी पीली डायरी... एक स्याही बकोरती कलम... दो निर्दोष आँखों से टपके दो बूँद आँसू... पुराने दिनों की कुछ चीकट कविताएँ और सदियों पुराना एक प्रेम-पत्र (अगर उसे प्रेम-पत्र मान लें) एक काँपते हाथ से लिखे गए अस्पष्ट-से अक्षर जो आँसुओं के खारे पानी में घुलकर फट गए थे - कोई अगर कोशिश करे तो उपर लिखा हुआ एक वाक्य सही-सही और साफ पढ़ सकता था - मैं एक लड़की को जानता था।

...और कहानी... (???) - दूर समय की शाख पर बैठी एक चिड़िया बोल गई थी... पिंजरे से आजाद... और सदियों से अपने अक्ष पर घूमती पृथ्वी थोड़े वक्त के लिए थम गई थी।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में विमलेश त्रिपाठी की रचनाएँ