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निबंध

विक्टिर ह्यूगो
गणेशशंकर विद्यार्थी


विक्‍टर ह्यूगो (जन्‍म 1802 में, मृत्‍यु 1885 में) का स्‍थान संसार के साहित्‍य-सेवियों में बहुत ऊँचा है। वे फ्रांस में उत्‍पन्‍न हुए थे, परंतु वे थे संसार भर के, और उन्‍होंने जो कुछ लिखा वह संसार-भर के लिए लिखा। उन्‍होंने बहुत लिखा और बहुत अच्‍छा लिखा। अंग्रेज कहते हैं, शेक्‍सपीयर की बातें अनुपम हैं, शेक्‍सपीयर से बढ़कर पते की कहने वाला कोई दूसरा नहीं। हाँ, शेक्‍सपीयर के बाद किसी को स्‍थान मिल सकता है तो वह विक्‍टर ह्यूगो को ही मिल सकता है। परंतु फ्रांस वालों का कुछ और ही मत है। वे विक्‍टर ह्यूगो को ही सर्वश्रेष्‍ठ स्‍थान देते हैं। उससे बढ़कर दूसरे को नहीं समझते। सबसे बढ़कर कोई भी हो परंतु इसमें संदेह नहीं कि विक्‍टर ह्यूगो चोटी के आदमियों में से थे। वे बड़े प्रतिभाशाली लेखक थे। भाषा और भाव, दोनों, उनके इशारे पर नाचते थे। कठिन-से-कठिन भाव को सरल-से-सरल ढंग से प्रकट करना, ऊँची-से-ऊँची बात को साधारण-से-साधारण बुद्धि के समझने के योग्‍य बना देना, सूक्ष्‍म भावनाओं के सूक्ष्‍म-से-सूक्ष्‍म संग्रामों का जीवित चित्र आँखों के सामने खींच देना, नाना प्रकार की मनोवृत्तियों को भाँति-भाँति के क्षेत्रों में विकसित और अविकसित रूप से अपना-अपना खेल खेलते सहज में दिखा देना और संसार के समस्‍त प्रश्‍नों पर, कठिन-से-कठिन समस्‍याओं पर, गिरे-से-गिरे हुए विषय पर, दीन-से-दीन जन के प्रति, हीन-से-हीन मन के संबंध में, सदैव और सब अवस्‍थाओं में, अधिक-से-अधिक सहृदयता और सदाशयता, सहानुभूति और प्रेम की दृष्टि से देखना और उसी प्रकार उन विषयों पर विचार करना और विचार करवाना विक्‍टर ह्यूगो की कृति की स्‍पष्‍ट विशेषता है। उनके पद्यात्‍मक ग्रंथ बहुत ऊँची कोटि के हैं। उनके अंग्रेजी अनुवाद नहीं देखे गये। शायद हुए ही न हों। हुए भी हों तो पद्यों के अनुवाद में वह आनंद कहाँ! कुछ नाटकों और उपन्‍यासों के अंग्रेजी अनुवाद निकल चुके हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने ह्यूगो के कुछ उपन्‍यासों के कुछ अनुवाद पढ़े हैं। ये उपन्‍यास आज और आभा, कल्‍पना की ऊँची उड़ान, और मन की रंग-बिरंगी अठखेलियों से इतने परिपूर्ण है कि उनके पढ़ने के पश्‍चात् आदमी अपने मन को पहले की अपेक्षा कहीं ऊँचा और कहीं अच्‍छा अनुभव करता है। इन उपन्‍यासों का गद्य कितने ही अच्‍छे कवियों के अच्‍छे पद्य से कहीं अच्‍छा है। ह्यूगो के उपन्‍यासों में एक का, और एक खास का नाम Les Miserables है। गजब की चीज है। शायद ही संसार-भर में उससे बढ़कर कोई उपन्‍यास हो। अंग्रेजी का प्रसिद्ध कवि स्विनवर्न तो स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहता भी है कि उससे बढ़कर कोई उपन्‍यास नहीं। तीन वर्ष के परिश्रम से यह ग्रंथ बना था। संसार के किसी प्रसिद्ध-से-प्रसिद्ध उपन्‍यास या नाटक को पढ़िये, या न पढ़िये, इसे पढ़ डालिये, और आप अनुभव करेंगे कि समय सफल हुआ, और बहुत कुछ मिला। संसार की बड़ी-बड़ी धर्म-पुस्‍तकें और सदाचार की शिक्षा देने वाले ग्रंथ एक तरफ और यह उपन्‍यास एक तरफ। रोचक इतना कि पंक्ति-पंक्ति पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। सहृदयता और समवेदना से इतना परिपूर्ण की उसका एक-एक पन्‍ना आपको ऊपर से ऊपर उठाता चला जायेगा। आरंभ करते समय आप अनुभव करेंगे कि हम पृथ्‍वी पर चल रहे हैं। अंत करते समय आप अनुभव करेंगे कि हम आकाश में उड़ रहे हैं। सारा संसार हमारे हृदय की विशाल छाया से आच्‍छादित है, और दीन-से-दीन जन के आलिंगन के लिए हमारी आत्‍मा आगे बढ़ती चली जा रही है। गद्य है, परंतु पद्य से कम नहीं, और उसके उत्‍कृष्‍ट अंशों का अनुवाद कठिन और अत्‍यंत कठिनतर है। ह्यूगो के अन्‍य उपन्‍यास इतने ऊँचे नहीं, परंतु हैं सब अपने-अपने ढंग के निराले।

विद्यार्थीजी फ्रांसीसी भाषा के महान साहित्‍यकार विक्‍टर ह्यूगो के अनन्‍य उपासक थे। उनकी दो कृतियों- 'ला मिजराब्‍ल' और 'नाइंटी थ्री'- के संक्षिप्‍त रूपांतर विद्यार्थीजी ने अपनी जेल यात्राओं के दौरान क्रमश: 'आहुति' और 'बलिदान' नाम से किये थे। 'बलिदान' का प्रकाशन 1922 में उनके जीवनकाल में ही हो गया था। उसकी भूमिका का यह संक्षिप्‍त अंश 8 अक्‍तूबर 1922 को साप्‍ताहिक 'प्रताप' में प्रकाशित हुआ था।


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