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निबंध

सुगमता की माया
गणेशशंकर विद्यार्थी


काम करने के दो मार्ग हैं। एक तो यह कि आगे बढ़ा जाये, परंतु आदि से लेकर अंत तक नैतिक आधार न छोड़ा जाये। दूसरा यह कि, काम हो, और,‍ फिर चाहे जिस तरह, नैतिक आधारों के बल से या उन्‍हें छोड़कर। पहले ढंग से काम करने वाले अपनी दृष्टि के सामने नैतिक सिद्धांतों को रखते हैं। वे इन उसूलों के बल जीते हैं और उन्‍हीं पर मरने के लिए तैयार रहते हैं। वे उसूलों पर शहीद होकर अपनी लाशों का जीना तैयार करते हैं और ऊपर चढ़ने की लालसा रखने वाले पथिक को इस जीने पर कदम रखते हुए आकाशचुम्‍बी चोटी पर पहुँच जाने का प्रबल संदेश देते हैं। दूसरा मार्ग पास का है। दूर तक चलकर यात्रा तय करने की इच्‍छा नहीं की जाती। सुगमता ही का सदा सहारा लिया जाता है। सिद्धांतों के लिए रूकने या ठहरने की आवश्‍यकता नहीं। जिस ढंग को तुम घृणित समझते हो, यदि उससे भी तुम्‍हारा काम होता-सा दिखायी पड़े- जो कभी यथार्थ में नहीं होता, क्‍योंकि आचरण की यह विषमता उसी ढंग की एक के बाद दूसरी नयी पहेली खड़ी किये बिना नहीं रह सकती - तो मत चूको, फौरन प्रहार कर दो। मनुष्य से पशु और अंत में पशु से भी गिरे हुए बन जाओ।

पहला ढंग मन को ऊपर चढ़ने के लिए मार्ग देता है, दूसरा, अंत में उसे नीचे उतरने के लिए विवश करता है। पहला, समाज में विश्‍वास और निर्भयता का साम्राज्‍य स्‍थापित करता है, दूसरा मनुष्य को मनुष्य पर बिल्‍कुल अविश्‍वास करना सिखाता है और समाज में भय और कायरता का संचार करता है। संसार में नाना प्रकार के मनुष्य हैं। इसलिए, काम करने की ये दोनों प्रणालियाँ पहले भी चलती रहीं और आगे भी चलती रहेंगी। परंतु पहली प्रणाली सदा श्रेष्‍ठ समझी जाती रही और दूसरी प्रणाली को वह दर्जा कभी नसीब नहीं हुआ। अब गहरा परिवर्तन हो रहा है। आदर्शों पर मरना और उनके लिए ही जीना उन लोगों की दृष्टि में केवल मूर्खता है जिन्‍हें सुगमता प्रिय है और जो हाथ के पास का लाभ देख सकते हैं और जिनकी संघर्षण और प्रतिद्वंद्विता आदि वर्तमान काल की चहल-पहल की बातें सुगम लाभों की प्राप्ति को और भी सरपट दौड़कर चलने की शिक्षा देती हैं। वर्तमान युग इन्‍हीं भावनाओं का युग है। संसार की समस्‍त शक्तियाँ इन्‍हीं भावनाओं की उपासना के लिए आगे बढ़ती जा रही है। राजनैतिक विकास की इस समय सब कुछ है। राजनैतिक सत्‍ता ही इस समय सारी सत्‍ता की जड़ है। जो इस समय राजनैतिक आंदोलनों का कर्ता है, वही जगद्गुरु है। लोग उसके चरणों पर सिर रखते हैं और अपनी आत्‍माओं को उसके हाथ सौंपते हैं। संसार में अंधी भेड़ की यह चाल सदा रही है और इसीलिए कोई आश्‍चर्य नहीं, यदि आज भी वह हो, यद्यपि दूसरी ही दिशा में। परंतु क्षणिक लाभ, सुगमता, राजनैतिक प्रपंचों और उथले जीवन की उपासना के लिए दौड़ पड़ने के पहले इस देश के उन लोगों को कुछ सोच लेने की आवश्‍यकता है जिन्‍हें अपने देश की सभ्‍यता का ज्ञान है और जो यह भी समझते हैं कि सब वे लाभ जो लाभ के सदृश दीख पड़ते हैं, यथार्थ में उसी प्रकार लाभ नहीं हैं जैसे कि वे सब चमकदार टुकड़े सोने के टुकड़े नहीं हैं, जो सोने की भाँति चमकते हुए दिखायी पड़ें। संसार की अच्‍छी बातों को हम लें, परंतु लेने वाले इतनी होशियारी अवश्‍य करें कि कहीं ऊपरी चमक-दमक पर रीझकर वे अच्‍छी चीजों के स्‍थान पर नकली न उठा लें, कहीं सात्विकता के स्‍थान पर र्धूता का और वीरता और निर्भयता के स्‍थान पर कायरता और भय का सौदा न हो जाये। कहीं यह न हो कि सर्वस्‍व ही दाँव पर लगा दिया जाये। हृदय की बाजी लगी हो तब हम सब खो बैठें और बदले में जो कुछ मिले, वह इतना थोड़ा हो कि उसका स्‍थायी मूल्‍य कुछ भी न हो!

हम एक परिवर्तनशील युग में से होकर गुजर रहे हैं। अच्‍छे आदमी अभी तक अच्‍छे ही कहे जाते हैं और बदमाशों को अब भी बदमाश कहा जाता है। परंतु व्‍यक्ति के लिए जो काम बुरा है, वह इस युग में व्‍यक्तियों के समूह के लिए बुरा नहीं समझा जाता। चोरी करने वाला व्‍यक्ति निदंनीय और दंडनीय है, परंतु डाका डालने वाला और दूसरों का माल उड़ाने वाला व्‍यक्तियों के समूह- राष्‍ट्र-बुरा नहीं कहा जाता। नहीं, दशा तो यह है कि लोग ऐसा करते हुए खुश होते हैं। यदि आपका राष्‍ट्र दूसरे राष्‍ट्र का धन या धरती हड़प कर जाये, तो आप खुश होंगे। अपने राष्‍ट्र की इस पापमयी प्राप्ति पर आँसू बहाने के बजाय उसे विजय और राष्‍ट्रीय उननति कहकर खुशी के शादियाने बजायेंगे। एक आदमी दूसरे को सताये तो वह बुरा और यदि एक कौम दूसरे की जड़ काटे, तो देशभक्‍त और राष्‍ट्रभक्‍त फूले अंग नही समाते। व्‍यक्तियों के लिए कानून है, परंतु व्‍यक्तियों के समूहों के लिए कोई कानून नहीं। इस कानून के बनने की आवश्‍यकता है, परंतु वह बने भी कैसे? अपनी सुगमता के ध्‍यान में सभी दीवाने हैं। अपना मतलब साधना ही सबका परम उद्देश्‍य रह गया है और उसी ओर आने के लिए सब वर्तमान संसार के कर्ता-धर्ता संसार-भर को पूरा निमंत्रण दे रहे हैं। संसार उनका निमंत्रण स्‍वीकार कर रहा है। उन्‍हें युग का संस्‍थापक मानता हुआ वह उनके चरणों में दीक्षा लेने के लिए बैठता जा रहा है। वह भक्ति से अपना हृदय उनके सामने भेंट स्‍वरूप रखता हुआ शपथ-सी खाकर कह रहा है कि हृदय तुम्‍हारे हाथों बेचता हूँ। अक्‍ल भी उधर ही जायेगी, जिधर तुम हाँकोगे। सुगमता के नाम पर, वर्तमान संसार की परम संचालिनी कूटनीति के नाम पर, मनुष्य को मनुष्य से दूर रखने, उसे अविश्‍वसनीय और अशांति की मूर्ति बनाने, उसे निर्भय और निडर अवस्‍था से सदा परे रखने की तैयारी करने वाले वर्तमान महामंत्र के नाम पर जो कहोगे वही करूँगा। मुर्दनी को यदि तुम जिंदगी कहोगे, तो उसे जिंदगी कहूँगा और जिंदगी को यदि मुर्दापन का नाम दोगे तो उसे वैसा ही मानूँगा। हमारा देश इस जगद्व्‍यापी लहर से बच नहीं सकता। एक बार संसार-भर के सिर पर से निकल जाने वाली यह लहर सर्वत्र फैलेगी, और जोर से फैलेगी, परंतु मनुष्य के स्‍वभाव की लचक और घुमाव का ध्‍यान और अवश्‍यम्‍भावी बातों का विचार रखते हुए भी इस भूमि के आदर्श अपने प्रबल संस्‍कारों और अंत में होने वालेी प्रतिक्रिया के बड़े विश्‍वास पर इस भूमि के निवासियों से कहते हैं कि बहती हुई लहर में मत बह जाओ। कूटनीति की सुगमता और मन के स्‍वास्‍थ्‍य की अवहेलना ने किस प्रश्‍न को आज तक हल किया, और किस देश और किस जाति के स्‍वास्‍थ्‍य को ऊँचा और बलवान बनाया? मृगतृष्‍णा के प्रलोभन से संसार में अनेक हिरनों ने बड़ी-बड़ी उछालें मारीं, परंतु वे प्‍यासे के प्‍यासे ही रहे। राजनैतिक शरीरों में जिसके प्रयोगों ने विष का प्रसार ही किया, रोग कभी नहीं हटा। कूटनीति, छल, प्रपंच, धोखाधड़ी, लूटमार के वृक्षों के फल कभी मीठे नहीं हुए और भूमि पर पड़कर वे सदा रक्‍तबीज ही सिद्ध होते रहे। फिर, ऐसी अवस्‍था में, क्रियाशीलता के लिए वर्तमान टेढ़ी शक्तियों के साथ, घर और बाहर दोनों स्‍थानों की विषमयी प्रणालियों के साथ, संग्राम करने की विशेष आवश्‍यकता रखते हुए भी, दलदल में फँसने और दलदल फैलाने के फेर में पड़ने के लिए क्‍यों आतुर हो!


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हिंदी समय में गणेशशंकर विद्यार्थी की रचनाएँ