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कहानी

एक शब्दहीन नदी
शैलेश मटियानी


'माई डियर हंसा!'

'ले प्यारी, इस दफा तेरे आर्डर की मुताबिक, खुले पोस्टकार्ड की जगह पर, बंद इंगलैंड लेटर भेज रहा हूँ। हकीकत तो यही हुई कि लवलेटर जरा सेक्रिट किस्म की वस्तु ही हुआ। इसमें दिल की गहराइयों को उतारना ठहरा। खैर, अब इस मुहरबंद चिट्ठी के आखरों को तेरे सिवा कोई दूसरा नहीं पढ़ सकेगा, प्यारी! वैसी भी तेरे दिल में छिपे मजमून के हरफों को एक सिर्फ मैं ही पढ़ सकने वाला ठहरा! सामने वाली खैरातीराम अस्पताल की बड़ी घड़ी में छोटी सुई एक-दो-ओ-करेक्ट तीन पर पहुँची हुई और बड़ी सुई चार, पाँच-छै से सात पर। ऐसे नाजुक टैम में मैं यहाँ अपने बोस की कोठी के बरामदे के फर्श पर बैठा हुआ...'

लिखते-लिखते, शंकरसिंह के हाथ का 'होल्डर' अपने-आप रुक गया। अगर हंसा को यह पता चल गया कि उसका शंकर सिंह रात-भर बरामदे के फर्श पर बैठा रहता है, तो? 'फर्श पर बैठा हुआ' को कई बार काटकर, शंकर सिंह ने फिर शुरू किया -

'मैं ऐसी नाजुक रात में पलंग पर लेटा हुआ बेचैनी से करवटें बदल रहा। ...सिर के ऊपर हरे नियोन बल्ब की रोशनी फैली हुई और दिल के अंदर तेरी याद का बल्व जल रहा।

'ओहो, इस समय तुम्हारे गाँव में मइया अष्टभुजा के मंदिर की पहाड़ी के आस-पास चंद्रमा जल रहा होगा... मगर तू तो खुद इस समय अंदर सोई हुई होगी, क्यों डियर? ज्यादा-से-ज्यादा तूने सोते समय मिट्टी का दिया जलाया मगर तेल ज्यादा जलने के डर से महतारी ने उसे भी साँझ-साँझ ही बुझा दिया होगा? यहाँ सबेरे-सबेरे तक हाई पावर बिजली के बल्ब जलते रहते मेरे बौस की कोठी में। अलबत्ता बारा-एक बजे के बाद सिर्फ इस बरामदे में हरा बल्ब जलता रहता जिसके फर्श पर बैठा हुआ मैं इस समय तुझको यह इंगलैंड लेटर लिख रहा! कल सबेरे ही इसको लेटरबाक्स में ड्रोपिंग कर आऊँगा प्यारी! और कल सोला, परसों सत्तरा या नरसों अठारह तारीख जुलाई मंथली तक तो यह लव-लेटर तेरे पास तक जरूर पहुँच जाएगा! ...और फिर फस्ट अगस्त की रात को मेल बस से, जिसको कि पहाड़ी में डॉक की गाड़ी कहते लोग... तो उसी डॉक गाड़ी से मैं खुद भी थुरू तेरे पास को रवाना हो जाऊँगा और सेकिंड सितंबर को सुबेरे मुरादाबाद, फिर वहाँ से हलद्वानी में चेंजिंग कर, रात को अलमोड़ा में किसी रॉयल होटल में काट करके, थर्ड की मारनिंग में वहाँ से भी थुरू रवाना होकर आफटरनून तक बानणी मइया की कृपा से तेरे पास पहुँच जाऊँगा जरूर!'

भावाकुलता के तीव्र प्रवाह में, इस बार, शंकर सिंह भूल ही गया कि पहले एक बार 'फर्श पर बैठा हुआ' काट चुका था। उसकी लेखनी आगे चलती रही -

'डियर, मेरे लिए खास अपने हाथों से भात और दाल-टपकिया पकाकर तैयार रखना। ...मन तो यही करता कि इसी वक्त सीधे, यहाँ से थुरू सफदरगंज के ऐरोड्रम पर पहुँच करके हवाई जहाज में बाई एयरफोसिंग तेरे पास पहुँच जाऊँ, मगर मन की बेचेनी और तन की मजबूरी में किसी कवि ने भी यही कहा कि - माटी तो यहाँ रही, मगर प्राण रहे पिया के पास! ...इसी सिलसिले में एक दोहा किसी और कवि ने यह भी ठीक ही जैसा कह रखा ठहरा कि - बिधना गति ऐसी करो, आप बसे परदेश - हंसा उड़ि-उड़ि परबत जावे, धरि कागा का भेष। धरि कागा का भेष रुलावे इन ‍अंखियन को...'

चिट्ठी पर गिरे आँसू शंकर सिंह ने बड़े जतन से पोंछ लिए।

जब-जब हंसा की याद आती है, लगता है, किसी ऊँची पहाड़ी पर से नीचे को झुकती गई घाटी में से परदेश को जाते शंकरसिंह को लगातार आवाज देता जा रहा है कोई। घर छूटे अब चार वर्ष हो रहे हैं, मगर घाटी में शोर मचाती नदी-जैसी हंसा की आवाज निरंतर उतने ही वेग से आत्मा की गहराइयों में गूँजती रहती है। इस गूँज में भाषा पानी में पड़े नमक की तरह घुली मालूम पड़ती है। जब जैसा चाहे शंकरसिंह, तब वैसे शब्द छाँटकर अलग कर सकता है, लेकिन इसमें वक्त लगता है।

वतन की रसीद पर सिर्फ 'दस्तखत शंकरसिंह चौकीदार' लिखते में ही अटक-अटक-कर आपस में टकरा जाने वाली उँगलियाँ हंसा को लंबी-लंबी चिट्ठियाँ लिखते समय इतनी हलकी हो जाती हैं कि लगता है, भीतर की गूँज पोरों से फूटती चली जा रही है। शब्दहीन गूँज, जो पर्वतों के बीच से नदियों-जैसी बहती चली आती है। जब-जब हंसा याद आती है, आँखों की काली पुतलियाँ शिलाजीत की चट्टानों की तरह पसीजती मालूम होती है। जीवन पहाड़ हो जाता है।

जागते-ए-ए रहो-ओ-ओ...

उधर से डबलस्टोरी कॉलोनी के चौकीदार की बुलंद आवाज रात के सन्नाटे को चीरती आई, तो मिस्टर अहलूवालिया का ऊपर के बरामदे में सोया बुलडॉग भी जोर-जोर से भौंक उठा।

होल्डर-दवात एक ओर जल्दी-जल्दी सरकाकर, शंकरसिंह उठा और टार्च लाठी लिए बरामदे से बाहर निकल आया। चौकीदार की आवाज और बुलडॉग का भौंकना सुनकर मिस्टर अहलूवालिया अक्सर ऊपर के बरामदे में निकल आते हैं। नीचे झाँककर शंकरसिंह को चौकीदारी के वक्त में चिट्ठी लिखता हुआ देख लें, तो शायद नौकरी से ही निकाल दें।

संभव तो यह भी हो सककता है कि वो नीचे उतरकर, शंकरसिंह के हाथों से चिट्ठी लेकर अपनी आदत के अनुसार, पूरे साहबी लहजे में जोर-जोर से पढ़ना ही शुरू कर दें? पहली ही पंक्ति पढ़ें - माई डियर हंसा! ...और तुरंत बिगड़ उठें कि - ऐ पहाड़ी, क्या तुमको हमने यहाँ लवलेटर लिखने को रखा है बंगले पर?

इधर मिस्टर अहलूवालिया का अस्तित्व शंकरसिंह के लिए ईश्वर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बन चुका है। अगले महीने, दो महीनों का अग्रिम वेतन और पंद्रह दिनों की छुट्टी देने का आश्वासन उन्होंने शंकरसिंह को दे रखा है। जब से यह आश्वासन मिला है, शंकरसिंह को समय अपनी आँखों में तुलसी के बिरवे पर फैले कद्दू की बेल के जाल-जैसा भारी लगने लगा है और इसे एकदम जल्दी-जल्दी हटाने के प्रयत्नों में उसकी अंतरात्मा तेज धूप में खूँटे से बँधे-बँधे उछल-कूद मचाने वाले लैरुआ बछड़े की तरह हाँफ-हाँफ उठती है। समय व्यर्थ ही तोड़े गए कद्दू के पत्तों की तरह हथेलियाँ और आँखों पर फैलता इन्हें ढँकता चला जाता है। एक-एक क्षण ऐसे टूट-टूट के बीतता है कि पतझड़ के असंख्य पत्तों से ढँके छोटे-से सरोवर जैसी लगने लगती है जिंदगी... और गोता मारकर सतह पर फैले पत्तों को हटाती मछली की तरह, शंकरसिंह भी कहीं अपने ही भीतर डुबकी लगाने को विवश हो जाता है।

दूर-दूर तक देखने पर भी हंसा की सूरत, काँपते होठों पर रखी हथेली-जैसी, आँखों की पुतलियों पर से परे हटाए नहीं हटती। इतने बड़े दिल्ली शहर में शंकरसिंह को अपना अकेलापन काटना कठिन हो जाता है। कुछ ऐसी वीरानी-सी अनुभव होती है कभी-कभी कि आदमियों की बस्ती में का घुघ्घु होकर रह जाता है शंकरसिंह।

मिस्टर अहलूवालिया की कोठी में आने से पहले, शंकरसिंह, डबल-स्टोरी कॉलोनी में चौकीदारी करता था और रात-भर जागता तमाम घरों में कहीं ऐसी जगह टटोलता फिरता था, जिसमें वह भी अपनी हंसा को रख सके। ...और अगर कहीं ऐसा सचमुच संभव हो, तो सारी कॉलोनी का एक चक्कर काटने के बाद 'जागते रहो-जागते रहो' की पुकार लगा कर, खुद भी हंसा के पास आकर आँख मूँदे सो जाने का आनंद कितना बड़ा होता? मगर शंकरसिंह के लिए सुख तो किसी मानस से भटके हंस की तरह ऐंचोली के ऊँचे पर्वत पर छूट गया है।

हंसा से ब्याह हुआ था कि तीसरे ही महीने गाँव से निकल आया। घर में दो छोटे भाई और विधवा माँ। अन्न तो ज्यों-त्यों जुट जाता खेती से, मगर और कुछ नहीं। पहाड़ की उपराऊँ खेती बकरी की धिनाली हुई। ...और शंकरसिंह चाहता कि उसकी हंसा शहर की लड़कियों की तरह नए-नए फैशन के कपड़े पहने। ठहरी भी कितनी सुंदर और कैसी मायावती! शंकरसिंह कोई दानासयाना और बुजुर्ग तो नहीं ठहरा, लेकिन इतना जरूर अनुभव किया कि एक कुछ अद्भुत-जैसी उम्र हुई। मन पंछी हो जाने वाला हुआ। कुछ ऐसी मनोदशा हो जाने वाली हुई कि जितना पंछी आकाश में, उतना तो हम धरती पर ही उड़ रहे!

शादी से पहले शहर के एक होटल में नौकरी कर चुका था वह और वहाँ चाट खाने को आने वाली कॉलेज की रंग-बिरंगी पोशाकें उसकी आँखों पर से अभी भी उतरी नहीं। तब तो सचमुच ही उम्र कुछ वैसी हुई, जिसमें कि सपने और हकीकत के बीच फर्क कठिन होने वाला हुआ। शंकरसिंह छब्बीस-सत्ताईस का रहा होगा। हंसा उन्नीस वर्षों की ठहरी!

...और शंकरसिंह चला आया, कभी हंसा और माँ तथा भाइयों के लिए ढेर सारे कपड़ों से भरे संदूक लेकर घर लौटने का एक ऐसा सपना आँखों में बसाकर जो लगभग उस हर पहाड़ी युवक की आँखों का सपना होता है, जिसे दिल्ली, बंबई, कलकत्ता और लखनऊ-कानपुर किसी मायानगरी से कम नहीं लगती। जगह-जगह मोटे तागे से सी-सीकर, टल्ले लगा-लगाकर पहने जाने वाले कपड़ों से उसे वितृष्णा-सी होती और वह काले गाढ़े का घाघरा और मामूली किनारी-दार धोती पहने चलने वाली हंसा को कल्पना के रंग बिरंगे लेडीज सूट या बढ़िया साड़ी-ब्लाउज पहनाकर अंदाजा लगाने वाला हुआ कि - देखें, अब कैसी लग रही। पिता के सिर पर न होने से, परिवार की चिंता भी उस पर ही हुई। पिता की मृत्यु के ही कारण तो शादी भी कुछ देर से हुई। इसीलिए, सिर्फ इसीलए, वह अपने गाँव की उन सौंदर्यमयी घाटियों को हंसा की तरह ही पीछे छोड़ आया, जो हंसा के आने के बाद से स्वयं वधूवेश में सजी-सी मालूम पड़ने लगी थीं।

दो वर्ष तो कभी बेकार भटकने और कभी थोड़े रुपयों की नौकरी करने में ही बीत गए। लगातार दो वर्ष शंकरसिंह उन संकटों पर सिर धुनता ही रह गया, जिनके बीच मकड़जाले में मक्खी की तरह भिनभिनाते रह गया वह। दिल्ली के बड़े स्टेशन पर होटल की नौकरी करने के दिनों वह बार-बार, संदूक और अटेचियाँ लेकर रेलों की ओर बढ़ते यात्रियों को देखता और शिलाजीत की चट्टानों में दरारें पड़ जातीं। सपनों की व्यर्थता को उन दरारों से लगातार छीजते देखते ही रह जाने के संताप में शंकरसिंह निराश होता गया। धीरे-धीरे उसे यही अनुभव होने लगा कि ऐसे ही वर्ष दर वर्ष बीतते जाएँगे और हंसा हमेशा के लिए छूट जाएगी। जैसे दिल्ली पहुँचते ही हिमालय-जैसा विशाल पर्वत ओझल हो गया, 'हँहो, हँहो' कहने वाली पहाड़िन भी सपनों की सामग्री बनकर ही तो नहीं रह जाएगी? फटा-पुराना जैसा भी पहनती थी, आँखों के सामने तो रहती थी। अपनी औकात से बाहर सपनों के व्यामेह में खुद शंकरसिंह ही उसे छोड़ आया और आज उसे हाथ बढ़ाकर छूना सपना हो गया।

जब परदेश से लौटकर, रेशमी साड़ियाँ वगैरह जाने की बात हंसा से कही थी, तब उसने उलटे यह उलाहना दिया था कि रेशम की तो तब जरूरत होती हे, जब एक-दूसरे के प्राणों को लपेटते चले जाने वाली भावनाओं के तार नष्ट हो जाएँ। ...मगर उतावला शंकरसिंह उलाहने को झेल नहीं सका, उलटे चुनौती के रूप में लिया कि शायद, हंसा समझती है कि उसके लिए रेशमी कपड़े जुटा सकने की क्षमता शंकरसिंह में नहीं। इस चुनौती को झेलते-झेलते दो वर्ष बीत गए। एक चिट्ठी भी घर को नहीं भेज सका शंकरसिंह। कई जवाबी पोसटकार्ड जेब में पड़े-पड़े फटते चले गए।

पहली चिट्ठी शंकरसिंह ने डबलस्टोरी कॉलोनी में चौकीदारी मिलने पर भेजी थी। जवाबी पोस्टकार्ड के दोनों कार्ड लिख-लिखकर भर दिए। फिर दूसरे ही दिन एक लिफाफा खरीदा और पिएले दो वर्षों में झेले को, उसमें ड्रम में भरे जाने वाले कूड़े की तरह डालता गया। एक पत्र में दिल्ली शहर में आकर तरह-तरह के धंधों में व्यस्त और फिर साझेदारी में बिस्कुट-नमकीन की दुकान खोलने पर, उसमें बहुत ज्यादा घाटा हो जाने की बात लिखी, इसलिए कि हंसा वास्तविकता से परिचित न हो सके। फिर एक बड़े कारखाने में हेड वाचमैन बन जाने की सूचना भी उसने दी। दिल्ली शहर की भव्यता का ऐसे चित्रण किया, जैसे किसी काल्पनिक इंद्रलोक का वर्णन कर रहा हो। मूल में तृष्णा इतनी कि हंसा यों न समझे कि शंकरसिंह निकम्मा और अभावग्रस्त है। पिछले दो वर्ष से ज्यों-त्यों पचीस-पचास रुपए महीने घर भेजने लगा था। दो-तीन बार कुछ कपड़े भी भेजे। पहली बार सिल्क की साड़ी भेजते समय आवेग में उसकी आँखें भर आई थीं और वह केवड़े के पत्ते में अटके पानी-जैसे आँसुओं के दर्पण में सिल्क की साड़ी पहनती हंसा को देखता और आँखों में उसकी छवि लिए नई दिल्ली की सड़कों पर घूमता रहा था। तरसता रहा था कि काश, हंसा को सचमुच नई दिल्ली की शानदार सड़कों पर साथ घुमा सकता। ओठों में लिपिस्टिक लगाए, हाथ में 'पर्स' लिए अपने चपरासी पतियों के साथ जाती पहाड़नों को अथाह कौतूहल के साथ नई दिल्ली की शानदार दुकानों की सैर करते देखकर, शंकरसिंह बेचैन हो उठता। 'लिपिस्टिक' खरीदकर, हंसा की फोटो को अपने-सामने रखकर, उसके होठों को रँगता। कार, टैक्सी या स्कूटर का 'हार्न' सुनते ही एकदम चौंककर, अपने पति की पीठ से सट जानेवाली पहाड़नों को देखकर, शंकरसिंह को लगता, कोई उसकी पीठ से भी लग गया है और वह बिना कुछ सुने, अपने-आप ही चौंक उठता।

एकांत के सन्नाटों में से उसे हंसा के साथ गाँव में बीते वो क्षण अक्सर याद आते, जबकि वह खेत जोतता होता और पीछे-पीछे ढेले फोड़ती या बीज बोती हंसा चल रही होती। वह लकड़ियाँ फाड़ता, हंसा बड़े जतन से गट्ठर बाँधती। वह मछलियाँ मारता और हंसा बड़े उल्लास से उन्हें इकट्ठा करती। हंसा चिलम भर देती और वह सयानों की तरह गुड़गुड़ाता... स्मृति के ऐसे सघन क्षणों में हंसा को चिट्ठी लिखते समय, उसे लगता कि रोम-रोम से असंख्य शब्द फूटने को हो आए हैं।

आज और भी अधिक भावुक हो आया है उसका मन, क्योंकि अगले ही महीने घर जाने की संभावना को सँभाले नहीं पा रहा। गाँव के आस-पास की पहाड़ियों, घाटियों और नदियों का एक-एक दृश्य आँखों में उभर-उभर आ रहा है। अचानक ही भ्रम होता है कभी कि वह गाँव के मोड़ तक पहुँच गया है और तालाब के किनारे खड़ी भैंसों को पानी पिलाती हंसा उसे देखते ही हिरनी-सी व्याकुल भैंसों को जहाँ-का-तहाँ छोड़, उसकी तरफ दौड़ी चली आ रही है। दौड़ी चली आ रही है...

कोठी के कई चक्कर काट लेने के बाद, शंकरसिंह फिर चिट्ठी पूरी करने बैठ गया - 'बहुत जरूरी काम से जरा वाकिंग के लिए गया था, डियर, माफ करना! लौटा हूँ तो अपना कंठ प्यास से सूखा लग रहा और तू शीतल जल से भरा सरोवर! मगर मजबूरी दोनों तरफ ऐसी ठहरी कि तुम खुद भी प्यासी खड़ी दिखाई दे रही! किसी कवि ने भी क्या कहा है कि - मन उड़ता पंछी भया, उड़ता चला आकाश - हम सरवर को क्या कहें, सरवर खुद ही प्यासा! ...एक सपना क्या देखा, डियर, कि एक सीनरी में तुम भैंसों को नहलाती छीनाताल के गहरे पानी में खड़ी। भैंस को नहलाते में रेशमी साड़ी का पल्लू नीचे को गिर गया और मुझे सामने मुस्कराता खड़ा देखकर, तुमको कहाँ को छिपूँ, कहाँ को भाग जाऊँ हो रही। माफ करना। मेरी गति भी वैसी ही हो गई - हरे रामा, बिरहा अगन लगाई ऐसी, तन-मन दियो जलाय! सरवर के रहते भी पंछी प्यासा उड़ि-उड़ि जाय...।'

इतना लिखते ही शंकरसिंह को याद आया कि पिछले पोस्टकार्ड में उसने लिखा था - 'तेरे बिन सारा जग सूना, दिल कैसे बहलावें। सूखा सरवर, प्यासे पंछी, प्यारी, उड़-उड़ जावें।' और उसके ही उत्तर में हंसा का उलाहना आया था कि - 'छि छि! क्यों हो, तुम्हारे दिल्ली शहर में बंद लिफाफे नहीं मिलते क्या, जो तुम ऐसी-ऐसी बेशर्म बातें खुले पोस्टकार्ड में लिखते हो? छोटे देवर कहते सबसे कि - हमारे दाज्यू ने भौजी को प्यारी-प्यारी का दोहा लिख मारा!'

इसीलिए तो आज शंकरसिंह अंतर्देशीय पत्र ले आया। पेन भी ले रखा है, मगर प्राइमरी से मिडिल कक्षा छै की पढ़ाई तक स्याही में कलम डुबोकर लिखने का ही अभ्यास रहा है। पेन से लिखावट अच्छी नहीं बन पाती। जी निब वाले होल्डर से छोटे-छोटे अक्षर बनाने के प्रयत्नों के बावजूद, अब सिर्फ 'तुम्हारा लवली हसबेंड शंकरसिंह' लिखने-भर को ही जगह शेष रह गई है। खैरातीराम अस्पताल की बड़ी घड़ी की छोटी सुई पर पहुँच गई। गैरेज में सोए हुए दो दूसरे नौकर जागने लगे। चिट्ठी लेटर-बॉक्स में छोड़ने के बाद, शंकरसिंह गैरेज में सो जाएगा।

'उठो, हो!'

शंकरसिंह चौंककर उठ बैठा। घर पहुँचे कई दिन हो गए, मगर रात को अब ठीक से वहाँ भी नींद नहीं आती। सबेरे जब हंसा दूध-चाय पीने को उठाती है, तो शंकरसिंह चौंक उठता है। उसे लगता है गैरेज से कार बाहर निकालते हुए सरदार हरबंससिंह चिल्ला रहा है - ओए, ओ गोविंदबल्लभ दे पुत्तर, जरा परे-परे तो सोया कर बादशाओ!

यों इन दिनों शंकरसिंह प्रायः हंसा के निकट ही मँडराता रहा है। उसे बताता रहा है कि दिल्ली शहर कैसा और वहाँ औरत-मर्द कैसे एक-दूसरे के हाथों को हिलाते, सीटी बजाते, फिल्मी गाने गाते हुए सैर करते हैं। अपने हाथों हंसा के ओठों में लिपिस्टिक लगाता है शंकरसिंह और साड़ी का पल्लू सिर पर से उतारकर पीठ पर डाल देता है। कलाकारों की सी अदा में बालों का जूड़ा बाँधकर, उसमें प्लास्टिक के फूल खोंस देता है। ऊँची एड़ी के सैंडिल पहनाकर, कमरे के अंदर ही चलवाता है। हंसा टोकती है, झिझकती है, तो डाँट देता है कि घर से ही सब कुछ सीख कर नहीं जाएगी, तो वहाँ उसके दोस्त लोग हँसी उड़ाएँगे कि कैसी गँवार औरत से शादी कर लाया।

इतना ही नहीं, शंकरसिंह यह भी समझाता रहता है कि दिल्ली शहर में घूमते-फिरते समय सड़क कैसे पार करनी चाहिए। पीछे से कार का हॉर्न सुनाई दे, तो पीठ से चिपक जाने की जगह, कैसे शंकरसिंह का हाथ पकड़ते हुए थोड़ा-सा पीछे मुड़कर देख लेना और धीरे से मुस्कराते हुए हाथ में थमे पर्स को हिला देना चाहिए। किसी बड़े शानदार होटलों में लंच और डिनर लेते समय कैसे काँटे-चम्मचों का इस्तेमाल करे। पहले 'टोमेटो सूप' लेने के बाद, फिर खाना शुरू किया जाए। खा लेने के बाद, जोर-जोर से पिच्च-पिच्च की जगह, हलके से कुल्ला करके, रेशमी रूमाल से ओठों को थोड़ी देर तक थपथपाते रहे। मिलने-जुलने पर दूसरों से हैलो-हैलो और 'थैंक्यू-थैंक्यू' कहे। कोई जरूरी काम पड़ जाए, जैसे कभी बच्चा ही होने वाला हो, तो 'लेबर पेन' उठने पर, घबड़ाने की जगह, अहलूवालिया साहब के ड्राइंगरूम वाले टेलीफोन नंबर सिक्स फोर थ्री फाइव नाइन से कैसे टेलीफोन करके शंकरसिंह को घर बुला लिया जा सकता है।

...मगर पिछले चार वर्षों में जितना-कुछ खुद देखा-सुना और सीखा है शंकरसिंह ने, पिंजरे में टँगे तोते की तरह हंसा को सिखाते-सिखाते कभी-कभी खुद ही एकदम चौंक उठता है। हंसा को दिल्ली अपने साथ ले जाने की तृष्णा तो मन में जरूर अपार है। मगर संभावना? कुछ डेढ़-दो सौ मिलते हैं। कोठी में सिर्फ गैरेज या बरामदों में सोने की इजाजत है नौकरों को, वह नौकरों के बीच हंसा को कहाँ रखेगा? कोठी के बहुत से कमरे बंद पड़े रहते हैं, मगर शंकरसिंह के लिए तो उनके दरवाजे खुले रहने पर भी बंद रहते हैं। कहीं अलग कमरा ले ले तो किराया इतना कि फिर गुजर कैसे होगी। बड़े-बड़े होटलों में लंच और डिनर की जगह, घर में आटा-चावल-दाल भी दुर्लभ होते जाएँ, तब क्या होगा? शहर घूमने के लिए कार टैक्सी छोड़ बस का किराया भी नहीं होगा, तो क्या स्थिति होगी?

छुट्टी के शेष दिन तेजी से बीतते चले जा रहे हैं और शंकरसिंह यहाँ भी जैसे खुद अपने ही सपनों की चौकीदारी करता रह गया है।

हंसा सो जाती है, शंकरसिंह जागता रहता है। लगता है, रात के सन्नाटे को बार-बार कोई बुलंद आवाज चीर आती है - 'जागते रहो...ओ-ओ'... और शंकरसिंह के मन में एक साथ न-जाने कितनी तृष्णाएँ जाग उठती हैं... तब एकाएक ही आँखें आर्द्र हो जाती हैं और उसके सारे संकल्प-विकल्प राख हो जाते। वह सारे समुंदर में प्यासे हंसों की पाँत की भाँति उड़ता-उड़ता थक जाता है।

रात-भर का जागा शंकरसिंह सवेरे एकदम चौंकते हुए बैठता है - 'सतसिरी अकाल, सरदार साहब! 'और एक तरफ हटकर सोने लगता है। ...लेकिन तभी आँख खुली, तो पता चलता है कि दायाँ हाथ हंसा की पीठ पर सपने नहीं, हकीकत में है। हंसा की उपस्थिति का बोध होते ही, मन ग्लानि से भर जाता है। रात-भर शंकरसिंह यह कहने के इरादे को टूटे शीशे की तरह जोड़ता रहता है कि - 'हंसा, अब मैं दिल्ली शहर नहीं आऊँगा, इसी गाँव में रहूँगा तेरे साथ!' ...मगर सवेरे फिर सिगरेट होल्डर निकालता है, उसमें से अधजली सिगरेट निकालकर फेंकता हुआ, नई सिगरेट सुलगाता है और बड़ी नफासत से धुआँ छोड़ते और हंसा को हिलाते हुए कहता है - 'गुड मौरनिंग, डियर!'

आज भी सिगरेट-होल्डर निकालने लगा शंकरसिंह, तो याद आया कि सिगरेटे ही नहीं खत्म हुई हैं, बल्कि छुट्टियाँ भी खत्म होने को आ गईं। सिर्फ चार दिन और रह गए। ...और ...और लगता है, सिगरेट-होल्डर में अटके अधजले ठूँठ की ही स्थिति अब उसकी भी हो गई। सारा उल्लास राख होकर, रीतता चला गया। अब हंसा खुद लिपिस्टिक लगाए, सैंडिल पहने सामने आती है, तो भी डर-सा लगता है। आँखें अपनी भ्रांति को झेल नहीं पाती है। उसे एकाएक उदास देखकर, हंसा हँसती हुई 'हैलो-हैलो' कहती है, तो लगता है, जैसे कोई सुलगते अंगारों को हथेलियों पर चिपटा रहा है। उम्र आज भी कुल जमा कितनी है? इकतीसवाँ ही तो लगा है, ग्यारह गते उन्नीस सौ अट्ठारह से। ...मगर सपने ऊँचे हैं और साधन छोटे, तो जवानी में भी जर्जरता है।

सिर्फ सौ के आस-पास बाकी बचे हैं। अपने ही जाने को भी कसर पड़ सकती है। आते समय बहुत-से कपड़े और फालतू चीजें खरीद लाया था, अब अफसोस होता है कि कुछ कटौती की जा सकती थी। छोटे भाई रंगीन फिल्मी गानों की किताबें और किस्सा लैला मजनूँ को जोर-जोर से पढ़ने लगते हैं। भोली हंसा जूड़ा कसकर, प्लास्टिक का गुलाब खोंसती है। सिर पर पल्लू उतार, पीठ पर डाल लेती है और सैंडिल पहनकर, कमरे में चलने-फिरने लगती है। शर्म में डूबी पूछती है - क्यों हो तुम्हारी कुतुबमीनार की सीढ़ियों पर तो सैंडिल उतार कर ही चढ़ना पड़ता होगा?

और... और शंकरसिंह गाँव छोड़कर तुरंत भाग जाने को छटपटा उठता है। चौमास की हरियाली की तरह स्थान घेरती तृष्णाओं की व्यर्थता बहुत बुरी तरह कचोटती है। अपार तृष्णा की कुतुबमीनार की असंख्य सीढ़ियों पर शंकर सिंह नाम का एक लाचार बौना चढ़ना भी चाहे, तो आखिर कितनी मंजिलों तक जा सकता है।?

वह कब का जाग चुका था, हंसा आई, चाय रखकर चली गई, तो शंकरसिंह ने छोटे भाई किशन को आवाज देकर, बीड़ी का बंडल मँगवा लिया। अपने में ही खोये-खोये, उसने बीड़ी को सिगरेट-होल्डर में लगाया, तो नीचे गिर पड़ी। शंकरसिंह को लगा कि अब वह भी शायद हंसा के लिए ऐसे ही अनुपयुक्त हो गया। चारों तरफ इतने सपने फैलाकर, अकेले लौटता देखेगी हंसा, तो यह पहाड़ी नदी फिर पीठ-पीछे ही छूट जाएगी, और इसका शब्दों से परे का शोर इधर से उधर पछाड़ता रहेगा।

इतना वह बिल्कुल जानता है कि स्थिति समझा देने पर हंसा साथ ले जाने की जिद कदापि नहीं करेगी। उसने तो अपनी ओर से आग्रह भी नहीं किया था। वह साफ कह रही थी कि किशन की घरवाली अभी अयानी है और इजा अब कमजोर हो चली। शंकरसिंह ने ही उसे दिल्ली के अजीब-अजीब रंग-ढंग सिखाने शुरू किए। ...और अब अपने ही गढ़े सपने को हंसा की आँखों में टूटते देखना दुष्कर होगा? कितना दुखद होगा नितांत स्वाभाविक उत्साह और आकांक्षाओं में उफनती इस नदी को पीछे दारुण शोर मचाते छोड़ जाना, जिसमें से शब्द अलग करना कठिन होता है?

हंसा कपड़े धोने तालाब की ओर चली, तो शंकरसिंह घर पर ही रह गया। उसे लगता रहा कि हंसा शायद दिल्ली जाने के लिए ही सारे कपड़े धो रही है। वह साथ रहा तो लौटते में रास्ते में मिलने वाली औरतों-से अदम्य उमंग के साथ दिल्ली जा रहे होने की बातें करेगी और फिर जाने के दिन शंकरसिंह अकेला-अकेला विदा होने लगा तो क्या कुछ बीतेगी इस पर?

शंकरसिंह, बीड़ी पीता हुआ तालाब की ओर निकल गया। हंसा घुटने तक डूबी कपड़े धो रही थी। शंकरसिंह को याद आया कि कल ही तो उसने हंसा को समझाया था कि स्कर्ट कहाँ तक की पहननी होगी। उस समय हंसा लजा गई थी और इस समय शंकरसिंह शर्म का मारा गहरे ताल में डूबने को हो आया।

जैसे किसी चोर को स्थान दिए बैठा हो भीतर, एक नजर उसने चारों तरफ घुमाई। हालाँकि, मौसम था बीतते शरद का, लेकिन धूप चारों तरफ गहरी थी। नदी के आर-पार के खेत हरियाली में डूबे पड़े थे। बीच-बीच में पीली सरसों अपनी उपस्थिति को जैसे सबसे अलग जता रही थी। नदी-किनारे गाय, भैंस और बकरियों के झुंड अपने नित्यकर्म में जुटे थे। इस सारे परिदृश्य को शंकरसिंह ने जैसे क्षण मात्र में ही काफी दूर-दूर तक देख लिया। जैसे कोई इलहाम हुआ हो, वह एकाएक बोल उठा - 'हंसा... मेरी छुट्टी के तो अब सिर्फ चार ही दिन रह गए। फिर तो बरसों में कभी लौटना हो जाएगा। एक-दो दिन अपने मायके वालों को भेंट आना चाहती तो भेंट आ? परदेश यों भी बुजुर्गों के चरण छूकर और उनका आशीष लेकर ही जाना ठीक हुआ। हुआ कि नहीं?'

वाक्य समाप्त करते ही शंकरसिंह को लगा, कहते-कहते उसक ओंठ सूख गए। वह चाहकर भी 'डियर' या 'प्यारी' कहकर हंसा को संबोधित कर नहीं सका और जैसे अचानक ही कोई काम याद हो आया हो, बिना हंसा के उत्तर की प्रतीक्षा किए ही, घर की तरफ वापस चल दिया।

हंसा का मायका समीप के ही गाँव में है। दोपहर को ही हंसा चल पड़ी, तो शंकरसिंह उसे बार-बार कहता रहा कि - 'आज सोमवार है, हंसा? बुधवार तक जरूर लौट आना...' मगर न तो यह बता सका कि यह तो कल सवेरे ही दिल्ली को चला जाएगा और न यह कि - 'बुध को लौट आना, बृहस्पतिवार को दिल्ली रवाना होंगे।'

बुझे-बुझे मन से शंकर सिंह उसे गाँव के तालाब के पास तक छोड़ने चला आया। पानी से भरे तालाब में पेड़ों से गिरे पत्ते तैर रहे थे। आस पास पक्षियों का चहचहाना था और इसकी गूँज तालाब की धूप में झिलमिलाती सतह पर प्रतिबिंबित होती जान पड़ती थी...।

मगर शंकरसिंह को लगा, उसके अंदर का सरोवर तो आज एकदम सूख गया... हंसा को साथ ले जाने, उसे दिल्ली दिखाकर चकित करने तथा स्वयं की आकांक्षा का जीवन जीने की जो कामनाएँ वह अब तक करता रहा, वो सब हंसों की सी कतार बाँधे, उसे अकेला छोड़ती जाने कहाँ को उड़ चली हैं। उसे लगा कि ज्यों-ज्यों हंसा आगे बढ़ रही है, त्यों-त्यों उसके भीतर की वीरानी बढ़ती जाती है।

कुछ कदमों तक हंसा थोड़ा आगे बढ़ती और फिर मुड़कर शंकरसिंह को देखती। उसका अनुराग आँखों में झिलमिलाता भासित होता था। सास घर के आँगन में ही खड़ी उसे विदा होते देख रही थी। देवर किशन उसके साथ-साथ चल रहा था, मगर जिस तरह का वातावरण था, उसमें जैसे बाकी सारी वस्तुओं की उपस्थिति नगण्य ही जान पड़ती थी। यों ही धीरे-धीरे आगे बढ़ती, आखिर वह मोड़ के पार निकल गई।

हंसा का दिखाई पड़ना बंद होते ही, उसे लगा कि देखते-देखते एक पहाड़ी नदी उसकी आँखों से जाने कब तक को ओझल हो गई है और पीछे छूट गई है, सिर्फ उसके ओझल हो चुके होने की आवाज...


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