hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

ऑफिस-तंत्र
कुमार अनुपम


क्.

वह नौकरी करता था और चाकरी तक करने को तैयार था
वह अपने घर के लिए भी तो लाता था शाम को तरकारी
और गैस-सिलिंडर और धोबी से प्रेस किए हुए कपड़े
मालिक के लिए भी वह यह सब करते हुए
कोत नहीं महसूस करना चाहता था
वह तो मालिक के जूते तक साफ करने को तैयार था
आखिर अपने जूते भी तो करता था पॉलिश
और अपनी नन्हीं परी के भी तो चमकाता था नन्हें जूते
तो वह उसे हर्ज नहीं मानना चाहता था

अपने जमीर तक से तसदीक में तय पाया था
कि वह ईमानदार है और रहेगा
भले ही उसे मुनाफे के लिए
मालिक को देनी पड़े अपनी आधी तन्ख्वाह

बस वह बार-बार
अपनी नौकरी बचाना चाहता था
रोज सुबह तैयार होकर
घर से ऑफिस जाना चाहता था
कि लोग पाले रहें
उसे जेंटलमैन मानने का भ्रम भले ही पत्नी हँसती रहे विकट

मगर बार-बार
वह चाटुकारिता के अभिनय में हो जाता था असफल
और बात अटक जाती थी बड़ी आँत में कहीं
वह बेवजह हँसने की भरपूर कोशिश करता था
मटकता था बहुविधि
कई बार
तो खुद की भी खिल्ली उड़ाता था जोकरों की तरह
कि सलामत रहे परिवार की हँसी किसी भी कीमत
मगर व्यर्थ
मालिक की त्यौरियाँ तनी ही रहती थीं कमान की मानिंद

तब वह
अधिकतम चतुराई से ठान लेता था
कि अपनी प्रतिभा, ईमानदारी, कर्मण्यता, विचार वगैरह
वह किसी पिछली सदी में रख आएगा रेहन
अगर मिले कुछ रुपये तो लाएगा उधार
जिससे कि पल सके उसका परिवार फिलहाल

(और वैसे भी इस सदी में जब
पण्य बड़ा हो पुण्य से
फिर ऐसे फालतू मूल्यों का क्या मोल)

तो वह
कुछ पाप करना चाहता था
और उसे पुण्य साबित करने
के नुस्खे तलाश करने में
कुछ सफल लोगों की तरह
सफलता पाना चाहता था

मगर करे क्या बेचारा
कि पिछली सदी में लौटने का द्वार
बंद था मजबूत
और वह
पूरी ईमानदारी से लौटना चाहता था घर और यह भी
कि नहीं लौटना चाहता था।


ख्.

 

सुनो, ऐसा करते हैं कि एक शीशी जहर लाते हैं
तुम पराठे बनाना लजीज
इस सलीके से मिला देना उसमें कि गंध न आए तनिक
मैं जाऊँगा ऑफिस
और मालिक के आगे परोस दूँगा पूरी आत्मीयता में डूब
फिर आएगा मजा
दूँगा भरे ऑफिस में मुझे अपमानित करने की सजा

बट डार्लिंग,
उसकी हत्या के जुर्म में तो मैं फँस ही जाऊँगा
वैसे खाएगा ही क्यों बल्कि वह तो
डालेगा तक नहीं इन पर अपनी स्थायी घुन्नी निगाह
वह तो उड़ाता रहेगा शाही पनीर

बाई द वे,
पिछली बार
हमने कब खाया था शाही पनीर?

याद नहीं
तो कोई बात नहीं
लेकिन खैर तो यह
कि एक जून का अनाज
बरबाद होते-होते बचा कि फार्मूला बेहद लचर था
वैसे आटा भी दस से बीस पहुँच गया है
ऐसा करना,
चार की जगह मुझे दो पराठे देना कल से
क्या है कि सीट पर बैठे-बैठे सुबह से शाम
गैस की प्रॉलम होने लगी है
और बढ़ती उम्र में
जरा सँभल के खाओ तो ही भला - वह कहता है
और ठंडा पानी पीता है एकसाँस
हालाँकि उसे
देर तक खाँसी के ठसके से जूझना पड़ता है।


फ्.

वह सोचता है
और सोचता है कि सोचने का ही तो
मिलता है मासिक मेहनताना

सोचता है
और बॉस को बताता है
कि बॉस,
मेरा तो ऐसा सोचना है फलाँ प्रोजेक्ट की बाबत

बॉस के होंठ फैलते हैं जरा-सा
वह सोचता है, बॉस खुश हुआ

फिर सहकर्मियों की एक मीटिंग बुलाई जाती है
वह अचानक चकित होता है जबकि बॉस
उसके सोचे हुए को
अपना सोचा हुआ ऐसे पेश करता है जैसे कोई राज
लेकिन यह सोचकर
कि बॉस को जँचा उसका सोचना
कि बॉस की देह की सर्वोच्च कुर्सी पर
विराजमान है उसका ही सोचा हुआ इस वक्त
मन ही मन गर्व से कुप्पा होता है

'हलो, हाँ हाँ आप से ही मुखातिब हूँ जनाब
कहाँ हेरा गए
मन नहीं है यहाँ
तो कहीं और जाने के बारे में सोचें श्रीमान
इतनी इपोर्टेंट मीटिंग है मैं हूँ यहाँ इतने ये लोग
झख मार रहे हैं और आप कहीं और
ऐसी बदतमीजी बर्दाश्त नहीं करूँगा'- बॉस चीखता है
और उसके दिमाग में किसी सन्नाटे की तरह भर जाता है

कमरे से निकलते हुए सोचता है कि कुछ नहीं सोचेगा ऐसा
जो फिट न बैठे मालिक के दिमाग की नाप से
या यह
कि अब कुछ सोचेगा ही नहीं बस काम किए जाएगा
जैसे करते आ रहे हैं बाकी सहकर्मी
वर्षों से खुश खुश बिना कुछ सोचते हुए उन सबको
खुद पर ताना मारने की मोहलत नहीं देगा
ऐसा सोचता है सोचने पर शर्मिंदा होता है

कहीं और जाने के बारे में भी सोचता है
और
कहीं और न जा पाने की वजह के बारे में भी
समझदार साहस से भरकर कई बार
मगर कहीं उसके भीतर से निकलकर
एक पिता एक पति एक पुत्र एक भाई
सोचने के ऐन बीचोंबीच आकर डट जाते हैं

दरअसल, घर और संसार के दरयान
एक ऑफिस होता है विभाजन रेखा की तरह
जो चीरता रहता है दो फाँक आठों याम...

इसी अवकाश में आता है बॉस का फोन -
'आपको फील तो नहीं हुआ कुछ कहना पड़ता है
लेकिन आपकी विद्वता का कायल हूँ बेइंतिहाँ
और सोचिए जरा
कि सिर्फ आपको ही है मेरे बँगले पर आने की अनुमति
आज क्या प्रोग्राम है आपका, आ जाइए, घर पर ही हूँ'

वह सोचता है कि क्या क्या तो सोचता रहा फालतू

और बॉस के बँगले पर जाता है मुग्धभाव
जहाँ उसकी प्रतीक्षा में ही मिलता है बॉस कहता है -
'हाँ तो क्या सोचा आपने
बताइए बताइए...'

वह पुलक में भर
जैसे ही बताने लगता है
बॉस ऑन कर देता है एक धार्मिक-स्त्रोत फुल साउंड
और कहता है -
'जरा और और तेज बताइए ना
सुनाई ही नहीं दे रहा आपका सोचा हुआ कुछ भी।'


ब्.

एक लड़की फोन करती है
और शाम उगती है

पूछती है आज क्या करते रहे दिन भर
और बताती है सुबह 'जिम' गई 'ङ्क' गले का ट्रैक-सूट पहनकर और लौटकर एक गिलास दूध पिया शाम को नहीं पीती हूँ ना और दो चोटी नहीं किया और रूमाल टॉप के बाईं ओर नहीं पिन किया और वाटर-बॉटल कंधे पर बिना टाँगे आफिस गई और हाँ लंच-आवर में आया तो था एक साड़ीवाला पर ना नहीं खरीदी एक भी साड़ी आज देर से मिला ऑटो भी अभी पहुँची हूँ चाची एक आवाज पर दे गई थी चाय पीकर बैठी हूँ

पूछती है क्यों हैं उदास बोलते क्यों नहीं
और बताती है सच में वो कितने अच्छे दिन थे मुच में जो उगते थे बाइक पर और ढलते थे बाइक पर उसे भूल नहीं पाती और भूलना भी नहीं चाहती वह मेरा प्यार है और जानते हो मैं तो हर हद तक जा सकती थी अपना बनाने के लिए उसे संपूर्ण पर वो ही हट गया पीछे अपनी किन्हीं मजबूरियों के जंगल में अब उसकी अपनी दुनिया है अपना वंश बहुत दिन से दिखा भी तो नहीं और हाँ मेरे इश्क ने मुझे खोज लिया अब अपने साथ हूँ लेकिन उसकी ना बहुत बहुत याद आती है अच्छा आओ भी अब जानते हो चार दिनों से नहीं लगाया मैंने काजल बूझो जरा क्यों आओ न क्विक अभी देखो न मुझे मिला नहीं कॉन्ट्रेक्ट करो न बात कितना तो पसंद करते हैं तुहें बॉस और मैं... कुछ समझे बुद्धू... ओके गुडनाइट स्वीटड्रीम्स टेक्केयर बाय...

और फुलवर्जन में कई तरफ रात घिरती है।


भ्.

'आय एम नॉट इंट्रेस्टेड
कि कैसे चला लेते हो तुम इत्ती-सी पगार में समूचा परिवार
और वह भी निरी ईमानदारी की शर्त पर दरअसल
यही है मेरे लिए अचरज की फुरफुरी
यही है मेरे विश्वास और निश्चिंतता का मजबूत आधार

तुहारे फादर ही थे न जो आए थे उस रोज
घुटने तक धोतीवाले
मैं तो देखते ही पहचान गया था भले कभी मिला नहीं था तो क्या
उस किसान ने बोई है कड़ी धूप में तपकर तुममें अपनी उमीद
उसके सपनों को तुहें ही सच करना है

तुहारी पत्नी प्रेगनेंट है मुझे पता लगा है
उसकी मेडिसिन्स का खास खयाल रखने का वक्त है यह
बच्चों को अच्छे स्कूल में ही पढ़ाना, समझ रहे हो न
वैसे एक दिन पहले
भेज तो देता है न तुम्हारे खाते में सेलरी
कि डाँटूँ एकाउंटेंट को अभी फिर से

अरे जोश से भरे जवान हो तुम लोग
आगे बढ़कर सँभालो जिम्मेदारियाँ

मैं तो इस उम्र में भी फेंक सकता हूँ चार वर्करों का काम
फिर तुम तो माशाअल्ला...

और हाँ जरा कम लिया करो छुट्टियाँ

तुम देख ही रहे हो स्टॉक मार्केट की मंदी
हमारी मजबूरी में तुम लोग ही नहीं लोगे इंट्रेस्ट
तो कैसे बचेगा ऑफिस
और तुम लोग भी
कि दूसरे ऑफिसों का हाल कोई अलग तो है नहीं... कि नहीं

वैसे अचरज की फुरफुरी उठती है रह रह कि...'

अब उसे भी मजा आने लगता है बॉस से साथ साथ
हँसता है दाँत चियार
फिर बॉस के केबिन से किसी 'हाँ' में थरथराता
निकलता है
कहीं न जाने के लिए अपनी सीट तक अकसर की तरह आता है।


म्.

लौटने के लिए वह घर लौटता है
और साथ में एक ऑफिस लाता है

दरवाजा खोलने में हुई जरा-सी देरी के लिए
फटकारता है पत्नी को
माँगता है पूरे दिवस की कार्य-रिपोर्ट
सहमी हुई वह
गिनाती है रोजमर्रा गृहस्थी के काम जिसमें जूझती रही सगरदिन
वह एक मामूली गृहस्थी के मामूली कामों को
उसकी साधारणता समेत खारिज करता है और
कुछ असाधारण काम-धाम करने
की आदेशनुमा सलाह में लपेट
उसकी गृहस्थी की मामूली फाइल
हिकारत के हाथों सौंप देता है

बच्चे
दरवाजे और करुणा की ओट से
कुछ चाकलेट कुछ टाफियों की नाउमीदी में
किसी सपने में लौट जाते हैं
या सोने में व्यस्त दिखने
के अभिनय में मशगूल हो जाते हैं मन मार
उन्हें पता है शायद
कि ऑफिस में चाकलेट और टाफियाँ नहीं मिलतीं
जो दुहराता है अकसर उनका पिता

वह अधिकारी-आवेश में
झिंझोड़कर जगाता है बच्चों को अधनींद
और धमकाता है कि तुम सबकी मटरगश्तियाँ
और लापरवाहियाँ
अब और बर्दाश्त के नाकाबिल
कि अधिक मन लगाओ
कि तुम पर, सोचो जरा,
कितना इन्वेस्ट किया जा रहा है लगातार
तुम पर हमारे कई प्लान डिपेंड हैं
और कई योजनाएँ तो तुहारे ही कारण स्थगित
तुम्हीं हो हमारी उमीद की मल्टीनेशनल लौ
जिसकी जगरमगर में हमारा भी भविष्य देदीप्यमान

बच्चे फिर भी
अपनी कारस्तानियों के स्वप्न में दाखिल हो जाते हैं

इतने में पत्नी लगा देती है भोजन
वह स्वादिष्ट लगते पकवान का छुपा जाता है राज
और निकालता है मीनमेख कि अब
पहले-सी बात नहीं रही तुममें न पहले-सा स्वाद
जबकि जानता है कि अधिकतम समर्पण से बनाया गया है भोजन

पत्नी कुढ़ती है
और किसी आशंका में
अपनी घर-गृहस्थी समेत डूब जाती है

वह लगा लगाकर गोते उसे खींच खींच निकालता है बार बार
और उससे
सहयोग की कामना करता है
वह स्वीकारती है अनमने मन से आज का अंतिम फरमान
और ध्वस्त हो जाती है
वह बॉस की तरह मंद मंद मुस्कुराता रहता है
और किसी विजेता-भाव में बिला जाता है।


स्त्र.

यहाँ तो ऐसा ही होता रहा है
आप नए हैं न जान जाएँगे यहाँ की कार्य-प्रणाली-
सर्वग्य भाव से भरे कुछ असमय-बुजुर्ग-युवा
अपनी गलतियाँ छुपाते हुए ऐसा दोहराते हैं जब तब

जो यहाँ हैं
वे यहीं थे जैसे अनंतकाल से

जो यहाँ से किसी तरह विदा हुए
वे जैसे कभी थे ही नहीं स्मृतियों तक में

जो डटे हैं वे ऐसे हैं
जैसे यहीं रहेंगे अनंतकाल तक...।


त्त्.

यह एक ऐसा तंत्र है
जहाँ हर शख्स परतंत्र है

षड्यंत्र हैं और चतुर चालबाजियाँ हैं
और तनाव और रणनीति है
चापलूसियाँ और वार्ताएँ और लापरवाहियाँ

और दुरभिसंधियाँ
और समझौते और लालच
और लिप्साएँ और घूस और पलायन
और विडंबनाएँ और विराग और युद्ध हैं
और कई बार तो 'इलू इलू' भी
और इस हद तक कि शादियों में उसकी परिणति

सच्चाइयाँ भी हैं
लेकिन उतनी ही
कि झूठ के साम्राज्य पर
जितनी से न आए तनिक भी खरोंच
चलता रहे कारोबार सकुशल
सब खुश खुश-सा दिखते रहें इतनी अनुकंपा
इतने ही अनुपात में व्यवहार

कुल मिलाकर यह कि जहाँ गुजारता है वह
अपना बहुत सारा समय और जीवन,
यह एक क्रूर सच्चाई है, कि दरअसल
उसका अपना वहाँ कोई नहीं है

मसलन यह
कि कोई किसी का ताबेदार है तो कोई किसी का मनसबदार
कोई किसी का चेला है तो कोई किसी का पिट्ठू
कोई किसी का कारकुन तो कोई किसी का तरफदार
मतलब कोई इनका आदमी है तो कोई उनका आदमी है
कोई काम का आदमी नहीं है

और जनाब, एक जीता जागता ताज्जुब है,
कि यह तंत्र
फिर भी चलता ही चला जा रहा है तमाम घुनों के बावजूद
गोया कि हमारा ही देश हो।

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में कुमार अनुपम की रचनाएँ