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कहानी

यात्रा
मनोज कुमार पांडेय


क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपको नींद में जाने से इसलिए डर लगे कि नींद में जाते ही आपका यथार्थ नींद नहीं सपना हो जाएे। कुछ ऐसे सपने जिनकी लगाम दूर-दूर तक आपके हाथों में नहीं होती बल्कि आपकी अपनी लगाम उन्हीं सपनों में कुछ इस तरह गुंथी हो कि आप लाख चाहकर भी कुछ न कर सकें। इतना तक हो तो भी चैन, पर यह सपने कुछ इस तरह कि जागने के बाद भी आपका दूर तक पीछा न छोड़ें और दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, हाथ हो या आँख- कुछ इस तरह आपकी समूची चेतना पर हावी हो जाएें कि वही आपका दूर तक मुकम्मल यथार्थ बन जाएें तो क्या होगा?

मैं अभी थोड़ी देर पहले तक ऐसी ही स्थितियों से गुजर रहा था। हालांकि मैंने उनकी गिरफ्त में आने से बचने की पूरी कोशिश की थी पर आप तो जानते हैं कि यह वही समय है जबकि आपके हाथों में आपके हाथों के सिवा कुछ भी नहीं है और अगर आप कहीं दूर तक नजर बढ़ायेंगे और इसी क्रम में हाथ भी बढ़ायेंगे तो आपका यह वहम टूटने में जरा भी देर नहीं लगेगी कि आपके हाथ भी दरअसल कहने को ही आपके हैं और अगर आप अपने हाथों का इस्तेमाल सचमुच अपने लिए या अपने सपनों के लिए करना चाहते हैं तो खुदा ही आपका मालिक है- अगर आप अब तक खुदा के पीछे के खुदा को नहीं जान पाये हैं तो। .......मैं ही कहाँ कुछ जानता था पर अब धीरे-धीरे मुझे अनुभव हासिल हो रहा है। दरअसल जो बातें मैं आपके साथ शेयर करने जा रहा हूँ वह इसी अनुभव को पक्का करने की एक गहरी कोशिश है और यह आपकी मदद के बिना पूरी नहीं होगी पर आप यह भी मत समझिएगा कि सिर्फ मुझे ही आपकी तलब है बल्कि आप भी मेरी मदद के बिना कुछ नहीं समझ पायेंगे बल्कि समझने की बात तो छोडि़ए जनाब, आप मेरे बिना कायदे से कुछ सोच भी नहीं पायेंगे। मेरे बिना आपका जीवन अधूरा है। आप और मैं अलग-अलग एक धुँधली परछायीं के सिवा कुछ भी नहीं। मेरा नाम श्याम है और मैं आपका हमजाद हूँ।

मैं आपको अपने बारे में और कुछ बताता हूँ। मेरी बागवानी में खूब रूचि है। गाँव में मेरा घर गाँव से हटकर एक किनारे है जिससे हमें खूब जगह मिल गयी है। इसमें मैंने खूब सारे पेड़ लगाये हैं। कई पेड़ तो बड़े-बड़े हो गये हैं। जब ये हरे-भरे थे तब पूरा गाँव इन पर मोहित था। मैं जब भी गाँव में रहता घूम-घूमकर एक-एक पेड़ को सहलाता और प्यार करता पर मेरे ये मासूम हरे-भरे पेड़ कायदे से बड़े भी नहीं हो पाये थे कि बगल में ईंट का भट्ठा खुल गया। भट्ठे में नीचे से लाल ईंटें निकलतीं और ऊपर से काला धुआँ। जब भट्ठा खुला तो उसी साल मेरी अमराई में पहली बार बौर आये थे। बौर सूखकर काले पड़ गये। मेरे रोमांच का एक हिस्सा मर गया। मैने फिर भी कहा ठीक, पेड़ों की उमर बहुत लंबी होती है, भट्ठा क्या खाकर पेड़ों की बराबरी करेगा। जब तक भट्ठा है बौर नहीं भी आयेंगे तो छाया और खूबसूरती तो है ही पर ये भी कहाँ बचीं ! पत्तियाँ सूखने लगीं। आधी पत्ती सूख जाती, आधी हरी पड़ी रहती। फिर नई-नई टहनियों से गोंद रिसने लगा। एक दिन मैंने देखा कि पेड़ों पर न जाने कहाँ से लाल चींटे आ गये हैं। हम कुछ कर पाते उसके पहले ही पेड़ों में बड़े-बड़े झोंझ दिखाई पड़ने लगे और फिर टहनियाँ भी सूखने लगीं। मैं कीटनाशक ले आया, पेड़ों पर छिड़काव किया और भट्ठेवालों के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया पर कीटनाशक से एक भी कीड़ा नहीं मरा और भट्ठे वाले के खिलाफ वह तो मुकदमा नहीं ही जीत सकता जिसके घर में एक भी ईंट न लगी हो।

मैं आपको अपने पिताजी के बारे में बताता हूँ। वह प्राइमरी स्कूल में मास्टर हैं। धोती-कुर्ता पहनते हैं। सिर पर बाल नहीं बचे हैं। झड़ गये हैं। वे छोटी सी मूँछ भी रखते हैं। हम बचपन में उन्हें बहुत भयानक समझते थे और बहुत डरते थे जबकि अमूमन वे हमारा कान ही उमेठते थे पर कभी-कभी भड़ाम-भड़ाम पीट भी देते थे। हम ढेर सारे भाई बहन हैं। जैसे जैसे हम सब बड़े हो रहे हैं, उनकी आँखों में कीचड़ बढ़ता जा रहा है। उन्हें बार-बार लगता है कि हम बस एक या दो भाई बहन होते तो कितना अच्छा होता, न सही कुछ दुकान वुकान ही खुलवा देते पर उनकी सारी कमाई बहनों के दहेज में जा रही है और शरीर हमारी चिंता में गला जा रहा है। हम आपस में नजर मिलाने से डरते हैं इसलिये मैं शहर चला आता हूँ जहाँ सारे नकार के बावजूद संभावना छुपी हुई है और पिताजी विद्यालय चले जाते हैं और बच्चों को पीटते हैं। बाद में पिताजी को उन बच्चों पर दया भी आती है पर दूसरे दिन तक दया इतनी बढ़ जाती है कि वे उन्हें फिर से पीटने लगते हैं।

मुझे लग रहा है कि आपको यह सब बहुत नीरस लग रहा है। चलिए मैं आपको अपने प्रेम प्रसंगों के बारे में बताता हूँ। मैंने पहला प्रेम तब किया था जब मैं कक्षा दस में पढ़ता था। वो साँवली सी एक गोलमटोल लड़की थी। मैं गोरा था और छुटकू-छुटकू टाईप का था तो मैं उसका दीवाना हो गया। मैं कॉपी में उसका चित्र बनाता और हाथों पर उसका नाम लिखता। एक दिन क्लास में मॉनीटर ने मुझे अपनी हथेली पर उसका नाम लिखते हुए देख लिया। मॉनीटर हथेली पर किसी लड़की का नाम लिखे जाने के सख्त खिलाफ था इसलिए उसने मेरी शिकायत कक्षाध्यापक से कर दी। कक्षाध्यापक गणित पढ़ाते थे और गणित की तरह ही खूंखार थे। उन्होंने अपने जीवन में शायद कभी प्रेम नहीं किया था, तो, उन्होंने मुझे उठाया और पटक दिया, फिर बड़ी देर तक मेरे समूचे जिस्म में मोहब्बत के 'जर्म्स' ढूँढते रहे। पता नहीं उन्हें जर्म्स मिले थे या नहीं पर इसके बाद मैं मोहब्बत के नाम से भी डरने लगा और बारहवीं तक पहुँचते-पहुँचते यह डर इतना बढ़ा कि मैं फिर से प्रेम में पड़ गया। यह लड़की भी साँवली और गोलमटोल थी। मैं उसे खूब चिट्ठियाँ लिखता जिनका कि वह कभी जवाब नहीं देती थी। इन चिट्ठियों में एक-एक अक्षर में मेरी मोहब्बत का अफसाना भरा रहता। इनमें फिल्मी गीतों की तर्ज पर कुछ तुकबंदियाँ भी होती। मैंने ऐसी बहुत सारी तुकबंदियाँ कर रखीं थी जिन्हें मैं गीत कहता था। एक बार पिताजी को मेरा ये गीतगोविन्द मिल गया फिर तो वे बड़ी देर तक खटाई और मेरे कानों में समानता ढूँढते रहे। इसके बाद अपने पवित्र प्रेम को समर्पित मेरे प्रेम-गीतों को उन्होंने पवित्र अग्नि के सुपुर्द कर दिया और कहा स्वाहा। इसके बाद मेरी प्रेमिका जो अपने मामा के यहाँ रहकर पढ़ाई कर रही थी अपने घर चली गयी और उसकी शादी हो गयी। इस तरह मेरी दूसरी प्रेम कहानी का भी त्रासद अंत हुआ।

बाद के दिनों में जब मैं स्नातक होने के लिए शहर आया तो आदतन तुकबंदियों वाला कुटेव फिर जोर पकड़ने लगा। करेला नीम पर कुछ इस तरह चढ़ा कि मेरे मकान मालिक एक सांध्य अखबार में उपसंपादक थे और उन्हें अपने अखबार का पेट भरना होता था; सो जल्दी ही मेरी तुकबंदियाँ गीतों और गजलों के नाम से छपने लगीं। जैसे इतना ही बिगड़ने के लिए काफी नहीं था कि पिताजी जब शहर आये और संयोग से उन्होंने ये छपी हुई तुकबंदियाँ देख लीं और नसीहत दी कि इसे एक फाइल में सुरक्षित करते जाना। उस दिन मैं पहली बार छपे हुए शब्दों की ताकत से परिचित हुआ और जल्दी ही मैं अपने आपको निराला, प्रसाद, पंत, बच्चन, गालिब, फिराक वगैरह-वगैरह की श्रेणी का, बल्कि इनसे जरा ऊपर ही उठा हुआ समझने लगा और मुझे आसपास के लोग कीड़े-मकोड़े नजर आने लगे। हालाँकि जल्दी ही मुझे पता चल गया था कि अखबार में छपना कितना आसान काम था पर तब तक मुझे इस गुमान में रहने की आदत पड़ गयी थी। ये गुमान तब टूटा जब मेरी तीसरी प्रेम कहानी शुरू हुई ।

बहुत दिनों के बाद एक बार फिर मैं प्रेम में जकड़ा हुआ था। लड़की बगल की गली में रहती थी और मैं उसे अपनी छत पर से निहारा करता था। जल्दी ही मुझे उसके और नजदीक जाने का मौका मिला जब उसके यहाँ एक कमरा खाली हो गया। मैं झट से उसके मकान में पहुँच गया। गया तो मैं उसके लालच में पर दोस्ती पहले उसके भाई से करनी पड़ी। खैर ! वह बहुत प्यारा और होनहार था और एक सांस्कृतिक संगठन से जुड़ा हुआ था सो जल्दी ही मैं भी खुद को संस्कृतिकर्मी कहने लगा। वह भी एक दौर था कि वे मेरी तुकबंदियों का मजाक बनाते और मैं उनसे सहमत होता और जल्दी ही मेरे इन नए दोस्तों ने मुझे तुकबंदियों के जाल से बाहर निकाल लिया और मैं समाज को बदलने के लिए समाज में एक सांस्कृतिक चेतना पैदा करने के लिए गद्य लिखने लगा। इस तरह मैंने समाज के हित में गीतों को कुर्बान कर दिया और अपने दोस्तों के साथ कुछ नए तरह के सपनों में डूब गया। मेरे तब के दोस्तों से मिलते तो आपको बहुत अच्छा लगता। हम बारिश में साथ-साथ भीगते, एक-एक साइकिल पर तीन-तीन लोग सिनेमा देखने जाते और बहुत बार तो हमने लड़कियों को लाइन भी साथ में मारी पर हम जरा शरीफ किस्म के आशिक थे। हमने गंदी फब्तियाँ कभी नहीं कसीं। बस हम इतना भर चाहते थे कि हमारे पास भी सुन्दर-सलोनी प्रेमिकायें हों।

हम किसी राजनीतिक पार्टी के सदस्य नहीं थे और सारी राजनीतिक पार्टियों से घृणा करते थे पर यूँ हम खूब उखाड़-पछाड़ करते थे। हमने मिलकर एक सृजन-मंच बनाया था जिसमें हम मिलकर पढ़ते और लड़ते थे। हम अपने को पोलिटिकल की जगह कल्चरल कहलाना पसंद करते थे पर कल्चर-कल्चर करते-करते हमारा एक खास दोस्त राजनीति की लात खाकर कबाड़ को गलाकर लोहा बनाने वाली कंपनी में सुपरवाइजरी करने लगा, दूसरे का बाप मर गया और वह बाप की जगह पर बाबू हो गया। तीसरा कल्चर कल्चर करते हुए गाँव जाकर एग्रीकल्चर से जुड़ गया और चौथा जो आपके सामने है फ्रीलांसिंग करने लगा। पर यह तो बाद की बात है। हमारा एक और खास दोस्त था वरूण। उसको एक प्रेमिका मिल गयी। उसकी प्रेमिका ने उससे कहा कि अगर वह सचमुच उसे चाहता है तो उसे अपने नाकारा दोस्तों को छोड़ना होगा और खूब मेहनत करनी होगी। उसने अपनी प्रेमिका के सिर पर हाथ रखकर कसम खाई कि वह अपने नाकारा दोस्तों को छोड़ देगा और खूब मेहनत करेगा। बाद में उसने आत्महत्या कर ली। रही मेरी बात तो मेरे कल्चरल दोस्त को जब मेरी और उसकी बहन की प्रेमकहानी के बारे में पता चला तो उसने सृजन-मंच की बैठक बुलायी और खूब हंगामा किया। बैठक में मैं गद्दार साबित हुआ और उसने अपने कमरे से मुझे निकाल फेंका। लड़की अच्छी और बावफा थी सो हमारा प्रेम आगे भी लुक-छिपकर चलता रहा हम एक दूसरे से मिलते रहे, चिट्ठियाँ लिखते रहे। वह एक-दो बार मेरे कमरे पर भी आई हमने एक-दूसरे को चूमा भी पर बाद में मैं गुटखा खाने लगा और उसे गुटखा जरा भी पंसद नहीं था, इस तरह मेरा तीसरा प्रेम भी असमय काल-कवलित हो गया।

पिताजी जैसे-जैसे मुझसे नाउम्मीद होते गये वैसे-वैसे घर से पैसा मिलना कम होता गया और फ्रीलांसिंग मेरी जरूरत बनती चली गयी। इसके सिवा और कोई काम था ही नहीं। मुझे ट्यूशन तक तो मिलता नहीं था क्योंकि न तो मुझे गणित आती थी न ही अंग्रेजी। और फ्रीलांसिंग की दुनिया, बाप रे बाप भयानक चालबाजी और शातिरपने से भरी हुई है। कभी मूँछों वाले दुकान जी पर लिखो तो कभी पूरे शरीर पर गोदना गोदवाने वाले मकान जी पर। सार्त्र से लेकर हॉरर फिल्में बनाने वाले रामसे बंधुओं तक, मोहम्मद अली से लेकर माइकल जैक्सन तक, रामलीला से लेकर रासलीला तक किसी भी विषय पर किसी भी नाम से लिखने के लिए तैयार रहना पड़ता है। इसके सिवा अजब-गजब चीजों पर नजर रखो- बरामूडा ट्रैंगल क्या है.... हृाइट हाउस में किन-किन अमरीकी राष्ट्रपतियों के भूत दिखते हैं? और आजकल तो मामला और भी उलझ गया है। अब संपादकों को गरम मसाला चाहिए। लिखो कि लड़कियाँ विवाहित पुरूषों को क्यों पसंद करती हैं? विवाहित महिलायें कुंवारों की तरफ क्यों भागती हैं.......वगैरह-वगैरह। तो आजकल मैं यही सब कर रहा था पर इधर मुझे लगने लगा था कि जीवन में अब स्थिरता होनी चाहिए। एकाध जगहों पर अखबार ज्वाइन करने का ऑफर मिला भी पर आपसे सच कहूँ तो अखबार की नौकरी कभी मेरी समझ में ही नहीं आयी। साली यह भी कोई नौकरी है, न दिन के रहो न रात के। पर इसमें ठीक यह है कि थोड़ी ही सही एक बँधी-बँधाई पगार तो है। फ्रीलांसिंग में तो कई बार एक लंबा इंतजार पैसों के मिलने का रोमांच ही हवा कर देता है। खैर यही था हमारा जीवन और अब मैं स्थिरता चाह रहा था। इस बीच अपने विवाह को लेकर भी पिछले कई साल से घर का दबाव झेल रहा था। पिताजी का कहना है कि अभी हो गयी तो हो गयी, नहीं तो बाद में शादी-ब्याह होने से रहा। एक चपरासी तक तो बन नहीं पाया मैं। चपरासी बन पाने वाली बात अलग है पर झूठ क्यों बोलूँ शादी के लिए खुद मेरा भी मन मचलने लगा है। जीवन में कुछ तो नयापन हो.......रोमांच हो और...... और.......मेरी शारीरिक जरूरतें भी इधर बेतरह जोर मारने लगी हैं और जब से तीसरा प्रेम टूटा कहीं और कदम बढ़ाने की हिम्मत ही नहीं पड़ी।

ऐसे में जब एक दिन एक वरिष्ठ मित्र ने बताया कि रंगाबाद में स्थित 'रंजना स्पीड लिमिटेड' की मालकिन के मन में साहित्य-संस्कृति के संवर्धन-संरक्षण के लिए कुछ खास करने का ख्याल उमड़ा है और वह पच्चीस से तीस की उम्र का एक युवा सुदर्शन रचनाकार ढूँढ रही हैं जो वहाँ रहते हुए कुछ सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित कर सके और मालकिन के सांस्कृतिक सरोकरों का प्रचार-प्रसार कर सके तो अच्छा वेतन और रहने की सुविधा देखते हुए मैंने अपने आपको काबिल और सुदर्शन रचनाकार मानने में पल भर की देर भी नहीं की और अपना आवेदन भेज दिया। अभी अचानक एक दिन उनकी संस्था के सचिव का पत्र मिला कि साक्षात्कार के लिए दो दिन बाद ही मुझे रंगाबाद पहुँचना था। मैंने तय किया कि यह मौका मुझे नहीं गँवाना है। फ्रीलांसिंग की रोज कुँआ खोद कर पानी पीने वाली स्थितियों से मुझे पार पाना है। एक लालच मन में यह भी आया कि मैं वहाँ पर जम गया तो इतनी बड़ी कंपनी है, किसी तरह से अपने भाईयों को भी वहीं लगा दूँगा। और भला करना क्या है? कुछ आयोजन ही तो करने होंगे। यह सब करने में क्या है। मैं करूँगा और इसी बहाने कुछ लोगों से नियमित मुठभेड़ होगी। बाकी समय में बैठकर क्लासिक्स पढ़ने की अय्याशी करूँगा और जब पढ़ते-पढ़ते ऊब जाऊँगा तो खुद क्लासिक लिखने में जुट जाऊँगा। फिर मैं मुस्कुराया और लंबे समय तक मुस्कुराता रहा।

यह एक चिलचिलाहट भरी गर्मी थी जिससे होकर मैं वहाँ पहुँचा था। एक लड़का मुझे गेस्टरूम छोड़कर चला गया। कमरे में ए.सी. लगा हुआ था और बाथरूम भी अटैच्ड था। मेरे कपड़े पसीने से भीगे हुए थे और बदन चिपचिपा रहा था। फव्वारे में पानी ठंडा था। मैंने दरवाजा बंद करने में जरा भी देर नहीं लगाई और अपने सारे कपड़े उतार फेंके। बाथरूम में वाशबेसिन के ऊपर एक बड़ा सा आईना लगा हुआ था। मैंने बहुत दिनों बाद आईने में अपना समूचा जिस्म देखा। मेरे भीतर एक सनसनी सी मच गयी और मैं उदास हो गया। मुझे अपने लिए एक प्रेमिका की तड़प हुई। क्या वह भी जहाँ पर होगी, अपना शरीर देखती होगी तो मेरे लिए ऐसे ही तड़पती होगी? मैंने सोचा और और पता नहीं कब यही सब सोचते-सोचते इकसठ-बासठ करने लगा। जल्दी ही मैं हाँफने लगा और मेरी उत्तेजना खत्म हो गयी। मुझे अपने आप पर ग्लानि हुई, घिन आई और मैं एक निरर्थकता बोध तथा सुस्ती से घिर गया। मैंने अपने समूचे जिस्म को अपनी नजरों से धीरे-धीरे प्यार से सहलाया। मैंने पाया कि कितना कमजोर गया हूँ मैं। आँखें अंदर चली गयी हैं, सीने की हड्डियाँ उभर आई हैं। दाँत भी कितने गंदे और पीले हैं। मैंने वाशबेसिन के बगल से एक सींक उठायी और दाँतों पर जमा पीलापन खुरचने लगा। इसके बाद मैं देर तक नहाता रहा। मेरे भीतर एक ठंडक भरती गयी। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था और मैं आराम महसूस कर रहा था। मैं बाहर निकला और बिना कोई कपड़ा पहने बिस्तर पर पड़ गया। मुझे पाँच बजे तक तैयार रहना था और पाँच बजने में अभी काफी देर थी। मैने सोचा कि मैं एक नींद ले लूँ पर मेरी अंतडि़यों में भूख कुलबुला रही थी। मैंने लेटे-लेटे ही बैग अपनी तरफ खींचा, उसमें आधा पैकेट बिस्किट पड़ा हुआ था। मैं स्वाद भरे शक्ति भरे पारलेजी गाता हुआ बिस्किट खाने लगा। बिस्किट खाकर मैंने भरपेट पानी पिया और सो गया। यह एक गहरी नींद थी और नींद के भीतर एक गहरा जागरण था। सोते हुए मैं उस दुनिया में जाग रहा था जो मेरे लिये अनोखी थी और हैरतअंगेज भी। मेरी नींद में अगले पिछले कई जन्मों के दृश्य गोते लगा रहे थे। इन दृश्यों में मैं कर्ता भी था और दर्शक भी। मेरी नींद मुझे कोई संकेत देना चाह रही थी पर मैं उन संकेतों को समझ पाता उसके पहले ही नींद के बाहर खट्-खट् की आवाज सुनाई दी।

नहीं शायद बेल बजी। मैं चौंककर उठा और सब कुछ भूल गया। दोबारा बेल बजी तब तक मैं थोड़ा चैतन्य हो चुका था और मैंने तौलिया लपेट कर दरवाजा खोल दिया। यह एक मेरी ही उमर का लड़का था जो ड्राइवर की वर्दी में था। बोला, साहब, बड़े साहब ने आपको बुलाया है। ठीक है तुम बैठो मैं तुरंत तैयार होता हूँ- मैंने कहा और दरवाजा बंद कर लिया। इस मौके के लिए मैं अपना सबसे अच्छा पैंट-शर्ट ले आया था, उसे पहना, बाल सजाये और खुद को आईने में देखते हुये समझाया, देखो मि. श्याम ज्यादा सिद्धांत-फिद्धांत मत झाड़़ना और थोड़ा व्यावहारिक होकर मिलना। लंबे उद्देश्यों के लिए थोड़ा सा समझौता करने में कोई हर्ज नहीं है। इसके बाद मैंने आईने में खुद को आँख मारी। पता नहीं आईने से या नींद से आवाज आयी, अबे जल्दी से भाग; साहब लोग किसी का इंतजार नहीं करते। तो मैं तुरंत बाहर निकला और जाकर गाड़ी में बैठ गया और गेस्ट हाउस से साहब तक पहुँचने के दौरान अपने आपको गंभीर बनाये रहा और साहब के साथ होने वाली बातचीत के बारे में सोचता रहा।

यह एक बड़ा कमरा था, जहाँ साहब बैठे थे। साहब के सामने की मेज पर एक घंटी थी जो साहब के हाथों की पहुंच में थी। साहब उसे सहला रहा था। क्षण भर इंतजार के बाद मैंने साहब को अदब से नमस्ते कहा। साहब ने मुझे बैठने के लिए कहा और घंटी छोड़ दी। घंटी कुछ देर तक टिनटिनाती रही और साहब घंटी की आवृत्ति में मुस्कुराते रहे फिर बोले तिवारी जी, आपका सब कुछ हमने देखा, मैडम ने भी देखा, अच्छा है। इसका मतलब है कि आपने अब तक काफी कुछ लिखा है और छपे हैं। बल्कि चर्चित पत्रिकाओं में छपे हैं। इसका मतलब है कि आपके संपर्क काफी ऊपर तक हैं। इस वजह से मैडम को भी लगता है कि आप हमारी गतिविधियों के लिए काफी काम के आदमी साबित होंगे। इसलिए मैडम भी आपसे मिलने को उत्सुक हैं। डिनर आपको मैडम के साथ ही लेना है। जी, मैंने कहा। इसी के साथ फिर से घंटी बजी। साहब बोले, लेकिन आप यहाँ आ रहे हैं तो कुछ बातें आपको कायदे से समझ लेनी चाहिए कि पश्चिम की गंदी अपसंस्कृति यहाँ नहीं चलेगी। भारत जैसे महान देश में रहते हुए भी आप आध्यात्मिकता और देशभक्ति जैसे गुणों से वंचित लगते हैं। कला-कविता आखिर है क्या? स्वांतः सुखाय। सारी महान रचनाएं स्वातं: सुखाय लिखी गयी हैं। अरे जो रचना अपने रचयिता को रस में नहीं भिगोयेगी वह अपने पाठकों पर भला क्या असर डालेगी और भला रचयिता कौन है, रचयिता तो बस एक है जो वहाँ पर बैठा है। हम सब उसी विधना की रची कठपुतलियाँ हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जो कुछ करता हूँ मैं करता हूँ आदमी तो कठपुतली मात्र है। गोस्वामी ने भी मानस में कहा है कि 'बड़े भाग मानुस तन पावा।' तो मानुस का तन पाया है आपने, तो आपको ये वरदान व्यर्थ नहीं करना चाहिए। आपको सरस्वती वंदना याद है, साहब ने अचानक पूछा।

नहीं। मैंने जवाब दिया। बदले में उन्होंने घंटी बजाई और गर्हित दृष्टि से मुझे देखा और बोले आपको सरस्वती वंदना तक नहीं याद है और आप....... याद कर लूंगा सर। जल्दी से मैंने कहा। साहब कुछ बोलते-बोलते रूक गये, एक लंबी साँस ली, पानी पिया, मुँह पोंछा, घंटी सहलाई और फिर शुरू हो गये। आपने हमारी मालकिन रंजना जी की कविताएं पढ़ी हैं, नहीं पढ़ी आपने तो अब तक क्या पढ़ा। सुनिये मैं सुनाता हूँ आपको कि कविता क्या होती है-

मैं मीरा मेरे श्याम की

दुनिया है किस काम की

अब तक उम्र तमाम की

तू मेरा राम मैं तेरी जानकी।

अब आप देखिये कि ये उनकी एक कविता की सिर्फ चार पंक्तियाँ हैं पर इनमें भी अपनी परंपरा का पूरा बोध झलकता है। मीरा से कवियत्री का जुड़ाव है, जो परंपरा को आत्मसात करने और अपने धर्म के प्रति समर्पण से आता है। राम और जानकी के बहाने गोस्वामीजी और वाल्मीकिजी से जुड़ाव है जो अपनी प्राचीन महाकाव्य परंपरा के प्रति गहरे अनुराग से पैदा हुआ है। बीच की दो लाइनें भौतिकवादी यथार्थ को नकारती हैं। यथार्थ आखिर क्या है? सच क्या है? बल्कि परम सच क्या है? परम सच मीरा हैं परम सच राम हैं। साहब को शायद दमे की शिकायत थी। वो रूका और फिर घंटी सहलाता हुआ लंबी-लंबी साँस खींचने लगा। मैं चाह रहा था कि कम से कम वह अब तो चुप हो जाएे पर मेरी चुप्पी ने उसे साँड़ बना दिया था। वह इस मौके पर किसी भी तरह से चूकना नहीं चाहता था और पहली ही मुलाकात में मुझे धराशायी करने पर तुला हुआ था। जिससे कि आगे वह लगातार मुझ पर हावी रह सके। इस बीच मैं लगातार कुंठित हो रहा था और ऐसी स्थिति में हमेशा मैं वाचाल और आक्रामक हो उठता हूँ पर इस समय मैं भीतर ही भीतर अपने आपको कुछ भी बोलने से रोके हुए था और गंभीरता से उसे सुनने की कोशिश कर रहा था। मेरे भीतर का तनाव बाहर निकलना चाहता था पर मैं ऐसा करने का कोई रास्ता निकालता इसके पहले ही साहब फिर से शुरू हो गये। और ऐसा थोड़े है कि हमको आज के वक्त का आभास नहीं है। है और तथाकथित प्रगतिशीलों से अधिक दृष्टिपूर्ण है। मेरी ही एक कविता है-

वक्त है बदमाश

वक्त से क्या आस

कर रहा है नाश

बना रहा है दास

वक्त की पुकार

वक्त की आवाज

आओ मेरे दोस्तों

वक्त बदल दो आज।

साले घामड़, कवि-कुल-कलंक, पिल्ले...... मैंने मन ही मन उसे उसी की भाषा में कई गालियाँ बकीं। दरअसल मैं डर गया था। मैं डर गया कि साहब कहीं अपनी कविता की भी व्याख्या न करने लग जाएे। मैं सब कुछ भूल गया और मैंने तय किया कि मैं साहब को अपनी ऐसी-तैसी करने का मौका नहीं दूँगा। खुद साहब की ऐसी की तैसी करूँगा। बस मैं शुरू हो गया।

वाह साहब क्या बात है, मैंने कहा। इसमें तो संपूर्ण क्रांति का आहृान है। आपने तो मेरी आँखें ही खोल दीं। क्रांति के प्रति असली प्रतिबद्धता तो आपकी कविता में है। मैं पूरी गंभीरता से कह रहा था। जब से मैं साहब के सामने बैठा था कुछ नहीं बोला था और अब जबकि मैं बोल रहा था तो साहब संशय में आ गये। बोले- 'सचमुच तुम मेरी कविता समझ रहे हो?'

और क्या, मैंने कहा। मैं क्या आपसे मजाक करूँगा। ये देखिए आपकी कविता सुनकर रोमांच के मारे मेरे रोम-रोम खड़े हो गये। साहब का चेहरा खिलकर कमल का फूल हो गया। शायद किसी ने पहली बार उसकी इतनी क्रांतिकारी भाषा में तारीफ की थी। बोले- 'मैंने तुम्हारा लिखा हुआ देखा था तभी मैं समझ गया था कि तुम माँ सरस्वती के प्रतिभाशाली पुत्र हो, बस जरा भटके हुये हो। मुझे खुशी है कि तुमने मेरी इतनी कठिन कविता आसानी से समझ ली। आजकल लोगों में ऐसी कवितायें समझने का माद्दा ही कहाँ बचा है?'

साहब आप से तुम पर आ गये थे तो अब तो मुझे चुप ही हो जाना चाहिए था पर मेरे भीतर का भस्मासुर फिर से बोल पड़ा। नहीं-नहीं, मैं आपकी कविता पूरी तरीके से समझ रहा हूँ यह तो नहीं कह सकता पर समझने की कोशिश जरूर कर रहा हूँ। मैं आपकी कविता अपने दोस्तों के बीच ले जाऊँगा और बताऊँगा कि मेरे बेवकूफ दोस्तों, देखो यह होती है कविता जो वक्त बदल दे। मैं आपकी कवितायें जनता के बीच ले जाऊँगा। आपकी कविताएं जनता के बीच जाकर वक्त बदल देंगी और रंजना मालकिन की कविताएं एक आध्यात्मिक क्रांति को जन्म देंगी। आज मुझे समझ में आ गया कि मार्क्सवाद किसलिए असफल हुआ। उसने आध्यात्मिक क्रांति की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। मैं आपसे विनम्र निवेदन करता चाहता हूँ कि यदि आपने मुझे यहाँ रखा तो मैं आपके और मालकिन के दिखाये हुए ज्योति पथ पर चलते हुये भौतिक और आध्यात्मिक क्रांतियाँ साथ-साथ संपन्न करूँगा। आप यकीन जानिए कि यदि आपने मुझे यहाँ रखा तो यह एक क्रांतिकारी युग की शुरूआत होगी। मुझे आशीर्वाद......... कुछ ज्यादा ही हो गया था। यही तो दिक्कत है मेरी। बोलने लगता हूँ तो हाथ में लगाम ही नहीं रहती और अब साहब मारण मंत्र पढ़ रहा था।

'उठ-उठ.......मादर.......साले हरामी। कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती। सुन तुझे रखना-वखना नहीं था। तेरी शक्ल देखी, बुला लिया साले। हमारी खोपड़ी पर बैठकर हमारा ही मजाक बनायेगा और हम समझेंगे नहीं। अरे तेरे जैसों को बहुत देखा है। साले क्रांति करने चले हैं। हम करायेंगे ना क्रांति, बंबू करके उसी में झंडा गाड़ देंगे। भाग, भाग साले यहाँ से।' साहब हाँफने लगा था और जल्दी-जल्दी घंटी बजा रहा था उसका गला साँय-साँय करने लगा था फिर भी वह रूका नहीं, बोला- दस मिनट में तू फैक्ट्री के बाहर नहीं हुआ...... तो तुझे गलाकर नाली में बहा देंगे साले।' उसकी आँख में आँसू आ गये थे, मुँह से फेन आने लगा था और वह बेहद वीभत्स लग रहा था।

अचानक मैंने पाया कि मेरी मांसपेशियाँ जगह-जगह फड़कने लगीं। धमनियों में लहू जैसे जम गया। मेरे समूचे जिस्म में दर्द की एक तेज लहर सरसरा उठी। मुझे इतनी तेज उबकाई आई कि लगा अंतडि़याँ बाहर आ जाएेंगी। मैं तेजी से बाहर की तरफ भागा पर सीढि़यों तक पहुँचते-पहुँचते मैं उलट गया और नीचे तक लुढ़कता चला गया। मैं सिर से पाँव तक उल्टी में लथपथ था। मैं झटके से उठा और गेस्टहाउस की तरफ भागा। घंटी की तेज घनघनाहट मेरे कानों में सूजे की तरह गड़ रही थी। मैं सिर से पाँव तक अपनी चेतना के पोर-पोर में उसकी गालियों की गलाजत महसूस कर रहा था। मैं दौड़ रहा था। मैं काँप रहा था। कमरे की चाबी अभी भी मेरे पास थी। मैंने किसी तरह कमरा खोला और बाथरूम पहुँचकर शॅावर खोल दिया। पानी की पवित्रता को इस तरह मैंने पहली बार महसूस किया। मेरे जिस्म की सारी गलाजत को पानी धुले दे रहा था। पानी की फुहार से मेरा रोम-रोम सिहर रहा था कि मुझे पता नहीं क्या हो गया। इसके पहले कि मैं कुछ समझ पाता मैं चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा। मेरी रूलाई थम ही नहीं रही थी। मैं बहुत देर तक रोता रहा। मैं बहुत देर तक अपना शरीर धुलता रहा। फिर मैने आईने की तरफ देखा। मेरी आँखें लाल हो आयी थीं और सूजी हुई लग रही थीं। मैने अपनी शक्ल देखी और खुद पर मुस्कुराने की कोशिश की पर ऐसा हो नहीं पाया। जब मैं अभी बाहर निकलूँगा तो क्या किसी को पता चलेगा कि मैं अभी रो कर आया हूँ। पल भर में मैं बाहर निकला। चाबी रिसेप्शन पर दी और बाहर की तरफ चल पड़ा। 'बहुत जल्दी लौट लिये साहब, आपके लिए तो कल तक रूम बुक था।' पीछे से आवाज आयी। मुझे लगा कि मेरा मखौल उड़ाया जा रहा है पर मैं पीछे नहीं पलटा। मैंने उसको कोई जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गया। आगे इतना धुआँ था कि साफ-साफ कुछ भी दिखाई पड़ना मुश्किल हो रहा था और साँस लेना भी।

मैं तेजी से फैक्ट्री से बाहर हो रहा था पर जैसे जैसे मैं आगे बढ़ रहा था, एक नशीला अवसाद मेरे भीतर घिरता चला जा रहा था। मैं लगभग बुत मनःस्थिति में था। मैं कुछ भी सोच-समझ नहीं पा रहा था मुझे लग रहा था कि मेरे पैर जमीन पर नहीं दलदल में हैं और मैं उसी दलदल में धँसता चला जा रहा हूँ। सब कुछ दिखता रहता और अचानक मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा जाता। ऐसे ही कभी कुछ नहीं सुनाई पड़ता और अगले ही पल खौलते शीशे की तरह कानों में गालियाँ टपकने लगतीं और फिर देर तक घंटी का कानफोडू़ शोर घनघनाता रहता। इसके बावजूद पता नहीं कैसे मैं स्टेशन पहुँच गया और जब किसी तरह टिकट लेकर अंदर बैठ गया तो मुझे लगा कि मेरी स्थिति शायद थोड़ी बेहतर है। मैंने तय किया कि इस अपमान को मैं यहीं पर छोड़ दूँगा पर तुरन्त ही मैं एक पछतावे से भर गया। मुझे लगा कि मुझे भी जवाब में गाली बकना चाहिए था या कि उछलकर दो लात मारना चाहिये था, पर तुरंत ही एक निरर्थकता बोध मेरे ऊपर सवारी करने लगा कि ठीक है कि मैं उसे पीट देता पर उसके बाद क्या होता? मैं कहीं बेहोश पड़ा हुआ हो सकता था या सचमुच ही गलाकर किसी नाली में बहा दिया जाता या किसी खतरनाक धारा में निरूद्ध थाने की किसी अंधेरी कोठरी में पड़ा होता। मैंने अपने को समझाने की कोशिश की कि दरअसल मैं हमले के लिए तैयार नहीं था। मुझे इसका अंदाजा नहीं था। गलती मेरी थी जब मैं खुद हमला कर रहा था तो उसके जवाब के लिए मुझे तैयार रहना था। मैं नहीं रहा, बस उसने हमला किया और मैं उलट गया। मुझे सावधान रहना था। आगे से मैं सावधान रहूँगा। 'सावधानी सुरक्षा का सर्वोत्तम उपाय'। मुझे एक विज्ञापन का स्लोगन याद आया और आखिरकार मैं मुस्कुराया।

मैं मुस्कुराया और मैंने सोचा कि यही सही समय है कि मैं उस गलाजत की याद से छुटकारा पा लूँ पर मेरी दिक्कत यह थी कि मैं ऊपर की बर्थ पर उकड़ूँ बैठा हुआ था। नीचे होता तो नजर बचाकर सारी गलाजत खिड़की के बाहर फेंक देता पर ऊपर से ऐसा करना संभव नहीं था सो मैं गुनगुनाने का अभिनय करते हुये डिब्बे में खाली जगह तलाशने लगा। डिब्बे में खाली जगह कहीं नहीं थी, डिब्बा ठसाठस भरा हुआ था। चारों तरफ ऊपर-नीचे लोग ठुंसे हुये थे और न समझ में आने वाली भाषा में बातें कर रहे थे। मैं लगभग निराश हो गया था जब मेरी निगाह मेरे सामने वाली बर्थ पर पड़ी। सामने वाली बर्थ पर एक बूढ़ा था। उसके बगल में दो झोले रखे थे। बूढ़े की आँखें सफेद थीं और वहशत से चमक रहीं थीं। उसके हाथ में एक लाठी थी जिसे वह कुछ इस तरह थामे हुए था कि कभी भी चलाने के लिए तैयार था। जैसे ही कोई बूढ़े के पास की खाली जगह पर नजर दौड़ाता, बूढ़े के हाथ में लाठी कस जाती और बूढ़ा न समझ में आने वाली भाषा में जाने क्या-क्या बड़बड़ाने लगता। बूढ़ा एक धक्का खाकर नीचे गिर सकता था पर उसके देखने और बड़बड़ाने में जाने ऐसा क्या था कि कोई उसके पास भी फटकने की जुर्रत नहीं कर रहा था। अनजाने में मैं यह जुर्रत कर बैठा। मैं बहुत देर से बूढ़े को लगातार देख रहा था और मैंने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। बूढ़ा अचानक मुझसे मुखातिब हो उठा और न जाने क्या-क्या कहने लगा। उसकी भाषा मुझे समझ में नहीं आ रही थी पर मुझे लगा कि जैसे वह मुझे डाँट रहा है। मैंने दूसरी तरफ देखने की कोशिश की पर तब तक देर हो चुकी थी। मैं बूढ़े की आक्रामक शारीरिक मुद्राओं और भाव भंगिमाओं में गुम होने लगा और पल भर में मैं उसकी बात बखूबी समझ रहा था।

तो बूढ़ा मुझसे क्या कह रहा था?

बूढ़ा मुझसे कह रहा था कि उसका भी मेरे जैसा एक बेटा है। वह भी ट्रेन में सफर करता था। वह ट्रेन में फेरी लगाता था और पेन बेचा करता था। एक दिन उसका टीसी से किसी बात पर झगड़ा हो गया। टीसी ने उसे ट्रेन से नीचे झोंक दिया। उसके दोनों पैर ट्रेन के पहिये के नीचे आ गये। अब वह स्टेशन पर भीख माँगता है। बूढ़े की आँखें उबली पड़ रही थीं फिर उनमें खून बहने लगा। उसके मुँह से लार बह रही थी और ठुड्डी के नीचे लार ओर खून दोनों मिलकर बह रहे थे। सारा खेल उलट गया। बूढ़ा उस साहब से भी ज्यादा खतरनाक था। अनायास तरीके से मेरे हाथ समझाने की मुद्रा में उठे।

तुझे उसकी भाषा आती है, नीचे से एक औरत ने पूछा। नहीं, मैंने जवाब दिया। तब फिर कैसे? क्या? मैंने पूछा। अरे तू उस बूढ़े से बात कर रहा था तो क्या उसकी बात समझ रहा था? नहीं मैंने कहा, मैं उसका दर्द महसूस कर रहा था और उसे दिलासा देना चाहता था। तू भी उस बूढ़े की तरह पागल है क्या? औरत ने कहा और पागलों की तरह खिलखिलाने लगी। मैं डर गया जबकि यही सही मौका था कि मुझे सब कुछ सार्वजनिक कर देना चाहिए था। कम से कम बूढ़ा तो मेरा साथ देता ही और भी पता नहीं कितने साथी निकल आते पर मैं बूढ़े की तरह पागल नहीं था और इसीलिए मारा गया। मैंने बूढ़े की तरफ न देखने की कसम खा ली। मैंने उस औरत की तरफ भी नहीं देखा। मैं डिब्बे में इधर-उधर दूसरी तरफ देखने लगा और घबराकर आँखें मूँद लीं। मुझे लगा कि सब लोग जानते हैं कि मुझे वहाँ से किस तरह लतियाकर बाहर फेंका गया था। कहीं बाहर जगह न पाकर मैं अपने ही भीतर घुसने लगा।

मैं देर तक आँखें मूँदे रहा पर यह एक बेहद गर्म रात थी। थोड़ी देर में मेरी कनपटियाँ जलने लगीं। मुझे लगा कि सारा डिब्बा जल रहा है। अभी थोड़ी देर में भाप बनकर सब कुछ उड़ जाएेगा। न किसी की हंसी का पता चलेगा न किसी के रोने का, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मेरा गला खुश्क हो गया। शरीर में जैसे हजारों-लाखों चीटिंयाँ रेंगने लगीं। मैंने कहा पानी, मेरे बैग में बोतल थी जिसमें जाते हुये सफर का थोड़ा सा पानी बचा हुआ था। मैं उसकी आखिरी बूँद तक पी गया मगर प्यास अजेय थी। गाड़ी धड़-धड़-धड़-धड़ करती हुई चली जा रही थी। मैंने फिर से कहा पानी और पानी को महसूस करने की कोशिश की। मैंने नल से लेकर नदी तक सबको याद किया। सबकी स्तुति में मंत्र पढ़े पर मेरी प्यास नहीं बुझी। मैं लगातार फुसफुसाता रहा पानी... पानी... पानी... पानी... और फिर आखिरकार मेरा होश जाता रहा और मैं बेहोशी में घर पहुँच गया और प्यास के मारे घर के सामने की नहर में कूद गया पर जैसे ही मैंने पीने के लिए अंजुली में पानी लेना चाहा, नहर सूख गयी। मैं नहर से बाहर निकला तो मैंने देखा कि सामने एक अछोर नीला अंधेरा फैला हुआ है। कोई फसल तैयार है और वह नीली आग में जल रही है। नहर के किनारे-किनारे उन जगहों पर जहाँ कि मैंने सोचा था कि पेड़ लगाऊँगा वहाँ खूब घने युवा पेड़ हैं। उन पर फूल आये हुए हैं। अचानक टिड्डियों का एक झुंड उन पर हमला बोल देता है। फूल और पत्तियाँ सब तेजी से टिड्डियों के पेट में जाने लगते हैं। मैं पागलों की तरह दौड़ता हूँ और एक-एक पेड़ हिलाता हूँ, गला फाड़कर चिल्लाता हूँ पर गले से आवाज नहीं एक गों-गों निकलती है। टिड्डियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। तभी मैं पाता हूँ कि मैं नंगा हूँ। एक टिड्डी आती है और मेरा लिंग कुतर ले जाती है। मैं हताश सा बैठ जाता हूँ। पिता चिल्लाते हैं, अरे बेवकूफ कपड़े तो पहन ले। मैं पागलों की तरह जवाब देता हूँ अब तो लिंग भी नहीं बचा तो अब कैसी शर्म, फसलें भी नंगी हैं, पेड़ भी तो नंगे हैं। पिता फिर से चिल्लाते हैं अरे बेवकूफ, लिंग नहीं बचा इसीलिए तो कपड़े पहनने और भी जरूरी हैं। मैं टुकड़े-टुकड़े पत्तियाँ उठाता हूँ और अपने जिस्म पर खून से चिपकाना शुरू कर देता हूँ। थोड़ी देर में मैं भी पेड़ हो जाता हूँ। अचानक टिड्डियाँ मुझ पर भी हमला बोल देती हैं। मैं भागता हूँ। आगे-आगे भागता मैं और पीछे-पीछे हजारों-हजार टिड्डियाँ। भागते-भागते मैं बेदम हो गया। जमीन पर आग की लपटें नाचने लगीं। मैं उन लपटों में जलने लगा और बुदबुदाया पानी-पानी।

अचानक मैंने पाया कि मेरी नींद टूट गयी है और नींद के बाहर नींद से भी ज्यादा अंधेरा है। मैंने कुछ टोह लेने की कोशिश की। मैं कहाँ पर हूँ, मेरे चारों तरफ ये खड़बड़ की आवाज कैसी है जो मुझे बहरा बना रही है। मैं भीगा हुआ क्यों हूँ? क्या बारिश हुई है? तब मैं इतना प्यासा क्यों हूँ और यह नमकीन चिपचिपाहट कैसी है? तभी एक तेज पों-ओ की आवाज के साथ धड़-धड़ दूनी हो गयी और अचानक एक तकलीफदेह झटके की तरह मैंने जाना कि मैं ट्रेन में हूँ और ये चिपचिपा नमक मेरे शरीर से निकला है। तभी मैं फिर से संशय से घिर गया। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि मैं सपने से बाहर आ गया हूँ या ये दूसरे सपने की शुरूआत भर है। मैंने उठने की कोशिश की, मेरा सिर ऊपर धड़ाक से टकराया। मैं दर्द से बिलबिला उठा। सपने में कहीं इतना दर्द होता है। होता भी है तो क्या दर्द की आवाज भी होती है। मैने सारे तार जोड़ने की कोशिश की। यह सपना नहीं है। यह रात है। मैं ट्रेन में हूँ। ट्रेन में अंधेरा है। ट्रेन के बाहर भी अंधेरा है। मुझे किसी स्टेशन पर उतरना था। मुझे इलाहाबाद उतरना था। इलाहाबाद पता नहीं ट्रेन से आगे है या पीछे। पानी... पानी, इलाहाबाद... ... इलाहाबाद मैं बुदबुदाया। क्या कोई जाग रहा है? मैंने पता नहीं किससे पूछा? इलाहाबाद कितनी देर में आयेगा? इलाहाबाद! इलाहाबाद तो कब का गुजर चुका। मुझे तेज झटका लगा और मैं नीचे आ गिरा। अंधा है क्या रे? कोई नीचे से चिल्लाया। मैंने चिल्लाने को अनसुना किया और दरवाजे की खोज में नजर दौड़ाई। एक तरफ से तेज काली हवा की लपक सरसर करती हुई आयी। मैं उसी लपक की तरफ बढ़ा। सामने दरवाजा था। दरवाजे के बाहर एक तेज रफ्तार अंधेरा था। इसके पहले कि मैं अंधेरे में गुम हो जाता मुझे चेन का ख्याल आया। मैंने चेन टटोली और जैसे पकड़ कर लटक गया। ट्रेन चिंचियाती हुई रूकने लगी और मैं बाहर के तेज रफ्तार अंधेरे में जो इस बीच धीमा पर गाढ़ा हो चुका था, कूद गया। कूदने के साथ ही मैं बिलबिलाया। मेरा कोई एक पैर किसी नुकीले पत्थर पर पड़ गया था और जूते की सोल फटी हुई थी। मैं एक गहरी कांख के साथ बैठ गया पर इसी के साथ मेरी चेतना जगमग हो गयी। बाहर चारों तरफ अंधेरा फैला हुआ था। मुझे पल भर में समझ में आ गया कि यहाँ उतर कर मैंने कितनी बड़ी मूर्खता की थी पर मैं कोई फैसला कर पाता उसके पहले टार्च की रोशनी मुझ पर पड़ी। जी.आर.पी. वाले हो सकते हैं और मैं पीटा जा सकता हूँ यह सोचते हुये मैं अंधेरे में अंधे की तरह भागा और साथ में बहाने सोच रहा था कि अगर पकड़ा गया तो क्या बताऊँगा। भागते हुये अचानक मुझे ध्यान आया कि मेरा बैग तो ट्रेन में ही छूट चुका था। मैंने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की। इसी के साथ घिनौनी गालियों का एक गोला आकर मेरी कनपटी से टकराया और एक बार फिर मैं इतनी तेजी से पलटा कि मुझे कुछ पता ही नहीं चला। मैं एक भयानक शोर और अछोर अंधेरे में खोता चला गया।

मुझे अपने होने का दोबारा पता तब चला जब मुझे लगा कि कोई मुझे पानी पिला रहा है। मैंने जीभ पर पानी का स्वाद जानने की कोशिश की। पानी गर्म और नमकीन था। मैंने पानी के स्रोत की तलाश में हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ मेरे माथे पर जाकर रूक गये। मैं अपना ही खून पी रहा था। मैं फिर से काँपने लगा। मैंने खड़े होने की कोशिश की पर मेरे हाथों और पैरों पर मेरा कोई जोर ही नहीं था। सिर इतना भारी लग रहा था जैसे कि धड़ के ऊपर पूरी पृथ्वी रख दी गयी हो। अभी मैं उठने की कोशिश ही कर रहा था कि मैंने देखा सामने से एक धुँधली सी रोशनी अपनी लौ तेज करती चली आ रही है। मैं अंधेरे का मारा रोशनी की तरफ देखने लगा और पल भर में मैं रोशनी में उसी तरह डूब गया जैसे थोड़ी देर पहले अंधेरे में डूबा हुआ था। तभी मेरे पैरों के नीचे की जमीन काँपी और मुझे घन-घन करता मृत्यु का नाद सुनाई पड़ा मैं ट्रेन की पटरियों के बीचोंबीच पड़ा था।

मुझे काँपने और डरने का भी मौका नहीं मिला। मैं पत्थर हो गया और पल भर में सारा दर्द फना हो गया। बस एक अछोर अंधेरा बचा। यह अंधेरा कभी खत्म नहीं होगा क्या? मैं बेआवाज चिल्लाया। तभी मैंने देखा कि मेरी सांस्कृतिक आत्मा पटरी पर पिचकी हुई पड़ी थी। उसमें से एक-दो किरणें फूट रही थीं। मैंने आत्मा के उजाले में अपने हाथ-पैर जोड़े और बाकी अंगों को व्यवस्थित करने लगा। इसके बाद मैंने अपनी आत्मा उठायी और उसे जेब में डाल लिया। इस संयोजन में कोई तकनीकी दोष था जिसकी वजह से मैं उड़ने लगा। उड़ते-उड़ते मैं सड़क पर आ गया। सड़क के पार एक गुमटी थी जिसमें एक लैम्प जुगनू की तरह गुनगुना रहा था। मैंने गुमटी वाले से एक सिगरेट मांगी। जब मैं सिगरेट जला रहा था गुमटी वाला बड़े जोर से चीखा और बेहोश हो गया।

दरअसल मैंने आँख की जगह दाँत और मुँह में दाँतों की जगह हाथ लगा लिया था। मेरी सांस्कृतिक आत्मा ने एक बार फिर मुझसे दगा किया था। मैने जेब से आत्मा निकाली और उसे घृणा से पटरियों की तरफ उछाल दिया और वहीं रूककर उसी गुनगुने उजाले में अपने अंगों को फिर से व्यवस्थित करने लगा। इसके बाद मैंने गुमटी वाले को उठाने की भरपूर कोशिश की ताकि मैं उससे पूछ सकूँ कि अब मैं कैसा दिख रहा हूँ पर वह उठा ही नहीं। तब से मैं किसी की तलाश में था। अच्छा हुआ आप मिल गये। आप बताइये, अब कैसा लग रहा हूँ मैं? मेरे चेहरे पर किसी दुर्घटना का कोई चिन्ह या भाव तो नहीं दिखाई दे रहा है न? बताइये ना, आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं अपनी ही तरह के किसी दूसरे से बात कर रहा हूँ, नहीं तो बताइये कि भाँय-भाँय करती किसी आदिम खोह जैसी इस काली रात में आप सड़क पर भला क्या कर रहे हैं?


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हिंदी समय में मनोज कुमार पांडेय की रचनाएँ