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कविता

नाच
नेहा नरूका


नाच तू बावरी,
नाच,
आज सुहागरात!
कदमों को थिरका
नाच,
ता था थैया......
मुख से कह कि मुस्कराए
नैन से कह कि मटके
हया को कह 'चल भाग'
घुँघरू से कह
छम छम छम करके
बजें रातभर

परदेश से
पिया आँगन में पधारा है
उसने आदेश भिजवाया है

कोठरी में जाकर
माँग काढ़
सींक से सिंदूर भर

पूर दे...
केशों के बीच
एक सीधी लकीर
जितना दूर तक पूरेगी
उतनी लंबी होगी पिया की उमर

कोहनी तक हाथ भरके
चूड़ी पहन
कर
खन खन खन...

नाक में नथ पहन,
गले में हार डाल,
कमर में करधनी बाँध

पैर व हाथ की अँगुलियों में
कस ले बिछुए-अँगूठी

पलंग पर सफेद चादर बिछा
रात में जब पिया
कौमार्य भंग करेगा तेरा
चादर पर लाल धब्बा पड़ेगा
तू चीखना मत गँवार
कदम, नैन, घुँघरू, चूड़ी, नख, होंठ
सबको कह देना
चुप्प!
बाहर आँगन में सो रहे
सास-ससुर जाग जाएँगे
वे जाग गए तो
लाल धब्बे पिया की आँखों में
समा जाएँगे

उन्हें लेकर पिया
चला जाएगा परदेश
और फिर तू रह जाएगी कोरी
इसलिए तू नाच बावरी
तुझे संतुष्ट करना है पिया को
देरमतकर
नाच!!!

 


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