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कविता

प्रेम
नेहा नरूका


यूँही चलते चलते, जीवन की राहों में
एक दिन वह मुझसे टकराया
जान पहचान बढ़ी
दोस्ती
फिर प्यार
हाँ! फिर प्यार हो गया
सपनों, वादों का सिलसिला शुरू हुआ
हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह
कई बार उसने
मेरे माथे को चूमते हुए कहा
कि मैं उसकी जान हूँ
और भला जान के बिना कोई जीव
जिंदा रह सकता है क्या
तुम मुझसे कभी अलग नहीं होगी
हम एक है,
बस शरीर दो है
जान तो एक ही है न
वह मुझे जान कहता
जान...जान...जान...
मेरी जान ! मेरी जानेमन ! मेरी जानू !
धीरे धीरे उसने मुझे जान कहना कम कर दिया
फिर एक दिन उसने मुझे
जान की जगह कहा
औरत !
कुछ शर्तें बनाईं
और मुझे उन पर चलने को कहा
मैं चौंकी...
पर बाद में मान गई
हिंदी फिल्मों की हीरोइन की तरह
मेल-मिलाप, नेह-विश्वास, सेक्स-रोमांस हो रहा है
पर पहले से बहुत कम
एक दिन वह फिर बोला प्यारी कहते हुए
अब मुझे वक्त नहीं मिलता
काम बहुत अधिक है और समय उतना ही
पूरा समय नष्ट हो जाता है तुम में
तुम ऐसा करो लगाव थोड़ा कम कर लो
पहले मुझे अपना काम करने दो
आखिर में मर्द हूँ
मैं बर्फ की तरह जम गई
कहाँ आसान था यह करना
मुझे बहुत प्यार करना था
मैं उसके साथ रहना चाहती थी
उसके साथ जीना चाहती थी
उसे पूरा का पूरा पाना चाहती थी
पर उसे काम करना था
पैसा कमाना था
मैं रूठ गई
कैकई की तरह जा बैठी कोपभवन में
खूब कलेश किया
वह मुझे फिर मनाने आया
मंचीय रामलीला की तरह
मैं महीनों में तुम्हें प्यार करूँगा
कुछ दिन बाद
बात सालों पर आ गई
मैं उससे दूर होती गई
अपनी जान खींचकर
अपने शरीर में बैठाने की नाकाम कोशिश करती
और बस खुद को देखती
मुझे लगने लगा था
एक दिन आएगा
जब वह मुझसे कहेगा
मेरा काम अभी चल रहा है
तुम तो समझदार हो
सती हो
सावित्री हो
प्यार में तुमसे ही करता हूँ
ऐसा करो अभी तुम दुनिया से चली जाओ
हम जन्मों में मिलेंगे
और मैं सोचूँगी
मेरे जन्म होंगे
या यही मेरा आखिरी और पहला जन्म है
और यह मर्द
मेरा आखिरी और पहला प्रेमी

 


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