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कविता

अधिभूत
त्रिलोचन


मदन के शर केवल पाँच हैं
बिंध गए सब प्राण, बचा नहीं
हृदय एक कहीं, अधिभूत की
नियति है, यति है, गति है, यही।

 


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हिंदी समय में त्रिलोचन की रचनाएँ